सतना। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपने स्थापना के 100 वर्ष पूरे करने जा रहा है। इस ऐतिहासिक 'संघ शताब्दी वर्ष' के निमित्त पूरे देश में समाज को जागृत करने और राष्ट्र निर्माण के मूल विचारों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। इसी कड़ी में मध्य प्रदेश के सतना में एक प्रमुख और विशाल जन गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस महत्वपूर्ण वैचारिक मंथन कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य माननीय भय्याजी जोशी उपस्थित रहे। उन्होंने अपने सारगर्भित और विचारोत्तेजक उद्बोधन में भारतीय समाज की वर्तमान स्थिति, हमारे शाश्वत जीवन मूल्यों, नागरिक कर्तव्यों और भारत के 'विश्वगुरु' बनने की असीम संभावनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उनका यह संबोधन केवल एक भाषण नहीं था, बल्कि भटके हुए आधुनिक समाज को उसकी जड़ों की ओर लौटने का एक स्पष्ट मार्गदर्शक संदेश था।

भारत की मूल आत्मा: "सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय" अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए भय्याजी जोशी ने भारतीय चिंतन परंपरा के सबसे मजबूत स्तंभ "सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय" (सभी का कल्याण हो, सभी सुखी रहें) के सिद्धांत को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत का चिंतन कभी भी एकांगी या केवल अपने स्वार्थ तक सीमित नहीं रहा है। पश्चिमी देशों का चिंतन जहां व्यक्तिवाद और भौतिकवाद पर आधारित हो सकता है, वहीं भारत की आत्मा संपूर्ण मानवता के कल्याण में बसती है। जब हम 'सर्वजन' की बात करते हैं, तो इसमें समाज का अंतिम व्यक्ति भी शामिल होता है। भारतीय समाज की वास्तविक पहचान उसके उच्च नैतिक मूल्यों, आपसी समरसता, और परोपकार व मानवता की उस भावना से होती है, जो सदियों से हमारे डीएनए में रची-बसी है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज के इस आधुनिक और तेजी से भागते युग में, हमारी इस मूल पहचान को बनाए रखना और सहेजना ही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि हम अपनी इस पहचान को खो देंगे, तो राष्ट्र के रूप में हमारा अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा।

बदलती परिस्थितियाँ और जीवन के शाश्वत मूल्य गोष्ठी में उपस्थित विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य ने एक बहुत ही व्यावहारिक सत्य की ओर ध्यान आकृष्ट किया। उन्होंने कहा कि यह प्रकृति का नियम है कि समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं। समाज का रहन-सहन, तकनीक, वेशभूषा और कार्य करने के तरीके समय के साथ परिवर्तित होते रहते हैं और इसे स्वीकार भी किया जाना चाहिए। लेकिन, इन बदलती बाहरी परिस्थितियों के बीच जीवन के जो 'मूल मूल्य' (Core Values) हैं, वे कभी नहीं बदलने चाहिए।

उन्होंने इन शाश्वत मूल्यों को सत्य, समरसता (सामाजिक सद्भाव), विश्वास और कर्तव्यनिष्ठा के रूप में परिभाषित किया। चाहे युग कोई भी हो, सत्य का स्थान झूठ नहीं ले सकता; समाज में समरसता की जगह वैमनस्य को नहीं दी जा सकती। भय्याजी जोशी ने गहरी चेतावनी देते हुए कहा कि जब कोई भी समाज अपने इन मूलभूत नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों से दूर होने लगता है, तो समाज के भीतर एक गहरा असंतुलन पैदा हो जाता है। इस असंतुलन का सीधा परिणाम असुरक्षा की भावना के रूप में सामने आता है। आज समाज में जो मानसिक तनाव, पारिवारिक विघटन और आपसी अविश्वास देखा जा रहा है, वह मूलतः इन्हीं मूल्यों से दूर जाने का ही दुष्परिणाम है।

अधिकारों से अधिक कर्तव्यों पर बल और 'विश्वगुरु' का मार्ग भारत के 'विश्वगुरु' बनने के संकल्प पर बात करते हुए भय्याजी जोशी ने कहा कि भारत निश्चित रूप से विश्व का नेतृत्व करने और उसे सही मार्ग दिखाने की क्षमता रखता है। हमारे पास वह ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत है जो दुनिया को शांति का रास्ता दिखा सकती है। लेकिन, उन्होंने शर्त रखी कि यह केवल कोरी बातों से संभव नहीं होगा; इसके लिए पूरे समाज को अपने 'कर्तव्यों' का कड़ाई से पालन करना होगा।

आज के समाज की एक बड़ी विडंबना यह है कि हर व्यक्ति केवल अपने 'अधिकारों' (Rights) की बात करता है, लेकिन अपने 'कर्तव्यों' (Duties) को भूल जाता है। इस विषय को एक बहुत ही सटीक और मार्मिक उदाहरण के माध्यम से समझाते हुए उन्होंने कहा कि परिवार और समाज में हर एक व्यक्ति की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने बच्चों के पालन-पोषण का उदाहरण दिया। आज कई लोग बच्चों को जन्म देने और उन्हें पालने को केवल अपना एक सामान्य पारिवारिक अधिकार मानते हैं, जबकि वास्तव में यह एक बहुत बड़ी 'राष्ट्रीय और सामाजिक जिम्मेदारी' है। आप अपने घर में केवल एक बच्चे को नहीं पाल रहे हैं, बल्कि आप देश के भविष्य के एक नागरिक का निर्माण कर रहे हैं। यदि माता-पिता इस कर्तव्यबोध के साथ बच्चों में अच्छे संस्कार डालेंगे, तो समाज स्वतः ही मजबूत हो जाएगा।

सामाजिक कुरीतियाँ और नैतिक मूल्यों में गिरावट वर्तमान समाज के यथार्थ पर बात करते हुए उन्होंने नैतिक मूल्यों के निरंतर गिरते स्तर पर गहरी चिंता व्यक्त की। भय्याजी जोशी ने कहा कि आज हमारे ही समाज में कई प्रकार की सामाजिक कुरीतियाँ, कुप्रथाएँ और असमानताएँ घर कर गई हैं, जो हमारे पतन का कारण बन रही हैं। जातिगत भेदभाव, छुआछूत, स्वार्थपरता और मानवीय संवेदनाओं की कमी समाज को खोखला कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन बुराइयों को केवल सरकार या किसी एक संस्था के भरोसे समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए समाज के भीतर से ही एक व्यापक जागरूकता आनी चाहिए। पूरे समाज को एकजुट होकर, सामूहिक प्रयासों के माध्यम से इन असमानताओं और कुरीतियों पर प्रहार करना होगा। जब तक समाज का हर वर्ग इसके लिए संकल्पित नहीं होगा, तब तक सच्चे अर्थों में सामाजिक न्याय की स्थापना नहीं हो सकती।

संवैधानिक समानता बनाम सामाजिक समरसता अपने भाषण के सबसे महत्वपूर्ण और वैचारिक रूप से सबसे गहरे हिस्से में भय्याजी जोशी ने संविधान और समाज की मानसिकता के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि हमारा देश भारत के महान संविधान से चलता है। संविधान और देश का कानून समाज के हर एक नागरिक को पूरी तरह से समान अधिकार देता है। कानून की नजर में कोई छोटा या बड़ा नहीं है।

लेकिन, उन्होंने एक यथार्थवादी प्रश्न उठाया कि क्या केवल कानून बन जाने से समाज में समानता आ जाती है? उनका उत्तर था- नहीं। उन्होंने जोर देकर कहा कि कानून केवल बाहरी व्यवस्था को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन लोगों के दिलों को नहीं। इसलिए, "समाज में समानता और सम्मान का भाव" होना उतना ही या उससे भी अधिक जरूरी है। जब तक सवर्ण और दलित, अमीर और गरीब के बीच मन से सम्मान का भाव पैदा नहीं होगा, जब तक हम एक-दूसरे को सच्चे अर्थों में अपना भाई नहीं मानेंगे, तब तक संवैधानिक समानता अधूरी रहेगी। समरसता का यह भाव थोपा नहीं जा सकता, इसे दिलों में जगाना पड़ता है।

प्रकृति संरक्षण और मानव कल्याण का अंतर्संबंध भारतीय संस्कृति के व्यापक दृष्टिकोण को सामने रखते हुए उन्होंने प्रकृति के प्रति हमारे दायित्वों की भी याद दिलाई। भारत की संस्कृति ने कभी भी प्रकृति को उपभोग की वस्तु नहीं माना है। हमारी संस्कृति हमेशा से मानव कल्याण के साथ-साथ प्रकृति संरक्षण की प्रबल पक्षधर रही है। हमने नदियों को माता माना है, पेड़ों में ईश्वर का वास देखा है और पहाड़ों को पूजा है।

आज दुनिया जिस 'ग्लोबल वार्मिंग' और पर्यावरण संकट से जूझ रही है, उसका समाधान भारतीय संस्कृति के पास है। भय्याजी जोशी ने आह्वान किया कि हमें अपने व्यक्तिगत और सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए समाज के साथ-साथ प्रकृति के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभानी चाहिए। जल, जंगल और जमीन की रक्षा करना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य होना चाहिए।

निष्कर्ष: एक सशक्त और मार्गदर्शक भारत का उदय सतना की इस जन गोष्ठी के अंत में, भय्याजी जोशी का संदेश अत्यंत स्पष्ट और प्रेरणादायक था। उनका निष्कर्ष यह था कि राष्ट्र का निर्माण केवल ईंट और पत्थर की इमारतों से नहीं होता, बल्कि अच्छे चरित्र वाले नागरिकों से होता है। यदि देश का हर एक नागरिक अपने कर्तव्यों (पारिवारिक, सामाजिक, पर्यावरण और राष्ट्रीय) को गहराई से समझे और स्वार्थ से ऊपर उठकर 'समाज के हित' में कार्य करना शुरू कर दे, तो भारत को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।

सत्य, समरसता और सर्वजन हिताय के मार्ग पर चलकर भारत न केवल आंतरिक रूप से एक बेहद मजबूत और सशक्त राष्ट्र बनेगा, बल्कि अपनी इस सांस्कृतिक और नैतिक शक्ति के बल पर वह पूरे विश्व के लिए एक सच्चा मार्गदर्शक (विश्वगुरु) भी सिद्ध होगा। सतना में आयोजित यह संघ गोष्ठी इसी वैचारिक क्रांति और समाज जागरण का एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई।

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