खण्डवा 
तीर्थ नगरी ओंकारेश्वर में चैत्र नवरात्रि के अवसर पर मां गणगौर का पर्व श्रद्धा, आस्था और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ धूमधाम से मनाया जा रहा है। इस दौरान भक्तों में विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है और पूरे क्षेत्र में भक्ति का माहौल बना हुआ है।
मां गणगौर के रथ को धनियर राजा और रनूबाई के स्वरूप में आकर्षक ढंग से सजाकर बाड़ी स्थल तक ले जाया जाता है। जवारे रूपी माता का विधि-विधान से पूजन कर उन्हें रथ में विराजित किया जाता है और आरती उतारी जाती है।
श्रद्धालु तपती धूप में नंगे पैर, ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक लोकगीतों के साथ मां को अपने घर लाते हैं। घर पहुंचने के बाद विधिवत पूजन किया जाता है तथा आए हुए अतिथियों और दंपतियों को श्रद्धापूर्वक भोजन कराया जाता है। रात्रि में भजन-कीर्तन और जागरण का आयोजन कर वातावरण को भक्तिमय बनाया जाता है।
अगले दिन श्रद्धालु नम आंखों से मां गणगौर का पूजन कर विधि-विधान से विसर्जन करते हैं। यह पर्व क्षेत्र की संस्कृति, परंपरा और एकता का प्रतीक है, जहां सभी लोग एक सूत्र में बंधकर मां के नौ स्वरूपों का ध्यान करते हैं।
मान्यता है कि मां गणगौर अपने भक्तों के दुखों का निवारण कर उन्हें सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं। कई श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर माता के रथ को “बोडाने” की परंपरा निभाते हैं, जिसमें एक दिन रथ को अपने घर लाकर पूजा, जागरण और भंडारे का आयोजन किया जाता है, तत्पश्चात भावुक विदाई दी जाती है।
इसी कड़ी में रामनगर निवासी अर्चना भीम वास्कले ने भी सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ मां गणगौर की पूजा-अर्चना कर मां को रथ सजाकर परंपरा निभाई तथा जागरण और भोजन का आयोजन किया।
मां गणगौर का यह पर्व आस्था, संस्कृति और सामूहिक एकता का जीवंत उदाहरण है।