आइए, केंद्र और मध्य प्रदेश के हालिया बजटों की चीरफाड़ कर इस 'सिस्टेमेटिक डायवर्जन' की सच्चाई को समझें।
वित्तीय वर्ष 2024-25 के केंद्रीय बजट में सरकार ने बड़े गर्व से अनुसूचित जाति उप-योजना (SCSP) के लिए ₹1.65 लाख करोड़ और जनजातीय उप-योजना (TSP) के लिए ₹1.25 लाख करोड़ का आवंटन किया। यह आंकड़ा किसी भी सामान्य व्यक्ति को आश्चर्यचकित कर सकता है। लेकिन जब सेंटर फॉर बजट एंड गवर्नेंस अकाउंटेबिलिटी (CBGA) जैसे संस्थान इस भारी-भरकम बजट का पोस्टमार्टम करते हैं, तो एक भयावह वैचारिक दरिद्रता सामने आती है।
क्या यह उस उत्पादक वर्ग के साथ धोखा नहीं做到, जिसे शिक्षा, कौशल और सीधे आर्थिक संबल की जरूरत थी?
- SCSP 2024-25 BE (बजट अनुमान): ₹1,65,493 करोड़
- Actual 2023-24 (वास्तविक खर्च): अनुमान से 24% कम
- MP 2025-26 (मध्य प्रदेश का दावा): ₹24,024 करोड़
- Diversion (धन का भटकाव): 40%+ (CBGA के अनुसार)
मात्र 3% बजट सीधे SC/ST के उत्थान में जाता है।
मध्य प्रदेश जैसे राज्य की स्थिति का मूल्यांकन करें, जहाँ जनजातीय और दलित आबादी का एक बड़ा हिस्सा निवास करता है। राज्य सरकार ने 2025-26 के बजट में SC/ST कल्याण के लिए ₹24,024 करोड़ का भारी-भरकम दावा पेश किया है। लेकिन अगर हम 2023-24 और 2024-25 के ट्रैक रिकॉर्ड को देखें, तो यह दावा रेत के महल जैसा ढह जाता है।
यह उसी 'फूट डालो और राज करो' वाली औपनिवेशिक मानसिकता का नया रूप है—जहाँ पैसा आपके नाम पर आवंटित किया जाता है, लेकिन आपकी बस्ती तक पहुँचने से पहले ही सिस्टम उसे निगल जाता है।
इस वृहद 'बजटीय छलावे' का सबसे सीधा और क्रूर प्रभाव जमीन पर दिखता है। मध्य प्रदेश में SC वर्ग की आबादी 15.6% है, लेकिन जब वास्तविक और लक्षित (Targeted) फंड की बात आती है, तो उनके हिस्से बमुश्किल 3% ही आता है।
करोड़ों का फंड कागजों पर पास हो चुका है, लेकिन वह उस सड़क या फ्लाईओवर में लग गया जिसका टेंडर किसी बड़े ठेकेदार को मिला था।
हमें एक समाज के तौर पर इन कड़वे सवालों का सामना करना ही होगा:
क्या सिर्फ 'आंकड़ों का आकार' बढ़ाकर हम बाबासाहेब के आर्थिक समानता के विजन और दीनदयाल के 'अंत्योदय' को पा सकते हैं, या यह महज़ एक चुनावी लॉलीपॉप है?
जो पैसा कागजों पर 'दलित-आदिवासी कल्याण' के नाम पर आवंटित होता है, उसे सामान्य हाइवे और उर्वरक कंपनियों के खातों में डायवर्ट करना क्या इस हाशिए के समाज का सीधा 'आर्थिक शोषण' नहीं है?
आबादी 15.6% और सीधा लक्षित बजट सिर्फ 3%—क्या यह लोकतंत्र है, या एक आधुनिक संस्थागत छलावा जहाँ योजनाएं सिर्फ ठेकेदारों की जेबें भरने के लिए बन रही हैं?
हम कब तक इन 'बजटीय घोषणाओं' पर तालियां बजाते रहेंगे और कब अपनी चुनी हुई सरकारों से यह पूछेंगे कि
"मेरे नाम पर निकला हुआ पैसा आखिर गया कहाँ?"

Continue With Google
Comments (0)