नरसिंहपुर:-(मोहन सिंह राजपूत)- जिले में शासन स्तर पर गेहूं, चना एवं मसूर उपार्जन का कार्य जारी है। खरीदी की जिम्मेदारी शासन द्वारा निर्धारित एजेंसियों को सौंपी गई है, जिनके माध्यम से सर्वेयर, ऑपरेटर एवं अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति कर उपार्जन केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। वहीं शासन की ओर से प्रत्येक केंद्र पर एक नोडल अधिकारी भी नियुक्त किया गया है, जिनकी भूमिका व्यवस्था संचालन और निगरानी की होती है।

लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में उपार्जन केंद्रों पर नोडल अधिकारियों की स्थिति ऐसी बन गई है मानो शादी-विवाह में “फूफा” की भूमिका हो। व्यवस्था सही रही तो श्रेय खरीदी एजेंसी ले जाती है, लेकिन थोड़ी भी अव्यवस्था होने पर पूरा दोष नोडल अधिकारी पर मढ़ दिया जाता है।

सूत्रों के अनुसार उपार्जन केंद्रों पर सर्वाधिक दबाव नोडल अधिकारियों पर ही बनाया जा रहा है। किसी भी निरीक्षण के दौरान अधिकारी खरीदी व्यवस्था की बजाय पहले नोडल अधिकारी की उपस्थिति और कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते दिखाई देते हैं। “नोडल कहां है”, “क्यों नहीं आया”, “क्या कर रहा है” जैसे प्रश्नों के बीच वास्तविक समस्याएं पीछे छूट जाती हैं।

बताया जा रहा है कि खरीदी एजेंसियां किसानों से विभिन्न सुविधाओं का लाभ लेती हैं, लेकिन जब नोडल अधिकारी नियमानुसार कार्यवाही या पारदर्शिता की बात करते हैं तो एजेंसियां अन्य केंद्रों या उच्च अधिकारियों का हवाला देकर जिम्मेदारी से बचने का प्रयास करती हैं।

कई कर्मचारियों का कहना है कि शासन को सर्वेयर की तरह नोडल अधिकारियों की स्पष्ट जिम्मेदारी एवं अधिकार तय करने चाहिए, ताकि वे केवल जवाबदेही का माध्यम बनकर न रह जाएं। वर्तमान व्यवस्था में नोडल अधिकारी न तो पूर्ण अधिकारों से लैस हैं और न ही उन्हें स्वतंत्र निर्णय लेने की स्थिति प्राप्त है, जबकि जवाबदेही का पूरा भार उन्हीं पर डाल दिया जाता है।