जीवन के तीन मोड़ और अध्यात्म का मार्ग : आचार्य श्री 108 सुनीलसागरजी महाराज ने समय, शक्ति और समझ का गूढ़ रहस्य समझाया

नेमीनगर, इंदौर (मुकेश कुमार जैन ) परम पूज्य आचार्य श्री 108 सुनीलसागरजी महाराज ने अपने प्रेरणादायी प्रवचन में मानव जीवन की अनमोल यात्रा का अत्यंत मार्मिक एवं आध्यात्मिक विवेचन करते हुए कहा कि "जीवन एक अंतर्देशीय पत्र के समान है। जैसे अंतर्देशीय पत्र एक बार मुड़ता है, फिर दूसरी बार और तीसरी बार मुड़ते ही अपने गंतव्य की ओर भेज दिया जाता है, उसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी तीन महत्वपूर्ण पड़ाव— बचपन, युवावस्था और बुढ़ापा— से होकर गुजरता है। इसके पश्चात प्रत्येक जीव को इस संसार से विदा होना ही पड़ता है।"आचार्य ने बताया कि बचपन में समय और शक्ति दोनों भरपूर होते हैं, लेकिन धन का अभाव रहता है। बालक अपनी असीम ऊर्जा और निश्छलता से पूरे परिवार को आनंदित करते हैं, पर उनके पास आर्थिक संसाधन नहीं होते।उन्होंने कहा कि युवावस्था में शक्ति और धन तो प्राप्त हो जाते हैं, लेकिन समय सबसे बड़ी कमी बन जाता है। जीवन की भागदौड़, जिम्मेदारियों और महत्वाकांक्षाओं के बीच व्यक्ति स्वयं के लिए भी समय नहीं निकाल पाता।बुढ़ापे का उल्लेख करते हुए आचार्य ने कहा कि इस अवस्था में समय और धन उपलब्ध हो सकते हैं, किंतु शरीर की शक्ति साथ नहीं देती। इस प्रकार जीवन के प्रत्येक चरण में कोई न कोई अभाव अवश्य रहता है।आचार्य श्री ने आगे कहा कि संसार में समय और समझ का एक साथ मिलना अत्यंत दुर्लभ है। प्रायः जब समय होता है तब समझ नहीं होती और जब समझ आती है तब समय निकल चुका होता है। किंतु जो व्यक्ति समय, शक्ति और सम्यक् समझ— तीनों का सदुपयोग करते हुए धर्म, आत्मचिंतन और अध्यात्म का मार्ग अपनाता है, वही अपने जीवन को सार्थक बनाकर भवसागर से पार होने का वास्तविक पुरुषार्थ कर सकता है।

 

प्रवचन के अंत में आचार्य श्री 108 सुनीलसागर महाराज ने उपस्थित श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे जीवन के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करें, धर्म को जीवन का आधार बनाएं तथा आत्मकल्याण और अध्यात्म की दिशा में निरंतर आगे बढ़ें।