ब्राह्मी लिपि के सम्मान से जागी संस्कृति संरक्षण की अलख

आचार्य श्री सुनीलसागर जी के सान्निध्य में भव्य सत्कार समारोह, मंत्री कैलाश विजयवर्गीय व तुलसी सिलावट ने लिया गुरुदेव का आशीर्वाद

इंदौर, 13 सितंबर। (संवाददाता मुकेश कुमार जैन)। अभय प्रशाल हॉल में आचार्य श्री 108 सुनीलसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में ब्राह्मी लिपि सत्कार समारोह भव्य रूप से आयोजित हुआ। कार्यक्रम में मध्यप्रदेश शासन के कैबिनेट मंत्री श्री कैलाश विजयवर्गीय एवं मंत्री श्री तुलसी सिलावट शामिल हुए। दोनों मंत्रियों ने गुरुदेव के चरणों में नमन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

समारोह को संबोधित करते हुए श्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि भारत का इतिहास, संस्कृति, संस्कार और परंपराएं अत्यंत गौरवशाली हैं। भारत में विश्वगुरु बनने की अपार क्षमता है और उन्हें विश्वास है कि भारत पुनः विश्वगुरु बनेगा। उन्होंने ब्राह्मी लिपि के संरक्षण एवं पुनर्जीवन के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि यह उनके लिए सौभाग्य है कि आचार्य भगवंत ने ब्राह्मी लिपि में उनका नाम लिखकर उन्हें प्रदान किया।

उन्होंने कहा कि ब्राह्मी भारत की प्राचीनतम लिपियों में से एक है और अनेक प्राचीन शिलालेखों में इसका प्रयोग हुआ है। हमारी भाषा, संस्कृति और परंपराएं ही हमारी वास्तविक शक्ति हैं। गुरुदेव द्वारा ब्राह्मी लिपि के प्रचार-प्रसार का कार्य भारतीय संस्कृति को पुनः प्रतिष्ठित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।

मंत्री श्री तुलसी सिलावट ने भी गुरुदेव के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा, “गुरुदेव, आप जो कुछ कहेंगे, मैं उसे करने के लिए तैयार हूं। आप आदेश दीजिए।” उनके इस भाव ने गुरुदेव के प्रति उनकी आस्था और समर्पण को दर्शाया।

सच्चा विकास वही, जिसमें इंसानियत और नैतिकता ऊंची हो

आचार्य श्री सुनीलसागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि सड़कें चौड़ी और इमारतें ऊंची होना विकास की निशानी हो सकती है, लेकिन इंसानियत ऊंची हो और जीवन में नैतिकता हो, वही सच्चे विकास की पहचान है।

उन्होंने कहा कि दुनिया का सबसे अच्छा व्यक्ति बाहर मत खोजिए, अपने भीतर झांकिए और स्वयं को श्रेष्ठ बनाने का प्रयास कीजिए। जीवन ऐसा हो कि व्यक्ति जहां जाए वहां प्रसन्नता आए और जहां से जाए, लोग उसके लौटने की प्रतीक्षा करें।

गुरुदेव ने “Success with Ethics” का संदेश देते हुए कहा कि सफलता तभी सार्थक है, जब उसके साथ नैतिकता और सिद्धांत जुड़े हों। भगवान श्रीराम का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आज भी उनकी पहचान उनकी मर्यादा और जीवन-मूल्यों के कारण है। जीवन में ऐसे सिद्धांत होने चाहिए, जो परिस्थितियां बदलने पर भी न बदलें।

गौ-संरक्षण और संस्कृति संरक्षण का आह्वान

आचार्य श्री ने गौ-संरक्षण पर भी जोर देते हुए कहा कि जिस प्रकार लोग घर-घर में कुत्ते पालते हैं, उसी प्रकार यदि गाय पालने का संकल्प लिया जाए तो गौ-सुरक्षा का कार्य स्वतः मजबूत हो सकता है।

उन्होंने ब्राह्मी लिपि को भारत की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर बताते हुए कहा कि हमारी प्राचीन लिपियों, भाषा, संस्कार और संस्कृति का संरक्षण केवल किसी एक संस्था का नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय का दायित्व है।

समारोह ने ब्राह्मी लिपि और भारतीय संस्कृति के संरक्षण की अलख जगाने के साथ समाज को नैतिकता, संस्कार, गौ-संरक्षण और संस्कृति के प्रति जिम्मेदारी का प्रभावी संदेश दिया।