कागजों पर, मध्य प्रदेश का राजस्व विभाग (Revenue Department) राज्य की प्रशासनिक रीढ़ है। इसका मुख्य काम भूमि का रिकॉर्ड रखना, ज़मीन का सीमांकन करना, सरकारी ज़मीन का प्रबंधन करना और प्राकृतिक आपदा (जैसे सांप काटना, बाढ़ आदि) पर RBC 64 के तहत मुआवजा बांटना है। लेकिन धरातल पर यह विभाग 'जादूगरों' का अड्डा बन चुका है, जहाँ ज़मीनें रातों-रात गायब हो जाती हैं और मुर्दे फाइलों में उठ खड़े होते हैं।
फरवरी 2026 की स्थिति के अनुसार, इस विभाग की कमान निम्नलिखित ढांचे के पास है:
राजस्व मंत्री (Revenue Minister): करण सिंह वर्मा (जिन्होंने हाल ही में कई तहसीलदारों को सस्पेंड करते हुए कहा था कि "बेईमान अधिकारी नहीं बदलते")।
प्रशासनिक ढांचा: मुख्यमंत्री (मोहन यादव) के नेतृत्व में मुख्य सचिव (Chief Secretary), प्रमुख सचिव (राजस्व), संभागायुक्त (कमिश्नर), ज़िला कलेक्टर, SDM, तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक (RI) और सबसे नीचे पटवारी काम करते हैं。
मध्य प्रदेश के राजस्व विभाग से जुड़े कुछ मामलों को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। इन मामलों में विभिन्न स्तरों पर जांच और कानूनी प्रक्रिया चलने की बात सामने आई है। संबंधित पक्षों की ओर से नियमों के पालन और तथ्यों की जांच की बात कही गई है.
सिवनी जिले की केवलारी तहसील में आपदा राहत राशि वितरण से जुड़े रिकॉर्ड में गड़बड़ियां पाए जाने की जानकारी सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार कुछ लोगों को कई बार मृत दिखाकर राशि जारी की गई। इस मामले में संबंधित कर्मचारियों और अधिकारियों की भूमिका की जांच की गई.
एक पुराने रिकॉर्ड से जुड़े मामले में मृत व्यक्ति के नाम पर जमीन बिक्री का आरोप लगा। वर्ष 2024 में इस संबंध में एफआईआर दर्ज होने की जानकारी मिली। मामला फिलहाल कानूनी प्रक्रिया में है|
2018 की नीति के तहत कुछ जिलों में भूमि पुनर्वर्गीकरण को लेकर आपत्तियां दर्ज की गईं। आरोप है कि कुछ जमीनें कम दर पर दी गईं, जिससे बड़े आर्थिक लाभ की संभावना बनी। सरकार की ओर से प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप बताया गया है。
एक वरिष्ठ अधिकारी पर जमीन ट्रांसफर से जुड़े आरोप लगे थे। पूर्व कार्यकाल में कार्रवाई की बात सामने आई, जबकि बाद में उन्हें राहत मिलने की जानकारी भी मिली। मामला प्रशासनिक स्तर पर चर्चा में रहा।
नामांतरण प्रक्रिया से जुड़े एक कथित ऑडियो के सामने आने के बाद पैसों की मांग के आरोप लगे। इसके बाद संबंधित मामले में जांच शुरू की गई।
फंड वितरण में अनियमितता के आरोप सामने आए, जिसमें लगभग ₹8.21 करोड़ की राशि का उल्लेख किया गया। संबंधित विभागों द्वारा जांच प्रक्रिया अपनाई गई है।
हाल के समय में सामने आए मामलों से यह महसूस होता है कि प्रशासनिक व्यवस्था में कुछ कमियाँ और निगरानी की कमजोरियाँ मौजूद हैं। डिजिटल युग में तकनीक ने जहां काम को आसान बनाया है, वहीं कुछ लोग इसका गलत फायदा भी उठा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, एआई आधारित इमेज या दस्तावेज़ों का दुरुपयोग, या पर्याप्त सत्यापन के बिना फंड ट्रांसफर जैसी घटनाएँ चिंता का विषय हैं. इसके साथ-साथ, कई बार विभागों के बीच समन्वय और क्रॉस-ऑडिट की प्रक्रिया मजबूत न होने से भी अनियमितताओं की गुंजाइश बन जाती है। जब सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही के मानक स्पष्ट और सख्त न हों, तो कुछ लोग नियमों को दरकिनार करने का प्रयास करते हैं।
ऐसे मामलों में अक्सर निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई की खबरें सामने आती हैं। यह आवश्यक भी है कि जहाँ गलती हो, वहाँ जवाबदेही तय हो। लेकिन साथ ही यह भी ज़रूरी है कि बड़े मामलों में पूरी श्रृंखला की निष्पक्ष और व्यापक जाँच हो—ताकि यह स्पष्ट हो सके कि निर्णय प्रक्रिया में किन-किन स्तरों पर चूक हुई. प्रभावी सुधार के लिए केवल दंडात्मक कार्रवाई पर्याप्त नहीं होती, बल्कि सिस्टम को अधिक पारदर्शी, तकनीकी रूप से सुरक्षित और जवाबदेह बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मजबूत ऑडिट तंत्र, डिजिटल सत्यापन की सख्त प्रक्रिया और स्पष्ट जिम्मेदारी तय करने से भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है।
जब भी शहर में आईटी पार्क (IT Park), बड़े अस्पताल या जन-सुविधाओं के लिए ज़मीन मांगी जाती है, तो प्रशासन कहता है कि "शहर में ज़मीन नहीं है", इसलिए इन्हें शहर से 20-30 किलोमीटर दूर जंगलों में धकेल दिया जाता है। ऐसा क्यों है? जवाब साफ है: शहर के बीचों-बीच मौजूद प्राइम लोकेशन की बेशकीमती सरकारी ज़मीनें 'रिक्लासिफिकेशन' के नाम पर प्राइवेट डेवलपर्स को कौड़ियों के दाम बेच दी गई हैं। जब 6,000 करोड़ की प्राइम लैंड आप भू-माफियाओं को गिफ्ट कर देंगे, तो रोजगार और विकास (IT Parks) के लिए तो शहर के बाहर की धूल फांकती ज़मीन ही बचेगी। शहर का कोर एरिया प्राइवेट कॉलोनाइजर्स की जागीर बन चुका है।
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