500 वर्ष पुरानी परंपरा में घुला प्रेम का रंग, गोकुल चंद्रमा मंदिर में सास-बहू ने मिटाए मनमुटाव, खेली अनोखी होली!
निमाड़ अंचल की ऐतिहासिक धरोहर, लगभग 500 वर्ष प्राचीन गोकुल चंद्रमा मंदिर में इस वर्ष भी सास-बहू की अनूठी होली हर्षोल्लास के साथ मनाई गई। यह आयोजन केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि रिश्तों में प्रेम, सम्मान और नई शुरुआत का प्रतीक बन गया।
मंदिर के आदित्य हरी कृष्ण मुखिया ने जानकारी देते हुए बताया कि प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी परंपरा को पूरे विधि-विधान से निभाया गया। इस विशेष अवसर पर सास और बहुएं अपने आपसी मतभेदों और वाद-विवादों को भुलाकर मंदिर प्रांगण में एकत्रित होती हैं। यहां वे एक-दूसरे को रंग और गुलाल लगाकर गले मिलती हैं तथा नृत्य कर आपसी सौहार्द का संदेश देती हैं।
आज आयोजित इस कार्यक्रम में मंदिर परिसर रंगों और उल्लास से सराबोर नजर आया। ढोलक और पारंपरिक गीतों की मधुर धुनों पर महिलाओं ने उत्साहपूर्वक नृत्य किया। वातावरण में खुशी, अपनापन और सकारात्मक ऊर्जा स्पष्ट रूप से महसूस की जा सकती थी।
इस अनूठी परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां होली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि रिश्तों को मजबूत बनाने का माध्यम है। माना जाता है कि इस दिन जो भी मनमुटाव होते हैं, वे प्रेम और संवाद के साथ समाप्त हो जाते हैं। यही कारण है कि आसपास के गांवों से भी महिलाएं इस आयोजन में भाग लेने पहुंचती हैं।
निमाड़ क्षेत्र में अपनी अलग पहचान रखने वाला यह मंदिर सामाजिक समरसता का संदेश देता है। 500 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत और प्रभावशाली है।
गोकुल चंद्रमा मंदिर की यह सास-बहू होली समाज को यह प्रेरणा देती है कि रिश्तों में आई दूरियों को प्रेम के रंग से मिटाया जा सकता है — और यही है इस अनोखे उत्सव की सबसे बड़ी खासियत।

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