'जाति है कि जाती नहीं': कुटीर उद्योगों की कब्र पर खड़ा औपनिवेशिक छलावा?

तिहास के पन्नों को पलटें तो एक समय था जब वैश्विक जीडीपी में भारत की हिस्सेदारी 25-30% हुआ करती थी। भारत यूं ही सोने की चिड़िया नहीं था; इसके पीछे यहाँ के उत्कृष्ट 'कुटीर उद्योगों' (आज की भाषा में MSME) का एक अभेद्य जाल था। जब विदेशी आक्रमणकारियों ने हमारी संपदा को लूटना शुरू किया, तो हमारे तत्कालीन बुद्धिजीवियों ने एक बेहद रणनीतिक कदम उठाया—उन्होंने धर्म और अर्थव्यवस्था, दोनों का 'विकेंद्रीकरण' (Decentralization) कर दिया।

आत्मनिर्भर 'स्टार्टअप इकोसिस्टम'

सत्ता के एक केंद्र पर निर्भर रहने চৈতন্য बजाय, उत्पादन की विधाओं को परिवार और पीढ़ियों की परंपरा में पिरो दिया गया। लोहारों की बस्ती, बढ़ई की बस्ती, इत्र बनाने वालों का मोहल्ला—ये अपने आप में आत्मनिर्भर 'स्टार्टअप इकोसिस्टम' थे। घर ही प्रयोगशाला थी और घर ही उत्पादन केंद्र। इसी पारिवारिक ज्ञान-हस्तांतरण का नतीजा था उत्कृष्ट 'वुट्ज़ स्टील' (Wootz Steel) और महरौली का वो लौह स्तंभ, जो 1500 साल बाद भी जंग-रोधी है। दुनिया आज तक इस तकनीक को डिकोड नहीं कर पाई है।

वैश्विक जीडीपी में ऐतिहासिक हिस्सेदारी

* ऐतिहासिक अनुमानों के अनुसार प्राचीन भारत की हिस्सेदारी 25% से 30% थी (चार्ट में औसत 28% दर्शाया गया है)।

औपनिवेशिक प्रहार: लूट का 'मैकाले' मॉडल और 'कास्ट' का जन्म

मुगलों तक यह उत्पादक व्यवस्था बची रही क्योंकि वे यहीं बस गए थे। लेकिन ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता का चरित्र अलग था। उनका उद्देश्य इस विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था को कुचलकर अपना माल बेचना था। उन्होंने हमारे कपड़े के व्यापार को मैनचेस्टर शिफ्ट कर दिया, कच्चा माल (कपास) कौड़ियों के भाव ले गए और 1857 के दौर में किसानों और कारीगरों पर लगान (Land Revenue) 95 प्रतिशत तक थोप दिया।

'कास्ट' का पुर्तगाली सच

इस सुनियोजित दोहन ने भारत की 'प्रोड्यूसर क्लास' (उत्पादक वर्ग) की कमर तोड़ दी। इसी दौर में एक और बड़ा वैचारिक खेल खेला गया। जिस 'कास्ट' (Caste) शब्द को लेकर आज हम एक-दूसरे का कॉलर पकड़ते हैं, वह मूलतः एक पुर्तगाली शब्द है। भारत में 'वर्ण व्यवस्था' काम (Occupation) पर आधारित थी—ठीक वैसे ही जैसे आज कोई जज है, कोई मंत्री है, या कोई सॉफ्टवेयर इंजीनियर है।

लेकिन अंग्रेजों ने अपनी 'फूट डालो और राज करो' नीति के तहत इस कर्म-आधारित व्यवस्था को जन्म-आधारित 'जातियों' की एक कठोर और शोषक बेड़ी में बदल दिया। इसके साथ ही, मैकाले की शिक्षा व्यवस्था थोप दी गई, जिसका एकमात्र उद्देश्य था हमारे पारिवारिक और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाले हुनर को 'पिछड़ा' साबित करना और अंग्रेजों की चाकरी करने वाले 'क्लर्क' पैदा करना।

आधुनिक दोगलापन: 'कारीगर' बनाम 'प्रोफेशनल' का छद्म-पूंजीवाद

आज की तथाकथित आधुनिक और शिक्षित व्यवस्था का मूल्यांकन करें, तो यह हमारे अपने ही दोगलेपन का एक भयावह उदाहरण प्रस्तुत करती है। हम आज भी 23-24 साल तक उस शिक्षा व्यवस्था में खप जाते हैं जिसका असल ज़िंदगी या कौशल से कोई लेना-देना नहीं है। यदि यही 23 साल इत्र बनाने या कोई पारंपरिक विधा सीखने में लगाए जाते, तो आज हम करोड़ों का व्यापार कर रहे होते।

छद्म-पूंजीवाद का दोहरा मापदंड

वर्तमान 'छद्म-पूंजीवाद' (Pseudo-Capitalism) का सबसे बड़ा मज़ाक यह है कि हमने काम को नहीं, बल्कि काम करने वाले के 'ठप्पे' को जातियों में बांट दिया है। एक आम नाई जब बाल काटता है, तो हम उसे नीचा मानते हैं, लेकिन जब कोई 'हबीब' 20,000 रुपये लेता है, तो वह 'सेलिब्रिटी हेयर स्टाइलिस्ट' है। गांव का रिश्ते तय करवाने वाला पिछड़ा कहलाया, लेकिन आज 'Shaadi.com' करोड़ों का 'यूनिकॉर्न स्टार्टअप' है। मोची को अछूत समझा गया, लेकिन 'Louis Vuitton' या 'Bata' का शोरूम देखकर हम नतमस्तक हो जाते हैं।

क्या यह वैचारिक दरिद्रता नहीं है कि काम वही है, लेकिन जब उसे कोई कॉरपोरेट या विदेशी ब्रांड करता है तो वह 'पूंजीवाद और विकास' है, और जब उसे हमारा अपना कारीगर करता है तो वह 'पिछड़ापन और नीची जाति' है?

संपादक की कलम से: राजनीतिक विमर्श और हाशिए का समाज

जातियों को वर्गीय संघर्ष (Class Struggle) का टूल बनाकर आज कुछ राजनीतिक ताकतें अपना स्वार्थ साध रही हैं। जातियों का मूल स्वरूप कौशल और उत्पादन था, न कि शोषण। जब तक हम जातियों को उनके इस 'मूल उत्पादक स्वरूप' में वापस नहीं लाएंगे और उन्हें आधुनिक शिक्षा व अर्थव्यवस्था के साथ नहीं जोड़ेंगे, तब तक कोई भी आरक्षण या सरकारी नीति इस खाई को नहीं भर सकती।

इस पूरी ऐतिहासिक और सामाजिक बहस के अंत में, एक समाज के तौर पर हमें इन चुभते हुए सवालों का सामना करना ही होगा:

1. क्या 'जाति' का यह वर्तमान हिंसक संघर्ष वास्तव में हमारा है, या हम अंग्रेजों द्वारा छोड़े गए 'फूट डालो' के हथियार से खुद को ही लहूलुहान कर रहे हैं?
2. 23-24 साल उस मैकाले-प्रेरित शिक्षा में खपाने का क्या औचित्य है, जो हमें हुनरमंद 'मालिक' बनाने के बजाय सिर्फ एक 'नौकरीपेशा क्लर्क' बनाकर छोड़ देती है?
3. हम विदेशी ब्रांड्स और महंगे 'प्रोफेशनल्स' को तो सिर-माथे पर बिठाते हैं, लेकिन अपने ही देश के पारंपरिक कारीगरों (प्रोड्यूसर क्लास) को 'पिछड़ा' क्यों मानते हैं?
4. क्या हम सच में अपने समाज को जातियों के इस राजनीतिक मकड़जाल से निकालकर उनके मूल 'कौशल-आधारित' सम्मानजनक स्वरूप में लौटाने को तैयार हैं, या यूं ही आपस में लड़कर अपनी बची-खुची आर्थिक रीढ़ भी तोड़ लेंगे?