तिरंगे की शान में गूंजा गुरुदेव का राष्ट्र संदेश, राजवाड़ा तक निकली भव्य तिरंगा यात्रा

राजवाड़ा, इंदौर। (संवाददाता मुकेश कुमार जैन) स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आचार्य श्री 108 सुनीलसागरजी गुरुदेव ससंघ एवं हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में रामाशाह मंदिर से राजवाड़ा तक भव्य तिरंगा यात्रा निकाली गई। राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।

राजवाड़ा पहुंचने पर ध्वजारोहण, राष्ट्रगान एवं मंगलाचरण के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर गुरुदेव को जिनवाणी भेंट की गई। इसके बाद आचार्य श्री ने मंगल प्रवचन में स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं देते हुए राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रधर्म और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश दिया।

 

आचार्य श्री ने कहा कि आजादी का यह ताज भारत ने बड़े तप और बलिदान से प्राप्त किया है। देश की स्वतंत्रता के लिए अनेक वीरों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया। आज हम स्वतंत्र भारत की खुली हवा में सांस ले रहे हैं, इसलिए स्वतंत्रता के महत्व को समझते हुए राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए।

 

उन्होंने कहा कि “भारत हमारा बड़ा घर है और हमारा घर छोटा भारत है।” जिस प्रकार हम अपने घर की सुरक्षा, स्वच्छता और उन्नति के लिए प्रयास करते हैं, उसी भावना से देश के लिए भी कार्य करना चाहिए। उन्होंने युवाओं और नागरिकों से राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना जागृत करने का आह्वान किया।गुरुदेव ने कहा कि यात्रा के दौरान छूटे हुए जूते को ढूंढने के लिए लोग जिस जुनून के साथ प्रयास करते हैं, यदि उतना ही जुनून देश के लिए दिखाया जाए तो भारत की तस्वीर बदल सकती है। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में जैन समाज के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि जैन समाज के अनेक वीरों ने भी देश की आजादी के लिए अपना बलिदान दिया।उन्होंने इतिहास के अनसुने वीरों और वीरांगनाओं को याद करते हुए कहा कि देश की स्वतंत्रता के लिए विभिन्न क्षेत्रों में अनेक लोगों ने साहस और त्याग का परिचय दिया। हमें उन सभी वीरों के बलिदान को स्मरण करना चाहिए, जिनके कारण आज हम स्वतंत्र हैं।राष्ट्रभाषा के प्रति जागरूकता का संदेश देते हुए आचार्य श्री ने कहा—“देश प्रेम की मिठास शब्दों में घोलिए, अब अंग्रेजी नहीं, हिंदी बोलिए।” उन्होंने कहा कि जैन समाज ने सदैव राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दिया है और युवाओं को राष्ट्रहित में आगे बढ़कर कार्य करना चाहिए।

भारत नाम की ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि ‘भारत’ नाम का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों और पुराणों में मिलता है। भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत से लेकर भगवान श्रीराम के भाई भरत तथा दुष्यंत-शकुंतला के पुत्र भरत तक, ‘भरत’ नाम भारतीय परंपरा में विशेष महत्व रखता है।आचार्य श्री ने कहा कि देश तो स्वतंत्र हो गया, अब हमें अपने विकारों को भी स्वतंत्र करना होगा। उन्होंने अहिंसा और जीवदया का संदेश देते हुए मांस व्यापार को बंद करने तथा गौहत्या पर रोक की दिशा में समाज को जागरूक होने का आह्वान किया।इसके पश्चात दोपहर 1 बजे से श्री मनोकामना सिद्धि विधान एवं सर्वशांति महायज्ञ के प्रथम दिवस का आयोजन हुआ। इसमें हजारों श्रावक-श्राविकाओं ने जोड़े सहित सम्मिलित होकर धार्मिक अनुष्ठान का लाभ लियसंध्याकाल में गुरुमुख से शंका समाधान कार्यक्रम आयोजित हुआ, जिसमें श्रद्धालुओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया गया। इसके बाद गुरुदेव की मंगलमय आरती के साथ कार्यक्रमों का समापन हुआ।स्वतंत्रता दिवस पर आयोजित यह आयोजन राष्ट्रभक्ति, अध्यात्म, अहिंसा और सामाजिक उत्तरदायित्व का सुंदर संगम बनकर सामने आया।