दृष्टि का जागरण ही आत्मज्ञान का प्रथम सोपान : आचार्य श्री 108 सुनीलसागरजी महाराज

 

 

नेमीनगर, इंदौर | संवाददाता : मुकेश कुमार जैन

 

परम पूज्य आचार्य श्री 108 सुनीलसागरजी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में कहा कि केवल आँखें खुल जाने से कोई व्यक्ति प्रज्ञावान नहीं बन जाता। वास्तविक प्रज्ञा तब प्रकट होती है, जब मनुष्य की दृष्टि जागृत होती है। जागृत दृष्टि ही सही समझ, विवेक तथा जीवन के वास्तविक स्वरूप का बोध कराती है।

 

आचार्य श्री ने कहा कि यह संसार समुद्र की लहरों की भाँति अत्यंत चंचल और परिवर्तनशील है। अनादि काल से असंख्य लोग इस संसार में आए, अपनी प्रतिभा, सामर्थ्य और उपलब्धियों का परिचय देकर चले गए, किंतु कोई भी यहाँ स्थायी नहीं रह सका। इसलिए इस नश्वर संसार को ही अंतिम सत्य मान लेना उचित नहीं है।

 

उन्होंने समुद्र का उदाहरण देते हुए कहा कि सामान्य व्यक्ति उसकी ऊँची-ऊँची लहरों, ज्वार-भाटे और बाहरी हलचल को देखकर आकर्षित हो जाता है, जबकि ज्ञानी पुरुष समुद्र की गहराई, शांति और स्थिरता का अनुभव करता है। इसी प्रकार जीवन का वास्तविक आनंद बाहरी चकाचौंध और भौतिक आकर्षणों में नहीं, बल्कि आत्मा की शांति, समता और अंतर्मन की स्थिरता में निहित है।

 

गुरुदेव ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि यदि जीवन में सच्ची प्रज्ञा प्राप्त करनी है तो बाहरी आकर्षणों से ऊपर उठकर अपनी दृष्टि का विकास करना होगा। जब मनुष्य की दृष्टि बदलती है, तभी जीवन का वास्तविक अर्थ स्पष्ट होता है और वह स्थायी सुख, आत्मिक शांति तथा आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर होता है।

 

प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने आचार्य श्री के प्रेरणादायी संदेश को आत्मसात करते हुए अपने जीवन में विवेक, समता, आत्मचिंतन एवं आध्यात्मिक जागरण को अपनाने का संकल्प लिया।