नेपानगर के ग्रामीण क्षेत्र के आदिवासी अंचलों में शनिवार और रविवार को दुदबोली अमावस्या का पर्व बेहद उत्साह और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। आदिवासी समाज में इस पर्व को “भावई” और “ठूडी” के नाम से भी जाना जाता है। यह अनोखा त्योहार बारिश के देवता इंद्र देव को समर्पित माना जाता है, जिसमें किसान अच्छी बारिश और भरपूर फसल की कामना करते हैं।

मान्यता है कि यह पर्व मानसून आने के करीब 8 से 10 दिन पहले मनाया जाता है। दुदबोली अमावस्या के बाद किसान अपने खेतों में खरीफ की फसल बोने की तैयारी शुरू कर देते हैं, जिसमें मुख्य रूप से मक्का और धान शामिल हैं।

त्योहार के दौरान गांवों में बच्चों ने पारंपरिक गीतों और सामूहिक नृत्य से माहौल को जीवंत बना दिया। खास बात यह रही कि बच्चों के समूह में एक बच्चे को हरे पत्तों से ढककर सजाया गया, वहीं एक टोकरी में मेढ़क रखकर गांव-गांव घूमते हुए लोगों से नेग मांगा गया। परंपरा के अनुसार नेग में केवल कच्चा अनाज ही लिया जाता है।

इसके बाद सभी बच्चे गांव के बाहर जामुन या आम के पेड़ के नीचे सामूहिक रूप से भोजन बनाते हैं और उसे प्रसादी के रूप में ग्रहण करते हैं। इस दौरान इंद्र देव से अच्छी बारिश, हरियाली और समृद्ध फसल की प्रार्थना की जाती है।

दुदबोली अमावस्या आदिवासी संस्कृति, प्रकृति प्रेम और सामूहिक एकता की ऐसी अनोखी मिसाल है, जो आज भी ग्रामीण अंचलों में परंपराओं को जीवित रखे हुए है।