"सपनों का घर" — एक ऐसा जुमला जिसे बेचकर बिल्डर अमीर हो गए और आम आदमी ईएमआई (EMI) के बोझ तले दब गया। जनता को बिल्डरों की धोखाधड़ी से बचाने के लिए सरकार ने 'रेरा' (Real Estate Regulatory Authority) नाम का एक ब्रह्मास्त्र बनाया था। लेकिन मध्य प्रदेश में आते-आते यह ब्रह्मास्त्र, भ्रष्टाचार का 'सुरक्षा कवच' कैसे बन गया, यह कहानी किसी क्राइम-थ्रिलर से कम नहीं है। जहाँ रक्षक ही भक्षक बन जाएं, वहाँ जनता किससे गुहार लगाए?
रेरा एक्ट 2016 का मुख्य उद्देश्य रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता लाना, घर खरीदारों के हितों की रक्षा करना और प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करवाना है। मुख्य प्रावधान जो सिर्फ कागजों पर अच्छे लगते हैं:
बिल्डर को प्रोजेक्ट का 70% पैसा अलग बैंक अकाउंट में रखना होगा।
बिना रेरा रजिस्ट्रेशन के कोई भी बिल्डर विज्ञापन या बिक्री नहीं कर सकता।
पज़ेशन (possession) में देरी होने पर बिल्डर को ब्याज देना होगा।
5 साल तक स्ट्रक्चरल खराबी पर बिल्डर उसे मुफ्त में ठीक करेगा।
मध्य प्रदेश में इन नियमों का पालन न के बराबर है। चेयरमैन के नीचे कैसे-कैसे 'खेल' हुए और 7,981 अवैध कॉलोनियों का साम्राज्य कैसे खड़ा हुआ, इसकी विस्तृत रिपोर्ट नीचे देखें।
स्रोत: उपलब्ध सरकारी आंकड़े और मीडिया रिपोर्ट्स
किसी भी संस्था की ईमानदारी उसके मुखिया से तय होती है। मध्य प्रदेश रेरा के चेयरमैन श्री ए.पी. श्रीवास्तव (1984 बैच के रिटायर्ड IAS) की नाक के नीचे कई खेल हुए:
प्लॉट के बदले 'कृपा': दस्तावेजों के अनुसार, चेयरमैन ने 'आकृति डेवलिंक्स' (Aakriti Devlinks) नामक बिल्डर से एक आवासीय प्लॉट (B-168, Aakriti Gardens) 'उपहार' स्वरूप या लेनदेन में स्वीकार किया। मजे की बात यह है कि प्लॉट लेने के बाद, बतौर चेयरमैन उन्होंने उसी बिल्डर के सभी प्रोजेक्ट्स को कैंसिल कर दिया। जांच एजेंसियां इसे सीधे तौर पर 'वसूली' (Extortion) के एंगल से देख रही हैं।
अवैध नियुक्तियां: रेरा में 'एडजूडिकेशन ऑफिसर' (Adjudication Officer) के पदों पर बिना विज्ञापन निकाले भर्तियां कर ली गईं। नियम ताक पर रखकर 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को इन पदों पर बैठा दिया गया। आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने इस पर FIR भी दर्ज की है।
अनियमित 'वसूली' फीस: रेरा अधिकारियों ने कॉलोनाइजर्स से लाखों रुपये की अनियमित फीस वसूली। भ्रम फैलाने और उगाही करने के लिए जानबूझकर फीस के स्ट्रक्चर को कई बार बदला गया।
इन सभी घोटालों के लिए रेरा चेयरमैन और रेरा सचिव जिम्मेदार हैं। जब EOW ने जांच शुरू की, तो रेरा सचिव ने RERA Act के 'सेक्शन 90' का हवाला देते हुए खुद को 'इम्यून' (कानूनी कार्रवाई से परे) घोषित कर दिया। इस पर EOW ने करारा जवाब दिया: "हम भ्रष्टाचार की जांच कर रहे हैं, रेरा के प्रावधानों की नहीं!" फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2025 में इस जांच पर स्टे (Stay) लगा रखा है।
नियम कहता है कि बिना रेरा के एक ईंट भी नहीं बिक सकती (10% जुर्माना और जेल का प्रावधान)। लेकिन भोपाल सहित पूरे प्रदेश में 115 कॉलोनाइजर्स खेतों की जमीन पर धड़ल्ले से प्लॉट काट रहे हैं।
रेरा और टीएनसीपी (TNCP) की मिलीभगत से पूरे मध्य प्रदेश में 7,981 अवैध कॉलोनियां बस चुकी हैं। प्रशासन कार्रवाई के नाम पर 238 अवैध कॉलोनियों के नाम रिकॉर्ड से ही हटा देता है, जबकि 35 नई अवैध कॉलोनियों को 'रेरा' के माध्यम से ही वैध (Regularize) करने का खेल चल रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार (मार्च 2025): कोर्ट ने देशभर में पेंडिंग 1.21 लाख शिकायतों और प्रक्रियागत देरी (Procedural delays) के मामले में 'खराब प्रदर्शन' करने वाले राज्यों में मध्य प्रदेश का नाम प्रमुखता से लिया है।

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