भारत की स्वदेशी जीवन-शैली और 'स्व' का जागरण: दृष्टिकोण, संस्कार और उद्देश्य का एक नया विमर्श

डॉ. मनमोहन वैद्य (अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के विचारों पर आधारित विशेष आलेख

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सम्मानित सदस्य, डॉ. मनमोहन वैद्य जी ने भारत की स्वदेशी जीवन-शैली और उसमें निहित ‘स्व’ (आत्म-बोध और स्वदेशी चेतना) के विषय पर अत्यंत महत्वपूर्ण और गहन विचार साझा किए हैं। सामान्यतः 'स्वदेशी' का अर्थ केवल भारत में निर्मित वस्तुओं के प्रधानतः उपयोग तक ही सीमित मान लिया जाता है, परंतु डॉ. वैद्य के अनुसार, इसके कई अन्य और अत्यंत महत्वपूर्ण वैचारिक, सांस्कृतिक तथा व्यावहारिक पहलू भी हैं। स्वदेशी का वास्तविक अर्थ केवल भौतिक वस्तुओं का उपयोग नहीं है, बल्कि यह हमारी सोच, हमारे दृष्टिकोण और हमारे जीवन जीने की पद्धति में गहराई से रचा-बसा होना चाहिए।

दृष्टिकोण का परिवर्तन: यूरोप-केंद्रित से भारत-केंद्रित विचार

स्वतंत्रता के पश्चात भारत की शिक्षा-पद्धति के समग्र मूल्यांकन और सुधार के लिए वर्ष 1964 से 1966 के दौरान डॉ. डी. एस. कोठारी के नेतृत्व में एक महत्वपूर्ण शिक्षा आयोग का गठन किया गया था। इस कोठारी आयोग का एक प्रमुख और ध्यान देने योग्य निष्कर्ष यह था कि भारत का वैचारिक जगत पूरी तरह से यूरोप-केंद्रित (Euro-centric) हो गया है, जबकि वास्तव में उसे अपनी जड़ों से जुड़कर पूरी तरह से भारत-केंद्रित (India-centric) होना चाहिए।

इस वैचारिक तथ्य को अधिक स्पष्टता से समझने के लिए कुछ समकालीन भू-राजनैतिक उदाहरणों पर दृष्टि डालना अत्यंत उपयोगी होगा। आज इज़राइल और हमास के बीच जो भयंकर युद्ध चल रहा है, उसे भारत सहित पूरी दुनिया की मुख्यधारा की मीडिया "मध्य-पूर्व (Middle East)" क्षेत्र का युद्ध कहकर संबोधित कर रही है। स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भी भारत लंबे समय तक उस विशिष्ट भूभाग को इसी यूरोपीय नाम से ही संबोधित करता रहा। किंतु हाल ही में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जब भारत के विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर उस क्षेत्र को "पश्चिम एशिया (West Asia)" कहना आरंभ किया है।

यहाँ यह प्रश्न उठता है कि क्या वहाँ युद्ध का भौगोलिक स्थान बदल गया है? इसका उत्तर है - नहीं। स्थान वही है, किंतु बदला है तो हमारा राष्ट्रीय दृष्टिकोण। खाड़ी के क्षेत्र को "मध्य-पूर्व" कहना इस बात को दर्शाता है कि हम आज भी वैचारिक रूप से यूरोप में बैठकर पूरी दुनिया को देख रहे हैं। भौगोलिक दृष्टि से विचार करें तो यूरोप के लिए भारत "पूर्व" में स्थित है, जापान उनके लिए "सुदूर पूर्व (Far East)" है और खाड़ी का क्षेत्र उनके परिप्रेक्ष्य में "मध्य-पूर्व" है। लेकिन भारत अब एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र है। अब हमारी भौगोलिक और राजनैतिक परिभाषाएँ हमारे अपने दृष्टिकोण से तय होंगी, पश्चिम की अंधी नकल से नहीं। इसीलिए स्पष्ट है कि भारत के लिए यूरोप पश्चिम दिशा में है, जापान पूर्व में है, और खाड़ी का क्षेत्र पश्चिम एशिया है। भौगोलिक सोच की यह आधारभूमि अब यूरोप की नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से भारत की होगी। यही वैचारिक स्वतंत्रता ही सच्ची स्वदेशी चेतना है।

शासन की मानसिकता से न्याय की ओर प्रस्थान

जब ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत पर अपना अधिकार जमाया, तो अंग्रेजों का मुख्य उद्देश्य केवल भारत की जनता पर शासन करना और उन्हें नियंत्रण में रखना था (To Rule over the People here)। इसी औपनिवेशिक मानसिकता के चलते उन्होंने भारतीय नागरिकों को नियंत्रित करने और उन्हें दंडित करने के दृष्टिकोण से अनेक कठोर नियमों और कानूनों का निर्माण किया। इन दंड-आधारित कानूनों को 'इंडियन पीनल कोड' (Indian Penal Code - IPC) का नाम दिया गया था।

परंतु आज के आधुनिक एवं स्वतंत्र भारत में, अब विदेशी ताकतों का नहीं बल्कि भारत की अपनी जनता का लोकतांत्रिक शासन है। एक स्वतंत्र राष्ट्र में व्यवस्था का मूल उद्देश्य केवल अपने नागरिकों को दंड देना नहीं हो सकता, बल्कि उन्हें त्वरित और उचित न्याय प्रदान करना होना चाहिए। इसी पवित्र भाव और वैचारिक परिवर्तन के साथ IPC का नाम बदलकर अब 'भारतीय न्याय संहिता' (BNS) किया गया है। यह कदम केवल एक सामान्य नाम परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण दृष्टिकोण का परिवर्तन है। भारत सरकार द्वारा वर्तमान में ऐसे अनेक सार्थक परिवर्तन किए जा रहे हैं और भविष्य में भी यह प्रक्रिया निरंतर जारी रहेगी।

कालगणना और भारतीय चेतना का वैज्ञानिक आधार

अंग्रेजों के भारत आने से बहुत पहले से ही भारत में सूर्य, चंद्र और पृथ्वी की खगोलीय गति पर आधारित पूरी तरह से शास्त्रसम्मत और अत्यंत सटीक कालगणना प्रचलित थी। हमारे महीनों के नाम भी नक्षत्रों की स्थिति पर आधारित थे। भारत के प्राचीन शास्त्रज्ञ और खगोलविद इतने उन्नत थे कि वे 50 से 100 वर्षों बाद होने वाले सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण की भी बिल्कुल सटीक वैज्ञानिक गणना पहले ही कर लेते थे।

इसके विपरीत, यदि पश्चिम के ग्रेगोरियन कैलेंडर के इतिहास को देखें, तो वह प्रारंभ में केवल दस महीनों का ही हुआ करता था। सितंबर (सात), अक्टूबर (आठ), नवंबर (नौ) और दिसंबर (दस) – इन नामों के मूल अर्थ ही सातवाँ, आठवाँ, नौवाँ और दसवाँ महीना हैं। बाद में वर्ष की गिनती पूरी करने के लिए जूलियस सीज़र के नाम पर 'जुलाई' और रोमन सम्राट ऑगस्टस के नाम पर 'ऑगस्ट (अगस्त)' महीना बीच में जबरन जोड़ा गया। इस अवैज्ञानिक परिवर्तन का परिणाम यह हुआ कि जो महीना नाम के अनुसार सातवाँ कहलाना चाहिए था (सितंबर), वह खिसक कर नौवाँ महीना बन गया।

भारतीय तिथि और जीवन के पावन संस्कार

आज भी पूरे भारतवर्ष में हमारे सभी प्रमुख पर्व और त्योहार किसी अंग्रेज़ी तारीख़ से नहीं, बल्कि पूर्णतः भारतीय पंचांग की तिथि से ही मनाए जाते हैं। उदाहरण के लिए – रामनवमी का पावन पर्व चैत्र शुक्ल नवमी को, रक्षाबंधन का त्योहार श्रावण पूर्णिमा को, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी श्रावण या भाद्रपद महीने की कृष्ण अष्टमी को, नवरात्रि अश्विन शुक्ल प्रतिपदा को, और विजयादशमी का पर्व अश्विन शुक्ल दशमी को ही पूरे उल्लास के साथ मनाया जाता है। अंग्रेज़ी कैलेंडर की तारीख़ चाहे जो भी हो, हमारे पर्व और अनुष्ठान हमारी अपनी तिथि के अनुसार ही तय होते हैं।

यहाँ एक बहुत ही प्रासंगिक प्रश्न यह उठता है कि जब हमारे सभी पर्व तिथि से होते हैं, तो क्या हम अपने जन्मदिन और विवाह की वर्षगाँठ (Anniversary) भी अपनी वैज्ञानिक भारतीय तिथि के अनुसार नहीं मना सकते? विवाह का शुभ दिन तय करते समय हम पंडित जी से शुभ मुहूर्त पूछते हैं, पंचांग देखते हैं, फिर उसी विवाह की वर्षगाँठ केवल अंग्रेज़ी तारीख़ से क्यों मनाई जाती है? भारतीय तिथि के अनुसार इन्हें मनाने का यह आग्रह इसलिए है क्योंकि यह हमारी अपनी कालगणना है – जो कि प्राचीन है, पूरी तरह से शास्त्रीय है और वैज्ञानिक आधार पर निर्मित है। यही हमारी पहचान है, यही हमारा 'स्व' है।

जन्मदिन मनाने का भारतीय भाव और संस्कार

आजकल अंग्रेज़ी तारीख़ के अनुसार जन्मदिन मनाने के नाम पर आधी रात (12 बजे) तक प्रतीक्षा करना, फिर केक काटना और एक-दूसरे के चेहरे पर केक की क्रीम लगाने जैसी भद्दी और अर्थहीन परंपराएँ समाज में चल पड़ी हैं।

किंतु, भारतीय महान परंपरा में किसी भी नए दिन का आरंभ आधी रात को अंधेरे में नहीं, बल्कि 'ब्रह्ममुहूर्त' (सूर्योदय से पूर्व के पवित्र समय) में ज्ञान के प्रकाश के साथ होता है। यदि किसी व्यक्ति का जन्मदिन भारतीय तिथि के अनुसार मनाया जाए, तो पूरे आयोजन का भाव-विश्व ही बदल जाता है। इस दिन की शुरुआत सुबह जल्दी उठने से होती है, फिर स्नान करके शुद्ध मन से ईश्वर के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित किया जाता है। घर के सभी बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लिया जाता है, जीवन में कोई नया और अच्छा संकल्प लिया जाता है, और समाज के कल्याण के लिए कुछ सकारात्मक करने का निश्चय किया जाता है।

इस भारतीय पद्धति से जन्मदिन मनाने से पूरे कुटुंब (परिवार) में एक असीम आनंद, पवित्र संस्कार और सच्चे उत्सव का वातावरण निर्मित होता है। यही भारत की वास्तविक स्वदेशी जीवन-शैली है – जहाँ हमारी सोच, हमारा समय, हमारे संस्कार और हमारा दैनिक व्यवहार – सब कुछ अपने ‘स्व’ से गहराई से जुड़ा हुआ हो। इसमें खर्च भी कम है और किसी का विरोध भी नहीं है। केवल अपना दृष्टिकोण बदलकर हम अपने जीवन को कहीं अधिक अर्थपूर्ण, शांत और भारतीय बना सकते हैं।

पढ़ाई, सीख और जीवन का महान उद्देश्य

हाल ही में एक अत्यंत विचारणीय लेख पढ़ने को मिला, जिसमें लेखक ने शिक्षा के वास्तविक अर्थ को स्पष्ट करते हुए लिखा है – "मैंने समाज में ऐसे अनेक लोगों को देखा है जो कागजों पर अधिक पढ़े-लिखे नहीं हैं, परंतु वे जीवन के अनुभवों से बहुत कुछ सीख चुके हैं। वहीं मैंने ऐसे भी लोगों को देखा है जो अकादमिक रूप से बहुत पढ़े-लिखे हैं, पर वे जीवन की वास्तविक सीख से बिल्कुल वंचित रह गए हैं।"

इसका सीधा सा अर्थ यह है कि केवल पढ़ाई (Education) और वास्तविक सीख (Learning) – दोनों एक जैसी चीजें नहीं हैं। पढ़ाई से व्यक्ति को आजीविका (धन कमाने) का साधन अवश्य मिलता है, परंतु जीवन की सीख से मनुष्य को जीवन का एक महान उद्देश्य (Purpose) मिलता है। जब किसी व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है, तो उसके जीवन की सही दिशा भी तय हो जाती है। दिशा तय होने पर जीवन की प्राथमिकताएँ (Priorities) अपने आप स्पष्ट हो जाती हैं। और जब मनुष्य उस तय उद्देश्य की दिशा में निरंतर और इमानदार प्रयास करता है, तो उसका जीवन एक बहती हुई नदी के प्रवाह की तरह अत्यंत सहज और सुंदर रूप से आगे बढ़ने लगता है।

नदी का यह स्वभाव है कि वह अपने दोनों किनारों की मर्यादा में रहकर ही बहती है, क्योंकि उसे अपना अंतिम गंतव्य भली-भांति पता होता है – उसे अंततः सागर में जाकर विलीन होना है। इसके ठीक विपरीत, जो व्यक्ति जीवन में केवल किताबी पढ़ाई करके सिर्फ पैसा कमाने को अपना एकमात्र लक्ष्य बना लेता है, उस व्यक्ति का जीवन एक तालाब के ठहरे हुए पानी के जैसा हो जाता है। वह तालाब ऊपर से देखने में भले ही बड़ा और स्थिर दिखाई देता है, पर भीतर से ठहरा हुआ होने के कारण उसका पानी धीरे-धीरे सड़ने लगता है और अंततः उसमें से दुर्गंध फैलने लगती है।

किताबें हमें जीवन में सीखने में सहायता अवश्य करती हैं। जैसा कि एक प्रसिद्ध कहावत में कहा भी गया है – “पहले हम पढ़ना सीखते हैं, और बाद में सीखने के लिए पढ़ते हैं।” (First we learn to read, then we read to learn.)

समय प्रबंधन और जीवन का संतुलन

इस संसार में जैसे मछली पानी में रहती है, वैसे ही हम सभी मनुष्य 'समय' के प्रवाह में रहते हैं। कोई भी मछली यह शिकायत नहीं कर सकती कि “मेरे पास पानी नहीं है।” ठीक उसी प्रकार कोई भी व्यक्ति यह बहाना नहीं बना सकता कि “मेरे पास समय नहीं है।” वास्तव में मानव जीवन में समस्या समय की कमी की नहीं होती, बल्कि समस्या कार्य-प्रबंधन (Task management) और कार्यों की सही प्राथमिकता तय करने की होती है।

जब हम अपने दैनिक कार्यों को सही प्राथमिकता के साथ व्यवस्थित करते हैं और उपलब्ध समय का उचित नियोजन (Planning) करते हैं, तो जीवन के महान उद्देश्य के लिए समय स्वतः ही उपलब्ध हो जाता है। इसके बाद उस बनाई गई योजना को दृढ़ता के साथ क्रियान्वित करना आवश्यक होता है।

इसीलिए, मानव जीवन में केवल धन अर्जन (पैसे कमाना) ही एकमात्र लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि जीवन का कोई उच्च और सामाजिक उद्देश्य अवश्य होना चाहिए। उस उच्च उद्देश्य की पूर्ति के लिए, प्रतिदिन सूर्योदय से पहले उठने का दृढ़ संकल्प लेना, फिर उस संकल्प को पूरा करने का प्रयास करना और बाद में उसे अपने दैनिक अभ्यास में ढालना अत्यंत आवश्यक है। जब व्यक्ति के सुबह उठने का समय निश्चित हो जाता है, तो रात को उसके सोने का समय भी अपने आप ही तय हो जाता है। जागने और सोने के इन दो किनारों के बीच जब मनुष्य का जीवन अनुशासित रूप से बहता है, तो उसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य स्वतः ही संतुलित और उत्तम रहता है।

यदि भारत के प्रत्येक घर में, परिवार के सभी सदस्य सूर्योदय से पहले उठने की इस प्राचीन परंपरा को अपना लें, तो समाज के जीवन की दिशा और दशा दोनों ही सकारात्मक रूप से बदल सकती हैं। इसमें केवल वे लोग अपवाद हो सकते हैं जो रात्रि-पारी (Night Shift) में काम करते हैं या जो किसी बीमारी से ग्रसित हैं। इस दिनचर्या से नियमित व्यायाम, योग और सूर्य नमस्कार स्वतः ही हमारी जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा बन जाते हैं। यह स्वस्थ और अनुशासित जीवन भी भारत के ‘स्व’ का ही एक सुंदर स्वरूप है।

"थोड़ा अधिक देना": भारत का मौन और शाश्वत संस्कार

अंग्रेज़ों के शासनकाल से पहले भारतवर्ष में कोई एक एकीकृत राजनैतिक शासन नहीं था। देश के विभिन्न हिस्सों में भाषा, पूजा-पद्धति, पहनावे और जीवन-शैली में अपार विविधता मौजूद थी। फिर भी एक अद्भुत सांस्कृतिक परंपरा पूरे भारतवर्ष में सदियों से समान रूप से देखने को मिलती है – और वह है "थोड़ा अधिक देने" की परंपरा।

जब भी कोई द्रव पदार्थ (जैसे दूध, तेल आदि) मापकर किसी को दिया जाता है, तो पूरा माप भरने के बाद बेचने वाला थोड़ा सा पदार्थ ऊपर से और अधिक डाल देता है। इसी तरह तराजू में तौलते समय भी, कांटा बिल्कुल बीच में (समान) आने के बाद भी दुकानदार मुट्ठी भर सामान थोड़ा अधिक दे देता है। यह मौन और त्यागपूर्ण परंपरा आज भी विशेषकर ग्रामीण भारत के बाजारों में पूरी तरह जीवित है।

यह केवल व्यापार करने की कोई शैली नहीं है, बल्कि यह भारत का सच्चा 'स्व'भाव है। इस छोटे से कार्य के पीछे की भावना अत्यंत गहरी और स्पष्ट है – “मैं समाज से जो भी मूल्य ले रहा हूँ, उसके बदले में मुझे समाज को किसी भी स्थिति में कम नहीं देना है, बल्कि थोड़ा अधिक ही लौटाना है।” समाज को कृतज्ञतापूर्वक अधिक लौटाने का यह जो पवित्र भाव है – वास्तव में यही सच्चा भारत है।

भ्रष्टाचार का स्थायी समाधान और सामाजिक पूँजी

यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज की आधुनिक और पश्चिम-प्रेरित शिक्षा व्यक्ति को बहुत अधिक आत्म-केंद्रित (Self-centered) बना रही है। यह शिक्षा व्यक्ति को केवल अपने व्यक्तिगत आर्थिक लाभ के संकीर्ण दृष्टिकोण से सोचने वाला बना रही है। जबकि इसके विपरीत, भारत का एक सामान्य जन अपने समाज को कुछ अधिक देने में एक सहज और आत्मिक आनंद का अनुभव करता है। यही भारत का मूल ‘स्व’भाव है।

यदि आज के समय में इस प्राचीन ‘स्व’भाव का पुनः जागरण हो जाए, और इसे हमारे दैनिक व्यवहार में पूरी तरह उतार लिया जाए, तो इस देश में भ्रष्टाचार के लिए कोई स्थान ही नहीं बचेगा। इसके पीछे का भाव बहुत स्पष्ट है – एक कर्मचारी या अधिकारी यह सोचे कि "मैं अपने कार्य के लिए सरकार या समाज से जो भी वेतन या मूल्य ले रहा हूँ, मुझे अपने परिश्रम और ईमानदारी से उससे कहीं अधिक समाज को लौटाना है, कम किसी भी स्थिति में नहीं देना है।" कामचोरी या रिश्वतखोरी का विचार ही समाप्त हो जाएगा। यही भारत की स्वदेशी जीवन-शैली और भारत के ‘स्व’ का सबसे सच्चा और व्यावहारिक प्रकटीकरण है।

स्वामी विवेकानंद की आयरिश मूल की महान शिष्या, भगिनी निवेदिता (Sister Nivedita) ने समाज और राष्ट्रीय जीवन से जुड़ी एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही है। उनका स्पष्ट कहना है कि जिस समाज में लोग अपने कठोर परिश्रम से अर्जित किए गए पारिश्रमिक (धन या ज्ञान) को केवल अपने व्यक्तिगत स्वार्थ तक सीमित न रखकर, उसे समाज के वृहद हित में अर्पित करते हैं, वहाँ सामूहिक प्रयास से एक विशेष प्रकार की 'सामाजिक पूँजी' (Social Capital) का निर्माण होता है। इसी अभूतपूर्व सामाजिक पूँजी के बल पर पूरा समाज एक साथ समृद्ध बनता है और परिणामस्वरूप उस समाज का प्रत्येक व्यक्ति भी अपने आप समृद्ध हो जाता है।

वास्तव में यही सच्चा 'धर्म' है। यह धर्म किसी विशेष पंथ (Sect) या रिलीजन (Religion) की संकीर्ण सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज को एक साथ जोड़ने वाली और परस्पर एक सूत्र में बाँधने वाली एक महान जीवन-दृष्टि है। भगिनी निवेदिता आगे चेतावनी देते हुए कहती हैं कि जिस समाज में लोग अपने परिश्रम का फल केवल स्वयं के लिए संचित (Hoard) करते हैं और अपने समाज को कुछ भी वापस नहीं लौटाते हैं, उस समाज में कुछ गिने-चुने व्यक्ति तो बहुत संपन्न दिखाई दे सकते हैं, किंतु समग्र रूप से वह समाज हमेशा दरिद्र ही बना रहता है।

इसलिए यह नितांत आवश्यक है कि यदि त्याग और समर्पण के इस विचार को हमारी स्वदेशी जीवनशैली का अभिन्न अंग बना लिया जाए, तो हमारे समाज का संपूर्ण स्वरूप ही सकारात्मक रूप से बदल सकता है। परंतु इस महान कार्य के लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति का सजग और सक्रिय सहयोग अत्यंत आवश्यक है।

धर्मप्राण राष्ट्र और कर्म ही पूजा

भारत का विचार और आचरण सदियों से सदा एक ही रहा है – "उत्पादन में प्रचुरता हो, वितरण में पूरी समानता हो और उपभोग में हमेशा संयम हो।" अपने व्यक्तिगत उपभोग को संयमित करके, अपने ही अधिकार का बचा हुआ हिस्सा समाज के हित में पूरी आत्मीयता के साथ समर्पित कर देना ही सच्चा धर्म है। वहीं दूसरी ओर, अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को कष्ट पहुँचाकर या उनके अधिकारों को बलपूर्वक छीनकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना सबसे बड़ा पाप है।

भारत भूमि की इसी शाश्वत भावना को ध्यान में रखते हुए, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के नेतृत्व ने कुछ अत्यंत प्रतीकात्मक और विचार-प्रधान निर्णय लिए थे। यही कारण है कि आज हमारी लोकसभा का आदर्श वाक्य है – "धर्मचक्र प्रवर्तनाय", राज्यसभा का आदर्श वाक्य है – "सत्यम् वद, धर्मम् चर", और भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) का बोध वाक्य है – "यतो धर्मस्ततो जयः" (जहाँ धर्म है, वहीं विजय है)। यहाँ तक कि हमारे राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगे) के मध्य में स्थित चक्र भी उसी महान 'धर्मचक्र' का ही पावन प्रतीक है।

इन सभी बातों से सिद्ध होता है कि भारत मूलतः एक 'धर्मप्राण राष्ट्र' है। जब हमारे जीवन में अर्थ (धन) और काम (इच्छाएँ) – ये दोनों पुरुषार्थ, धर्म के कठोर अनुशासन में रहकर चलते हैं, तब व्यक्ति के लिए 'मोक्ष' की प्राप्ति अत्यंत स्वाभाविक हो जाती है। हमारे शास्त्रों में स्पष्ट है कि दया ही धर्म का मूल है, जबकि अहंकार ही सभी पापों की जड़ है। इसलिए मानव जीवन में एक ओर एकांत में बैठकर आत्म-साधना करना और दूसरी ओर लोकांत (समाज के बीच) जाकर निस्वार्थ सेवा करना – इन दोनों के बीच एक उत्तम संतुलन होना अत्यंत आवश्यक है।

स्वामी विवेकानंद ने इसी महान भाव को “शिवभाव से जीव सेवा” अर्थात "To serve man is to serve God" के दिव्य सूत्र द्वारा अत्यंत सरलता से स्पष्ट किया है। उन्होंने समाज के सबसे गरीब और पिछड़े वर्ग (दरिद्र नारायण) की सेवा को ही साक्षात ईश्वर की पूजा के समान माना है। सच में, यही भारत का मूल ‘स्व’ है और यही हमारी वास्तविक स्वदेशी जीवनशैली है।

पवित्र भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है – "स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः" और "स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः"

इसका सीधा अर्थ यह है कि जो मनुष्य अपने स्वधर्म रूपी कर्म में पूरी निष्ठा के साथ रत रहता है, वही सिद्धि को प्राप्त करता है और अपने द्वारा किए गए उत्तम कर्मों के माध्यम से ही वह सच्चे अर्थों में ईश्वर की आराधना करता है।

इसी बात को महाराष्ट्र के महान संत ज्ञानेश्वर महाराज ने अपनी ज्ञानेश्वरी में और भी सरल शब्दों में समझाते हुए कहा है – "तेया सर्वात्मका ईश्वरा, स्वकर्म कुसुमांची वीरा, पूजा केली होय अपारा, तोषा लागी।" (इसका अर्थ यह है कि इस समाजरूपी सर्वव्यापक ईश्वर की, जब व्यक्ति अपने कर्मरूपी ताजे पुष्पों से निष्काम पूजा करता है, तो ईश्वर अत्यंत प्रसन्न होते हैं।)

इन सभी महान विचारों और दर्शन का अंतिम सार यही है कि हमारा प्रत्येक दैनिक कार्य समाज-पूजा के पवित्र भाव से ही किया जाना चाहिए। जिस प्रकार हम मंदिर में भगवान की पूजा के लिए बगीचे से सबसे ताजे, सुगन्धित और श्रेष्ठ पुष्प चुनकर लाते हैं, ठीक उसी प्रकार हमारे द्वारा समाज के लिए किए जा रहे सभी कर्म भी पूरी तरह से उत्कृष्ट, शुद्ध और सर्वोत्तम होने चाहिए।

यही हमारे गौरवशाली भारत का सच्चा ‘स्व’ है। यही विचार हमारा स्थायी ‘स्व’भाव बनना चाहिए। जिस दिन यह महान दृष्टिकोण हमारी दैनिक जीवनशैली का अंतरंग और अभिन्न हिस्सा बन जाएगा, तब हमारा समाज-जीवन और हमारा राष्ट्र-जीवन कितना अधिक सुंदर, समृद्ध और मनभावन हो जाएगा, इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। अंततः, यही भारत की वास्तविक और सच्ची स्वदेशी जीवनशैली है।


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