बालाघाट जिले के वारासिवनी विकासखंड में प्राकृतिक एवं जैविक खेती को बढ़ावा देने और पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से प्रगतिशील कृषकों की एक महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक में जैविक कृषि के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले किसानों, कृषि विशेषज्ञों और विभागीय अधिकारियों ने बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया। बैठक का मुख्य उद्देश्य किसानों को रसायन मुक्त खेती के लिए प्रेरित करना, खेती की लागत को कम करना और प्राकृतिक संसाधनों के समुचित उपयोग के प्रति जागरूक करना था।
जलवायु अनुकूल खेती और फसल विविधीकरण पर जोर
बैठक के दौरान 'क्लाइमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर' (जलवायु अनुकूल कृषि), प्रदूषण मुक्त खेती और फसल विविधीकरण जैसे गंभीर विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने किसानों को समझाया कि आधुनिक समय में रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग से न केवल मिट्टी की सेहत खराब हो रही है, बल्कि उत्पादन लागत भी लगातार बढ़ रही है।
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बेहतर विपणन (मार्केटिंग): प्राकृतिक और जैविक उत्पादों की मांग बाजार में तेजी से बढ़ रही है। किसान भाई इन उत्पादों के बेहतर विपणन के जरिए अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर सकते हैं।
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अनुभव साझा करना: इस दौरान कई प्रगतिशील किसानों ने अपने सफल अनुभव साझा किए और अन्य कृषकों को जैविक अपनाने के लिए प्रेरित किया।
स्वयं का बीज तैयार कर खेती की लागत घटाएं
उप संचालक कृषि श्री फूल सिंह मालवीय ने किसानों का मार्गदर्शन करते हुए उन्हें बाजार के महंगे और हाइब्रिड बीजों पर अपनी निर्भरता कम करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि किसान खुद अपना उन्नत बीज तैयार करना सीखें।
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अनावश्यक खर्चों में कटौती: छोटे और सीमांत किसान अनावश्यक खर्चों से बचकर अपनी खेती की कुल लागत को काफी हद तक कम कर सकते हैं, जिससे उनकी शुद्ध आमदनी में सीधी वृद्धि होगी।
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फसल विविधीकरण: उप संचालक ने रबी सीजन में परंपरागत रूप से धान के अत्यधिक रकबे को थोड़ा कम करके अन्य कम पानी चाहने वाली और अधिक लाभदायक फसलों को अपनाने की अपील की।
जीवामृत, ब्रह्मास्त्र और वेस्ट डीकंपोजर की तकनीकी जानकारी
प्राकृतिक खेती मिशन के अंतर्गत जैविक संसाधन केंद्र में तैयार होने वाले विभिन्न जैविक इनपुट्स की विस्तृत जानकारी किसानों को दी गई। किसानों को प्रशिक्षित किया गया कि वे किस प्रकार घर पर ही प्राकृतिक खाद और कीटनाशक तैयार कर सकते हैं:
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जीवामृत एवं घनजीवामृत: मिट्टी की उर्वरता और सूक्ष्म जीवों को बढ़ाने के लिए उपयोगी।
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ब्रह्मास्त्र एवं अग्निशास्त्र: फसलों को कीटों से सुरक्षित रखने के लिए पारंपरिक और प्रभावी प्राकृतिक कीटनाशक।
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वेस्ट डीकंपोजर: इसके उपयोग से कचरे और अवशेषों को कम समय में गुणवत्तापूर्ण जैविक खाद में बदला जा सकता है।
पराली नहीं जलाने का संकल्प और पर्यावरण संरक्षण
कृषि विभाग की ओर से किसानों से कड़े शब्दों में अपील की गई कि वे कटाई के बाद फसल अवशेष या पराली बिल्कुल न जलाएं। विशेषज्ञों ने समझाया कि पराली जलाने से जमीन के मित्र कीट और उपजाऊ सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होती है और पर्यावरण दूषित होता है। इसके विकल्प के रूप में फसल अवशेषों को खेत में ही सड़ाकर खाद बनाने की तकनीक समझाई गई। साथ ही, जैविक भूरी खाद को पैलेट बनाने वाली मशीन के माध्यम से बड़े स्तर पर तैयार करने के तकनीकी पहलुओं से भी किसानों को अवगत कराया गया।
बैठक के अंत में डॉ. संजीव चौहान ने जैविक खेती के वैज्ञानिक पहलुओं और इसके दीर्घकालिक फायदों पर प्रकाश डाला। अंत में सभी उपस्थित कृषकों ने टिकाऊ, रसायन-मुक्त और पर्यावरण अनुकूल खेती के इस अभियान को जन-जन तक पहुँचाने का सामूहिक संकल्प लिया।
image source : https://balaghat.mpinfo.org
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