विनय से मिटता है अहंकार, गुणों को ग्रहण करने की खुलती है राह — सुरत्न सागराचार्य महाराज
सिद्धक्षेत्र मथुरा चौरसी में श्रद्धालुओं को दिया विनय और संस्कार का संदेश
मथुरा चौरसी (उ.प्र.संवाददाता मुकेश कुमार जैन)। सिद्धक्षेत्र मथुरा चौरसी में परम पूज्य स्थविर संत श्री 108 सुरत्न सागराचार्य जी महाराज ने विनय-सम्पन्नता भावना पर प्रकाश डालते हुए श्रद्धालुओं को जीवन में विनय, नम्रता और सद्गुणों को अपनाने की प्रेरणा दी।
महाराज श्री ने कहा कि जहाँ अहंकार समाप्त होता है, वहीं विनय का जन्म होता है। विनय मनुष्य के व्यक्तित्व को महान बनाती है। जो व्यक्ति गुणी और श्रेष्ठजनों के सामने झुकना जानता है, वही उनके गुणों को अपने जीवन में ग्रहण करने की पात्रता भी रखता है।
उन्होंने कहा कि अहंकार व्यक्ति को ज्ञान और सद्गुणों से दूर कर देता है, जबकि विनय का भाव मनुष्य के भीतर सीखने और आत्मसुधार की भावना उत्पन्न करता है। जीवन में सच्ची उन्नति के लिए अपने से श्रेष्ठ, ज्ञानी एवं गुणवान व्यक्तियों के प्रति सम्मान और विनम्रता का भाव रखना आवश्यक है।
महाराज श्री ने कहा कि विनय केवल झुकने का नाम नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार को समाप्त कर सद्गुणों को स्वीकार करने की साधना है। विनयशील व्यक्ति दूसरों से सीखने के साथ स्वयं के व्यक्तित्व को भी निरंतर निखारता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि जीवन में सम्मान पाने की इच्छा रखने से पहले दूसरों को सम्मान देना सीखना चाहिए। विनय मनुष्य के व्यवहार को मधुर बनाती है और उसके भीतर आत्मिक विकास का मार्ग प्रशस्त करती है।
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