शिक्षा विभाग में खेल के नाम पर 'अपनों' का खेल: सेपक टेकरा प्रतियोगिता बनी भ्रष्टाचार का नया अखाड़ा"
अनूपपुर। जिले के शिक्षा विभाग में इन दिनों खेल की भावना दम तोड़ रही है और भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी होती जा रही हैं। 69वीं राष्ट्रीय शालेय सेपक टेकरा प्रतियोगिता के नाम पर सरकारी बजट की 'होली' खेलने की तैयारी पूरी हो चुकी है। नियम-कायदों को ताक पर रखकर चहेतों को रेवड़ियाँ बाँटने का ऐसा खेल शुरू हुआ है, जिसमें पिता 'दल प्रमुख' हैं तो पुत्र 'कोच'। कागजों पर सिमटे ट्रेनिंग कैंप और आधी रात को रहस्यमयी ढंग से टीम की रवानगी ने विभाग की कार्यप्रणाली को पूरी तरह कठघरे में खड़ा कर दिया है।
अनूपपुर। जिले के शिक्षा विभाग में इन दिनों खेल आयोजनों के नाम पर सरकारी धन की जमकर होली खेली जा रही है। ताज़ा मामला 69वीं राष्ट्रीय शालेय सेपक टेकरा प्रतियोगिता का है, जिसमें चयन प्रक्रिया से लेकर दल के गठन तक में भारी अनियमितताएं और भाई-भतीजावाद के गंभीर आरोप लग रहे हैं। जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय द्वारा जारी आदेशों ने विभाग की कार्यप्रणाली पर कई सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
भाई-भतीजावाद का चरम: पिता दल प्रमुख, तो बेटा बना कोच
विभागीय आदेश क्रमांक 188 के अनुसार, तेलंगाना के महबूबाबाद में आयोजित होने वाली राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए जो दल भेजा गया है, उसमें 'परिवारवाद' का खुला खेल दिख रहा है। जिले के क्रीड़ा प्रभारी शेख खलील कुरैशी को दल प्रबंधक बनाया गया है, जबकि उनके ही पुत्र शेख कौनैन कुरैशी को बालकों की U-14 टीम का कोच नियुक्त कर दिया गया है। एक ही परिवार के दो सदस्यों को महत्वपूर्ण पदों पर नवाजना न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि यह अन्य योग्य प्रशिक्षकों के अधिकारों का हनन भी है।
कहाँ लगा कैंप और कहाँ खर्च हुई राशि?
शासनादेश के अनुसार, राष्ट्रीय प्रतियोगिता में शामिल होने से पहले खिलाड़ियों के लिए 17 से 21 अप्रैल 2026 तक "प्री-नेशनल कोचिंग कैंप" का आयोजन अनूपपुर में किया जाना था। लेकिन जिले में चर्चा है कि यह कैंप केवल कागजों पर ही चला। कैंप कहाँ लगा, खिलाड़ियों के भोजन और आवास पर कितनी राशि खर्च हुई और इसका उद्घाटन या समापन किसने किया, इसकी कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। आशंका जताई जा रही है कि कैंप के नाम पर आवंटित बजट को गुपचुप तरीके से ठिकाने लगा दिया गया।
अमलई से ट्रेन पकड़ने का रहस्यमयी फैसला
हैरानी की बात यह है कि टीम की रवानगी के लिए जिला मुख्यालय के रेलवे स्टेशन को छोड़कर अमलई रेलवे स्टेशन का चयन किया गया। 22 अप्रैल की रात 1:30 बजे टीम को अमलई से रवाना किया गया। सवाल यह उठता है कि जब मुख्यालय पर सारी सुविधाएं मौजूद हैं, तो आधी रात को टीम को दूसरे स्टेशन से भेजने की जल्दबाजी क्यों दिखाई गई? क्या यह किसी खास जानकारी को छिपाने या मीडिया की नजरों से बचने का कोई प्रयास था?
जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की अनदेखी
इस पूरे खेल में सबसे दुखद पहलू यह है कि जिले के प्रभारी मंत्री, कलेक्टर और अन्य जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों को भी इस मामले में अंधेरे में रखा गया है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि कुरैशी जैसे अधिकारी अपनी मनमर्जी से नियुक्तियां कर रहे हैं और शासन के धन का दुरुपयोग कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि "मेरा कोई क्या करेगा" वाली मानसिकता के साथ विभाग में भ्रष्टाचार का जाल बुना जा रहा है।
दो विभागों का बजट और एक ही 'भाग्यशाली' अधिकारी
जानकारी के अनुसार, इस खेल आयोजन में शिक्षा विभाग और जनजातीय कार्य विभाग, दोनों का समन्वय रहता है। लेकिन इन दोनों विभागों के बीच खेल अधिकारी कुरैशी ने अपनी ऐसी पैठ बना रखी है कि सारे लाभ उन्हीं के इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाते हैं। चाहे वह राज्य स्तरीय प्रतियोगिता हो या राष्ट्रीय, लाभ के पदों पर केवल चुनिंदा लोगों का ही कब्जा बना हुआ है।
उदयपुर की यात्रा और शासन की योजना का निजी लाभ**
शिकायतों में यह भी उल्लेख है कि इससे पूर्व राजस्थान के उदयपुर में आयोजित एक प्रतियोगिता के दौरान भी शासन की योजना का लाभ उठाकर सपरिवार यात्रा की गई थी। अब वही पैटर्न तेलंगाना की यात्रा में भी दोहराया जा रहा है। सरकारी खर्च पर परिवार को सैर-सपाटा कराना और उसे खेल विकास का नाम देना जिले के खेल जगत के लिए एक काला अध्याय साबित हो रहा है।
जांच के नाम पर केवल खानापूर्ति
पूर्व में भी संयुक्त संचालक लोक शिक्षण शहडोल संभाग से इस प्रकार की कई शिकायतें की गई हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर जांच के नाम पर नतीजा सिफर ही रहा है। भ्रष्टाचार के इन गंभीर बिंदुओं पर प्रशासन की चुप्पी कई तरह के संदेह पैदा करती है। क्या वरिष्ठ अधिकारियों का संरक्षण ही इन अनियमितताओं का मुख्य कारण है?
चयन प्रक्रिया में भी धांधली के आरोप
खिलाड़ियों की सूची पर गौर करें तो इसमें भी चहेतों को प्राथमिकता देने की बात सामने आ रही है। योग्य खिलाड़ियों को दरकिनार कर ऐसे बच्चों को टीम में शामिल किया गया है जिनके दस्तावेज या पात्रता संदेह के घेरे में हो सकते हैं। खेल के नाम पर बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर अधिकारी अपनी जेबें भरने में मस्त हैं।
प्रशासन से त्वरित कार्रवाई की मांग
जिले के खेल प्रेमियों ने मांग की है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की जाए। विशेषकर "पिता-पुत्र" की जोड़ी को दल में शामिल करने, प्री-नेशनल कैंप के फर्जीवाड़े और बजट के बंदरबांट की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो अनूपपुर में खेल प्रतिभाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती रहेंगी।
जवाबदेही तय होना आवश्यक
कुल मिलाकर, अनूपपुर जिला शिक्षा विभाग का यह कारनामा शासन के पारदर्शी प्रशासन के दावों की पोल खोल रहा है। जब तक भ्रष्ट अधिकारियों पर लगाम नहीं कसी जाएगी और उनकी जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक सरकारी खजाने की इसी तरह 'होली' खेली जाती रहेगी। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस सनसनीखेज मामले पर क्या रुख अपनाता है।

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