सर्दियों की दस्तक के साथ सीहोर जिले के इछावर के समापुरा में उठता भाप का धुआं, गन्ने के रस की मीठी सुगंध और सवेरे की धूप में चमकती गुड़ की भेलियां दिख रही हैं. यह उस जीवंत परंपरा का हिस्सा है जो बीते वर्षों से चली आ रही है. इछावर से लगभग 17 किमी दूर स्थित समापुरा गांव में सालों से शुद्ध और लजीज गुड़ बनाने के लिए जाना जाता है. यहां का गुड़ जिलेभर में ही नहीं बल्कि आसपास के जिलों में भी प्रसिद्ध है क्योंकि आज भी यहां परंपरागत तरीके से गुड़ बनाया जाता है. किसान अनवर खा ने न्यूज स्टेस AI को बताते हैं कि यहां लगभग हर किसान गन्ने की गन्ने की खेती विलुप्त होती जा रही है जिस तरीके से किसान गन्ने की खेती को छोड़ने पर मजबूर है क्योंकि अब पहले जैसी बात नहीं रही मजदूर से लेकर दवाई तक हर चीज महंगी हो चुकी है इसके चलते क्षेत्र के किसानों ने गन्ने की खेती बहुत कम कर दी है मैं तो परंपरा के चलते खेती आज भी कर रहा हूं . हम ही पिछले 50 साल से पुराने देसी तरीके से गुड़ बना रहे हैं. पुराने तरीके से गुड़ बनाने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसका स्वाद दूसरे गुड़ से बहुत अलग होता है. स्वाद की वजह से यहां के गुड़ की ज्यादा मांग रहती है. वह बताते हैं कि यह गुड़ बहुत ही मीठा होता है. इसका दाना भी सही रहता है. यह खाने में बहुत ही अच्छा लगता है.

गुड़ में किसी तरह की मिलावट नहीं इसी लिए चक्रे पर ही गुड बिक रहा है

उन्होंने कहा कि यहां गुड़ पारंपरिक विधि से बनाया जाता है, जिसमें किसी भी तरह की मिलावट नहीं होती. देसी तकनीक से तैयार किया गया यह गुड़ अपनी गुणवत्ता और स्वच्छता के लिए मशहूर है. यही कारण है कि लोग इसे शौक से खरीदते हैं और यह गुड़ दूर-दूर तक प्रसिद्ध है. दाऊद पठान आगे बताते हैं कि इस गुड़ का भाव मार्किट में 50 से 60 रुपए किलो होता है. हालांकि मंडी में यह भाव और भी सस्ता हो जाता है लेकिन यहां जो आता है, उसे हम 70 रुपए किलो के भाव से बेचते हैं दाऊद आगे बताते हैं सीहोर भेरूंदा स्टेट हाईवे पर राहगीर चर्खे से उठाते हुए भाप का धुआं,और खुशबू से खींचे चले आते हैं.