बाजार, बेहतर उत्पादकता, आधुनिक कौशल और आय के नए स्रोतों के बिना वर्ष 2047 तक खेती युवाओं की पहली पसंद नहीं रहेगी। विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब किसान विकसित होगा।
भारत की विकास यात्रा का उल्लेख होते ही तेज़ आर्थिक वृद्धि, आधुनिक अवसंरचना, डिजिटल क्रांति और वैश्विक प्रतिष्ठा की चर्चा होती है। लेकिन एक मूलभूत प्रश्न अक्सर पीछे छूट जाता है, क्या भारत का किसान भी उसी गति से आगे बढ़ रहा है?
यदि इस प्रश्न का उत्तर संतोषजनक नहीं है, तो हमें स्वीकार करना होगा कि विकसित भारत का सपना अभी अधूरा है।
भारत ने कृषि के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। कभी खाद्यान्न आयात पर निर्भर रहने वाला देश आज विश्व के सबसे बड़े कृषि उत्पादकों में है और कृषि निर्यात में भी लगातार नई ऊंचाइयां छू रहा है। यह उपलब्धि निस्संदेह गर्व का विषय है। लेकिन वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की यात्रा केवल रिकॉर्ड उत्पादन से पूरी नहीं होगी। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि उसके गोदामों में भरे अनाज से नहीं, बल्कि उस किसान के जीवन स्तर से आंकी जाती है जिसने वह अन्न उगाया है। विकसित भारत की सबसे मजबूत नींव विकसित किसान ही है।
वर्ष 2047 के लिए भारत के कृषि लक्ष्य स्पष्ट हैं। किसानों की वास्तविक आय में उल्लेखनीय वृद्धि, 400 से 450 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन, दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भरता तथा 2030 तक कृषि निर्यात को 100 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य। साथ ही, देश की लगभग आधी कृषि को जलवायु-स्मार्ट बनाना और जैव-ऊर्जा को ग्रामीण भारत की दूसरी स्थायी आय के रूप में विकसित करना भी समय की आवश्यकता है।
लेकिन इन लक्ष्यों और वर्तमान स्थिति के बीच एक बड़ी चुनौती मौजूद है। देश की लगभग 46 प्रतिशत कार्यशील आबादी कृषि पर निर्भर है, जबकि कृषि का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान लगभग 18 प्रतिशत है। एक किसान की औसत आय गैर-कृषि क्षेत्र के एक श्रमिक की तुलना में लगभग पाँचवें हिस्से के बराबर है। यदि यह अंतर बना रहा, तो खेती धीरे-धीरे युवाओं के लिए अवसर नहीं, बल्कि विवशता का पेशा बन जाएगी। यह स्थिति केवल कृषि ही नहीं, बल्कि देश की दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा के लिए भी चिंता का विषय है। भारतीय कृषि की सबसे बड़ी चुनौती आज उत्पादन नहीं, बल्कि उत्पादन का लाभकारी विपणन है।
हाल ही में राजस्थान के जोधपुर में अंजीर उत्पादकों को अपने हजारों फलदार पेड़ काटने पर विचार करना पड़ा। किसानों ने वर्षों की बचत लगाकर उत्कृष्ट उत्पादन किया, लेकिन खरीदार नहीं मिले और प्रसंस्करण की व्यवस्था भी उपलब्ध नहीं थी। परिणामस्वरूप फसल खेतों में सड़ती रही। यही स्थिति कभी नासिक के प्याज किसानों की होती है, कभी आंध्र प्रदेश के आम उत्पादकों की और कभी टमाटर तथा आलू उत्पादकों की। दूसरी ओर, यही उत्पाद कुछ महीनों बाद उपभोक्ताओं को कई गुना अधिक कीमत पर खरीदने पड़ते हैं। यह विरोधाभास उत्पादन की नहीं, बल्कि विपणन और आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरी का प्रमाण है।
यदि भारत को वास्तव में कृषि महाशक्ति बनना है, तो चार बुनियादी क्षेत्रों में निर्णायक परिवर्तन आवश्यक हैं:-
पहला, उत्पादकता में क्रांतिकारी सुधार।
दलहन, तिलहन और कपास जैसी रणनीतिक फसलों की उत्पादकता आज भी वैश्विक मानकों से पीछे है। विशेषकर कपास की औसत उत्पादकता कई वर्षों से लगभग स्थिर बनी हुई है, जबकि चीन, ब्राज़ील, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया निरंतर आगे बढ़ रहे हैं। कृषि अनुसंधान को प्रयोगशालाओं तक सीमित रखने के बजाय खेतों तक पहुँचाना होगा। जीन-संपादित किस्में, अगली पीढ़ी की जैव-प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित कृषि और प्रिसिजन फार्मिंग जैसी तकनीकों को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा।
दूसरा, किसान-केंद्रित बाजार व्यवस्था।
भारत में हर वर्ष फल एवं सब्जियों का लगभग 6 से 15 प्रतिशत तथा अत्यधिक नाशवान उत्पादों का 30 प्रतिशत तक कटाई के बाद नष्ट हो जाता है। अनाज में भी 4 से 6 प्रतिशत तथा कुछ परिस्थितियों में 10 प्रतिशत तक नुकसान होता है। इसका अनुमानित आर्थिक मूल्य ₹1.5 से ₹2 लाख करोड़ प्रतिवर्ष है। इसके अतिरिक्त उपभोक्ता स्तर पर होने वाली खाद्य बर्बादी अलग है। हर जिले में आधुनिक कोल्ड चेन, वेयरहाउस, प्रसंस्करण इकाइयां और मूल्य संवर्धन केंद्र विकसित किए जाने चाहिए। e-NAM 2.0 को वास्तविक राष्ट्रीय कृषि बाज़ार के रूप में स्थापित करना होगा। अनुबंध खेती में किसानों को मूल्य सुरक्षा मिलनी चाहिए। वर्ष 2025 में भारत का कृषि निर्यात लगभग 55 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचा, लेकिन बार-बार बदलती निर्यात नीतियां अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में हमारी विश्वसनीयता को प्रभावित करती हैं। कृषि क्षेत्र में नीतिगत स्थिरता ही सबसे बड़ी सब्सिडी है।
तीसरा, कृषि शिक्षा और कौशल का पुनर्गठन।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन, रोबोटिक्स, सेंसर और डेटा विज्ञान कृषि का भविष्य बदल रहे हैं। ऐसे में कृषि शिक्षा को डिग्री-केंद्रित नहीं, बल्कि कौशल, नवाचार और उद्यमिता-केंद्रित बनाना होगा। राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली (NARS) और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों को अपने पाठ्यक्रमों की व्यापक समीक्षा करनी चाहिए। कृषि स्नातकों को केवल नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि रोजगार सृजित करने वाला बनाना होगा। आज किसान का बेटा खेती छोड़ने के लिए पढ़ता है। वर्ष 2047 तक स्थिति ऐसी होनी चाहिए कि वह खेती को आधुनिक, लाभकारी और सम्मानजनक बनाने के लिए पढ़े।
चौथा, जैव-ऊर्जा से दूसरी आय।
भविष्य का किसान केवल खाद्यान्न उत्पादक नहीं होगा, बल्कि ऊर्जा उत्पादक भी होगा। कृषि अवशेषों से एथेनॉल, संपीड़ित बायोगैस (CBG), हरित ऊर्जा और जैव उर्वरकों का उत्पादन किसानों को अतिरिक्त और स्थायी आय दे सकता है। इससे पराली जलाने जैसी समस्याएं कम होंगी, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिलेगा और ग्रामीण युवाओं के लिए नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे। यदि इसे कार्बन क्रेडिट, मिलेट्स और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के वैश्विक बाज़ार से जोड़ा जाए, तो भारतीय कृषि अधिक टिकाऊ और जोखिम-मुक्त बन सकती है।
समन्वित शासन (Integrated Governance)
इन चार स्तंभों के साथ एक पाँचवाँ तत्व भी उतना ही आवश्यक है, समन्वित शासन (Integrated Governance)। कृषि केवल कृषि विभाग का विषय नहीं है। यह जल, ऊर्जा, उद्योग, शिक्षा, अनुसंधान, व्यापार, परिवहन और पर्यावरण से जुड़ा राष्ट्रीय विषय है। विभागीय सीमाओं से ऊपर उठकर समन्वित नीति और क्रियान्वयन की आवश्यकता है। Out-of-Silo Governance अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है।
वर्ष 2047 का भारत केवल अधिक उत्पादन करने वाला देश नहीं होना चाहिए। वह ऐसा राष्ट्र होना चाहिए जहाँ किसान की आय स्थिर हो, जोखिम कम हो, युवाओं को खेती में भविष्य दिखाई दे और उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण भोजन उचित मूल्य पर उपलब्ध हो। भारत की विकास गाथा महानगरों की गगनचुंबी इमारतों से अवश्य दिखाई दे सकती है, लेकिन उसकी असली नींव आज भी गाँवों की मिट्टी में ही है।
यदि किसान समृद्ध होगा, तो गाँव समृद्ध होंगे। गाँव समृद्ध होंगे, तो भारत आत्मनिर्भर होगा।
और जब किसान सम्मान, सुरक्षा और समृद्धि के साथ आगे बढ़ेगा, तभी "विकसित भारत 2047" केवल एक सरकारी लक्ष्य नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की साझा उपलब्धि बनेगा।
समय की घड़ी चल चुकी है। अब केवल खेती बचाने का समय नहीं, बल्कि किसान को समृद्ध बनाने का समय है। क्योंकि विकसित किसान ही समृद्ध भारत का सबसे सशक्त आधार है।