सिंगरौली
*रिहंद में जहर घोल रहा 'एनटीपीसी' राष्ट्रीय ताप विद्युत परियोजना*
*सत्ता की चुप्पी में 25 लाख लोगों की सेहत से खुला खिलवाड़*
*राखड़़ बांध से लगातार रिसाव जलाशय बनता जा रहा जहर का कुंड-जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब*
सिंगरौली (बैढ़न) मध्य प्रदेश का सिंगरौली जिसे देश की ऊर्जा राजधानी कहा जाता है, आज गंभीर पर्यावरणीय संकट और प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक बनता जा रहा है। नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन (राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम) की विंध्याचल ताप विद्युत परियोजना के वलियरी स्थित राखड़़ बांध से हो रहा दूषित जल का लगातार रिसाव न केवल रिहंद जलाशय को प्रदूषित कर रहा है, बल्कि लगभग 25 लाख लोगों के जीवन पर सीधा खतरा बना चुका है।
*जीवनरेखा से ‘जहर का स्रोत’ बनने तक-*
रिहंद जलाशय सिंगरौली और उत्तर प्रदेश के सोनभद्र सहित लाखों लोगों की प्यास बुझाने का प्रमुख साधन है। लेकिन अब यही जलाशय जहरीले तत्वों का केंद्र बनता जा रहा है। राखड़़ बांध से निकलने वाले दूषित जल में आर्सेनिक, पारा (मरकरी) और फ्लोराइड जैसे घातक तत्व पाए जाने की आशंका है, जो ताप विद्युत संयंत्रों से निकलने वाली राख के कारण उत्पन्न होते हैं।
*पहले भी हो चुकी हैं बड़ी घटनाएं-*
फिर भी सबक नहीं- दिसंबर 2025 में रिहंद बांध में जहरीले पानी के प्रवाह से दो दिनों के भीतर सैकड़ों मछलियों की मौत हो गई थी। इससे पहले वर्ष 2019 में राखड़़ बांध टूटने की घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया था, जब लाखों टन राख जलाशय में समा गई थी इस मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) ने 10 करोड़ रुपये का अंतरिम जुर्माना लगाते हुए सख्त निर्देश दिए थे लेकिन आज भी हालात जस के तस हैं। अर्थात नियमों की खुलेआम अनदेखी।
*शून्य द्रव उत्सर्जन” सिर्फ कागजों में-*
पर्यावरण संरक्षण के लिए लागू “शून्य द्रव उत्सर्जन” जैसे नियमों का पालन कागजों तक सीमित नजर आ रहा है। लगातार हो रहा रिसाव यह संकेत देता है कि या तो नियमों की अनदेखी की जा रही है, या फिर निगरानी तंत्र पूरी तरह विफल हो चुका है
*जनस्वास्थ्य पर गंभीर खतरा-*
रिहंद जलाशय के पानी पर निर्भर लाखों लोग अब अनजाने में जहर पीने को मजबूर हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे दूषित 'जल के सेवन से' कैंसर, त्वचा रोग, श्वसन संबंधी बीमारियां हड्डियों और तंत्रिका तंत्र पर दुष्प्रभाव जैसी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
*कृषि और जीव-जंतुओं पर भी संकट-*
दूषित जल का असर सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है। खेती की जमीन की उर्वरता घट रही है, फसलें प्रभावित हो रही हैं और जलाशय में मछलियों की लगातार मौत से स्थानीय मछुआरों की आजीविका भी संकट में पड़ गई है।
*राजनीतिक चुप्पी पर उठ रहे सवाल-*
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी गंभीर स्थिति के बावजूद जन प्रतिनिधियों और प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हो रही ? क्या बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों के दबाव में जनता के स्वास्थ्य और पर्यावरण को नजर अंदाज किया जा रहा है ?
*जनसंपर्क अधिकारी ने टाला जवाब-*
इस पूरे मामले पर जब राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम के जनसंपर्क अधिकारी शंकर सुब्रमणियम से दूरभाष के माध्यम से संपर्क किया गया, तो उन्होंने “दो दिन बाद जानकारी देने” की बात कहकर बातचीत समाप्त कर दी। यह रवैया खुद इस बात की ओर इशारा करता है कि कहीं न कहीं जवाबदेही से बचने की कोशिश की जा रही है।
*जनता का सवाल क्या अब भी जिम्मेदार संस्थाएं चुप रहेंगी-*
क्या 25 लाख लोगों की जिंदगी से यूं ही खिलवाड़ होता रहेगा ? या फिर पर्यावरण और जनस्वास्थ्य की रक्षा के लिए सख्त और निर्णायक कदम उठाए जाएंगे ?

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