समझौते कागजों तक सीमित, जमीनी हकीकत जस की तससारनी/पाथाखेड़ा।कोयला खदानों में कार्यरत ठेका मजदूरों के कथित शोषण का मामला अब गंभीर रूप लेता जा रहा है। क्षेत्र में यह मुद्दा चौक-चौराहों से लेकर जनमंचों तक चर्चा का विषय बन चुका है, लेकिन प्रशासनिक दावों के बावजूद जमीनी स्तर पर हालात जस के तस बने हुए हैं। श्रम विभाग की कार्रवाई भी अब तक मजदूरों को राहत दिलाने में नाकाम साबित होती नजर आ रही है।

*समझौते हुए, पर अमल नहीं*

सूत्रों के अनुसार, क्षेत्र में पदस्थ श्रम अधिकारी की कार्यप्रणाली को लेकर मजदूरों और ठेकेदारों के बीच असंतोष गहराता जा रहा है। पूर्व में हुए आंदोलनों को समझौते के जरिए शांत तो करा दिया गया, लेकिन उन समझौतों का पालन आज तक नहीं हो पाया। इससे मजदूरों में असंतोष लगातार बढ़ रहा है।

*मजदूरी में भारी कटौती का आरोप*

सबसे गंभीर आरोप मजदूरी भुगतान को लेकर सामने आए हैं। मजदूरों का कहना है कि निर्धारित लगभग रूपये1365 प्रतिदिन की मजदूरी के स्थान पर उन्हें मात्र रूपये 500 से रूपये 600 प्रतिदिन देने का दबाव बनाया जा रहा है। कई मजदूरों को नियमित कार्य भी उपलब्ध नहीं कराया जा रहा, जिससे उनके सामने रोजी-रोटी का संकट गहराता जा रहा है।

मजदूरों ने आरोप लगाया है कि कुछ ठेकेदार और सुपरवाइजर नए श्रमिकों को कम दरों पर नियुक्त कर रहे हैं और पुराने अनुभवी मजदूरों को काम से बाहर किया जा रहा है। इससे न केवल श्रम कानूनों का उल्लंघन हो रहा है, बल्कि मजदूरों के अधिकारों का भी हनन हो रहा है।

*सुरक्षा मानकों की अनदेखी, जान जोखिम में*

खदानों में सुरक्षा को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। मजदूरों का आरोप है कि बिना आवश्यक प्रशिक्षण और प्रमाणपत्र (जैसे बीटीसी) के उन्हें बारूद ढुलाई जैसे अत्यंत जोखिमपूर्ण कार्यों में लगाया जा रहा है।

इसके अलावा, मेडिकल रूप से अयोग्य श्रमिकों से भी काम लिया जा रहा है, जिससे किसी भी समय बड़ा हादसा होने की आशंका बनी हुई है।

*आवाज़ उठाने पर ‘ब्लैकलिस्ट’ करने का आरोप*

मजदूरों का यह भी आरोप है कि जो श्रमिक अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाते हैं, उन्हें काम से बाहर कर उनकी तस्वीरें खदान परिसरों में चस्पा कर प्रतिबंधित किया जा रहा है। इससे न केवल उनकी आजीविका प्रभावित हो रही है, बल्कि उनके परिवार भी आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।

*प्रशासनिक कार्रवाई पर उठ रहे सवाल*

हालांकि स्थानीय प्रशासन द्वारा कार्रवाई के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर ठेकेदारों पर उसका कोई प्रभाव नजर नहीं आ रहा। इससे प्रशासन की कार्यप्रणाली और निष्क्रियता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

*जनप्रतिनिधियों से न्याय की उम्मीद*

बढ़ते आक्रोश के बीच अब मजदूर जिला मुख्यालय बैतूल पहुंचकर सांसद और विधायक से सीधे मुलाकात करने की तैयारी में हैं। मजदूरों को उम्मीद है कि जनप्रतिनिधियों के हस्तक्षेप से उन्हें न्याय मिलेगा और शोषण पर रोक लगेगी।

*बड़ा सवाल: आखिर कब मिलेगा मजदूरों को न्याय?*

पाथाखेड़ा की खदानों में मजदूरों के साथ हो रहा यह कथित शोषण न केवल श्रम कानूनों की अवहेलना है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं पर भी सीधा प्रहार है। यदि समय रहते ठोस और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं की गई, तो यह मामला जल्द ही बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है।