फगुआ मांगने निकला आदिवासी समाज
रंगों के पर्व होली के बाद बुरहानपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में आदिवासी समाज की एक अनोखी और सदियों पुरानी परंपरा देखने को मिल रही है। समाज के लोग आकर्षक पारंपरिक वेशभूषा धारण कर नृत्य और गीतों के साथ गांव-गांव घूमते हुए घर-घर जाकर फगुआ मांग रहे हैं। यह परंपरा लगभग पाँच दिनों तक चलती है, जिसमें ग्रामीणजन स्वेच्छा से अनाज और अन्य सामग्री देकर इस परंपरा में भागीदारी निभाते हैं।
होली के दूसरे दिन से शुरू होने वाली इस परंपरा में आदिवासी समाज के युवक और बुजुर्ग पारंपरिक वेशभूषा पहनकर, ढोल-मांदल की थाप पर नाचते-गाते हुए गांव-गांव निकलते हैं। अलग-अलग रूप और रंग में सजे ये लोग घर-घर जाकर फगुआ मांगते हैं, जिसे ग्रामीण खुशी-खुशी देते हैं।
ग्रामीणों द्वारा दिया गया अनाज और अन्य सामग्री समाज के लोग सामूहिक रूप से एकत्रित करते हैं। बाद में इस अनाज को बाजार में बेचकर जो राशि प्राप्त होती है, उससे परंपरा के अंतिम दिन सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है।
इस अवसर पर पारंपरिक मान्यता के अनुसार गुट यानी बकरे की बलि दी जाती है और पूरे समाज के लोग एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। यह परंपरा आदिवासी समाज में आपसी भाईचारे, सहयोग और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक मानी जाती है।
सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी बुरहानपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है, जिसमें युवा से लेकर बुजुर्ग तक बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं।

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