सिवनी-:

सिवनी जिले के घंसौर नगर में सरकारी जमीनों पर कब्जे और अतिक्रमण को लेकर एक बार फिर प्रशासन की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है। नगर के रकबा नंबर 359 की सरकारी भूमि पर चबूतरा निर्माण कराए जाने को लेकर ग्रामीणों ने स्थानीय प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जिस भूमि से पहले अस्थायी टपरों को प्रशासनिक कार्रवाई के तहत हटाया गया, उसी स्थान पर अब ग्राम पंचायत द्वारा चबूतरे का निर्माण कराया जा रहा है।

मामले ने इसलिए भी तूल पकड़ लिया है क्योंकि निर्माण को लेकर ग्राम पंचायत के पास कोई स्पष्ट लिखित आदेश होने की बात सामने नहीं आ रही है। वहीं ग्राम पंचायत के उपसरपंच की ओर से निर्माण को अनुविभागीय अधिकारी के आदेश पर कराया जाना बताया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर सरकारी भूमि पर निर्माण की अनुमति किसके आदेश से दी गई और उसका वैधानिक आधार क्या है?

*पहले हटाए टपरे, अब उसी जगह बन रहा चबूतरा*

ग्रामीणों के अनुसार, रकबा नंबर 359 की भूमि पर पहले कुछ अस्थायी टपरे मौजूद थे। तहसीलदार द्वारा नोटिस जारी कर इन्हें हटवाया गया। इसके बाद उसी स्थान पर अब पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में ग्राम पंचायत द्वारा चबूतरे का निर्माण शुरू कर दिया गया।

ग्रामीणों का आरोप है कि यदि उक्त भूमि सरकारी है और वहां अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की गई थी, तो फिर उसी सरकारी भूमि पर नया निर्माण किस नियम के तहत कराया जा रहा है? ग्रामीणों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।

*मूर्ति स्थापना को लेकर पहले भी आमने-सामने आए दो पक्ष*

बताया जाता है कि उक्त भूमि पर प्रतिमा स्थापित करने को लेकर पूर्व में भी विवाद की स्थिति बन चुकी है। पिछले दिनों लखनादौन विधायक योगेंद्र सिंह बाबा द्वारा यादव समाज को गाय-बछड़े की प्रतिमा तथा आदिवासी समाज को भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा दिए जाने के बाद दोनों पक्षों में प्रतिमा स्थापना को लेकर मतभेद सामने आए थे।

एक पक्ष उक्त स्थान को भगवान बिरसा मुंडा की पूजा से जुड़ा स्थल बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष गाय-बछड़े की प्रतिमा स्थापित करने की मांग कर रहा है। इसी विवाद के बीच अब उसी स्थान पर चबूतरे का निर्माण कराया जाना प्रशासन की भूमिका पर सवाल खड़े कर रहा है।

*सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला, उठे गंभीर सवाल*

मामले में ग्रामीण और शिकायतकर्ता वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सार्वजनिक एवं सरकारी भूमि पर प्रतिमाओं और धार्मिक ढांचों को लेकर दिए गए निर्देशों का हवाला दे रहे हैं। उनका कहना है कि सरकारी भूमि को किसी व्यक्ति या संस्था की निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और सार्वजनिक स्थानों पर इस प्रकार के निर्माण को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं।

ऐसे में सवाल यह है कि क्या रकबा नंबर 359 की सरकारी भूमि पर चबूतरा निर्माण इन दिशा-निर्देशों के अनुरूप है? यदि है, तो इसकी अनुमति किस सक्षम अधिकारी ने दी? और यदि अनुमति दी गई है तो उसका लिखित आदेश सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?

*मूर्ति की आड़ में सरकारी जमीन पर कब्जे का आरोप*

ग्रामीणों का आरोप है कि घंसौर क्षेत्र में सरकारी जमीनों पर कब्जा करने के लिए कई स्थानों पर धार्मिक एवं सामाजिक भावनाओं से जुड़े प्रतीकों और प्रतिमाओं का सहारा लिया जा रहा है। पहले प्रतिमा या चबूतरा बनाया जाता है और बाद में धीरे-धीरे आसपास की जमीन पर कब्जे का रास्ता तैयार होने की आशंका जताई जा रही है।

यदि ये आरोप सही हैं तो यह केवल एक जमीन का मामला नहीं, बल्कि सरकारी संपत्तियों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।

*जब समाज के पास जमीन है तो सरकारी जमीन ही क्यों?*

सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि यदि किसी समाज को अपने महापुरुष या धार्मिक प्रतीक की प्रतिमा स्थापित करनी है तो इसके लिए निजी अथवा विधिवत आवंटित भूमि का उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा? ग्रामीणों का कहना है कि संबंधित दोनों पक्षों के पास निजी जमीनें उपलब्ध हैं, ऐसे में सरकारी भूमि को लेकर विवाद खड़ा करना उचित नहीं है।

*कलेक्टर से जांच और सरकारी भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने की मांग*

अब पूरे मामले में जिला प्रशासन की भूमिका पर निगाहें टिक गई हैं। ग्रामीणों ने जिला कलेक्टर से मांग की है कि रकबा नंबर 359 की भूमि का राजस्व रिकॉर्ड खंगालकर यह स्पष्ट किया जाए कि भूमि का वास्तविक स्वरूप क्या है, चबूतरा निर्माण के लिए किस अधिकारी ने अनुमति दी और निर्माण के लिए किस मद से राशि खर्च की जा रही है।

साथ ही यह भी जांच की जाए कि घंसौर क्षेत्र में सरकारी जमीनों पर कहीं प्रतिमाओं, चबूतरों अथवा धार्मिक-सामाजिक संरचनाओं की आड़ में अतिक्रमण तो नहीं किया जा रहा।

फिलहाल रकबा नंबर 359 पर बन रहा यह चबूतरा केवल एक निर्माण नहीं, बल्कि सरकारी भूमि के इस्तेमाल, प्रशासनिक आदेशों की पारदर्शिता और अतिक्रमण नियंत्रण की पूरी व्यवस्था पर बड़ा सवाल बनकर सामने आया है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस मामले में जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाता है या सरकारी जमीन पर उठ रहे सवाल यूं ही फाइलों में दबे रह जाते हैं।