गुना, मध्यभारत। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के आगामी शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में समाज को एक नई दिशा देने और राष्ट्र निर्माण में आम जनमानस की सहभागिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से मध्य प्रदेश के गुना जिले में एक अत्यंत महत्वपूर्ण “प्रमुख जन गोष्ठी” का भव्य आयोजन किया गया। स्वर्गीय नाथूलाल मंत्री जन कल्याण न्यास के तत्वावधान में गुना शहर के प्रतिष्ठित राजविलास होटल में आयोजित इस गोष्ठी में शहर के प्रबुद्ध नागरिकों, बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों और मातृशक्ति ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस वैचारिक और सामाजिक मंथन का मुख्य उद्देश्य समाज के प्रभावशाली नागरिकों के साथ मिलकर एक सशक्त, समर्थ, आत्मनिर्भर एवं परम वैभवशाली भारत के निर्माण के लिए सार्थक विचार-विमर्श करना तथा भविष्य की रूपरेखा तय करना था। गोष्ठी में इस बात पर जोर दिया गया कि भारत को विश्व गुरु के पद पर आसीन करने के लिए समाज के हर एक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और उसे अपने आचरण में उतारना होगा।

कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ भारतीय संस्कृति और परंपरा के अनुसार पूर्ण सात्विक भाव से किया गया। सर्वप्रथम मंच पर आसीन अतिथियों द्वारा माँ भारती (भारत माता) के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित किया गया और माल्यार्पण कर राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की गई। इस गरिमामय अवसर पर मंच पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कई वरिष्ठ पदाधिकारी उपस्थित रहे, जिन्होंने अपने विचारों से उपस्थित जनसमूह का मार्गदर्शन किया। मंच पर मुख्य रूप से विभाग संघचालक श्री अशोक जी कुशवाह, जिला संघचालक श्री गिरिराज जी अग्रवाल, और गुना नगर संघचालक श्री महेन्द्र संधू जी उपस्थित थे। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में अखिल भारतीय सेवा प्रमुख श्री पराग जी अभ्यंकर ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई और अपने ओजस्वी विचारों से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।

मुख्य वक्ता श्री पराग जी अभ्यंकर ने अपने उद्बोधन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विजन और शताब्दी वर्ष के लक्ष्यों को स्पष्ट करते हुए “पंच परिवर्तन” (पांच महत्वपूर्ण बदलाव) के सिद्धांत पर अत्यंत विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “पंच परिवर्तन कोई कोरा वैचारिक दर्शन या किताबी ज्ञान नहीं है, बल्कि यह आधुनिक और सशक्त राष्ट्र निर्माण का सबसे मजबूत और व्यावहारिक आधार है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक समाज का प्रत्येक व्यक्ति इन पांच जीवन मूल्यों को अपने दैनिक जीवन और व्यवहार में नहीं अपनाता, तब तक समाज और राष्ट्र में कोई वास्तविक, सकारात्मक और स्थायी परिवर्तन लाना असंभव है।

श्री पराग जी ने पंच परिवर्तन के पाँचों सूत्रों— 'कुटुंब प्रबंधन', 'सामाजिक समरसता', 'स्वदेशी', 'पर्यावरण' और 'नागरिक कर्तव्य' की वर्तमान समय में प्रासंगिकता और आवश्यकता को एक-एक कर बहुत ही गहराई से समझाया, जो निम्नलिखित है:

1. कुटुंब प्रबंधन (परिवार व्यवस्था और संस्कार) उन्होंने सबसे पहले कुटुंब प्रबंधन यानी परिवार व्यवस्था पर जोर दिया। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण के कारण हमारी संयुक्त परिवार व्यवस्था और पारिवारिक संवाद कम होता जा रहा है। कुटुंब प्रबंधन का सीधा तात्पर्य परिवार में एक ऐसा सकारात्मक वातावरण निर्मित करना है, जहां पीढ़ियों के बीच निरंतर संवाद हो, बड़ों का सम्मान हो और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और जड़ों से जुड़े रहने के संस्कार मिलें। उन्होंने आह्वान किया कि परिवारों में सप्ताह में कम से कम एक बार सभी सदस्य एक साथ बैठें, अपनी परंपराओं पर चर्चा करें और अनुशासन का पालन करें। इसी नींव पर खड़े होकर हमारी युवा पीढ़ी सुदृढ़ चरित्र और प्रखर राष्ट्रीय चेतना के साथ आगे बढ़ सकेगी। एक मजबूत परिवार ही एक मजबूत राष्ट्र की पहली इकाई होता है।

2. सामाजिक समरसता (भेदभाव मुक्त समाज का निर्माण) पंच परिवर्तन का दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ सामाजिक समरसता है। श्री अभ्यंकर ने कहा कि जब तक हमारा हिंदू समाज जातियों, उप-जातियों, ऊंच-नीच और छुआछूत जैसी कुरीतियों में बंटा रहेगा, तब तक राष्ट्र अपनी पूर्ण क्षमता को प्राप्त नहीं कर सकता। सामाजिक समरसता का अर्थ है समाज के प्रत्येक वर्ग को आत्मीयता के साथ जोड़ना और हर प्रकार के भेदभाव से ऊपर उठकर संपूर्ण समाज को एकात्मता और बंधुत्व का संदेश देना। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे समाज का कोई भी अंग स्वयं को उपेक्षित या कमजोर महसूस न करे। एकरस और एकजुट समाज ही किसी भी बाहरी या आंतरिक चुनौती का डटकर सामना कर सकता है।

3. स्वदेशी (आत्मनिर्भरता और स्थानीय अर्थतंत्र का विकास) स्वदेशी के संकल्प को आत्मनिर्भर भारत की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी कदम बताते हुए उन्होंने कहा कि स्वदेशी का अर्थ केवल विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना नहीं है, बल्कि यह अपनी मिट्टी, अपने स्थानीय उत्पादों, अपने कौशल और अपने संसाधनों के प्रति सम्मान और गर्व का भाव जगाना है। गुना जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे छोटे कारीगरों, बुनकरों, किसानों और स्थानीय उद्यमियों के उत्पादों को प्राथमिकता देना ही सच्चा स्वदेशी है। जब हम अपने देश में बनी वस्तुओं का उपयोग करते हैं, तो हम केवल एक उत्पाद नहीं खरीदते, बल्कि हम देश के अर्थतंत्र को मजबूत करते हैं और अपने ही देशवासियों को रोजगार के अवसर प्रदान करते हैं। आर्थिक स्वावलंबन के बिना कोई भी देश पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं कहला सकता।

4. पर्यावरण (प्रकृति संरक्षण हमारा परम दायित्व) आज के समय में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के लिए एक भयंकर संकट बन चुके हैं। ऐसे में पर्यावरण संरक्षण को आज की सबसे अनिवार्य और तत्कालिक आवश्यकता बताते हुए श्री पराग जी ने उपस्थित प्रबुद्धजनों को झकझोरा। उन्होंने कहा कि सरकारें अपने स्तर पर काम कर सकती हैं, लेकिन वृक्षारोपण, जल संरक्षण, नदियों की स्वच्छता, और प्लास्टिक मुक्त जीवनशैली अपनाना जन-जन का व्यक्तिगत दायित्व है। उन्होंने अपील की कि परिवार के हर शुभ अवसर पर पेड़ लगाएं और उन्हें पाल-पोस कर बड़ा करें। जल की एक-एक बूंद को बचाना और अपने आसपास स्वच्छता बनाए रखना केवल नियम नहीं, बल्कि हमारा धर्म होना चाहिए। प्रकृति बचेगी, तभी मानव जीवन सुरक्षित रहेगा।

5. नागरिक कर्तव्य (अधिकारों के साथ कर्तव्यों का बोध) पंच परिवर्तन का पांचवां और अंतिम सूत्र है 'नागरिक कर्तव्य'। हमारे समाज में अक्सर लोग अपने अधिकारों के प्रति तो बहुत जागरूक रहते हैं, लेकिन जब बात कर्तव्यों की आती है, तो वे पीछे हट जाते हैं। श्री अभ्यंकर ने स्पष्ट किया कि मतदान में शत-प्रतिशत भागीदारी करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, यातायात के नियमों का पालन करना, सामाजिक अनुशासन बनाए रखना और देश के कानून का सम्मान करना ही राष्ट्र की असली मजबूती का आधार है। जो नागरिक अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करता है, वही सच्चे अर्थों में राष्ट्रभक्त है।

मुख्य वक्ता के इस विस्तृत और प्रभावशाली उद्बोधन के पश्चात् गोष्ठी में एक अत्यंत जीवंत और बौद्धिक संवाद सत्र (प्रश्न-उत्तर) का आयोजन किया गया। गोष्ठी के दौरान उपस्थित गुना के प्रबुद्ध सज्जनों ने इन पांचों विषयों से जुड़ी व्यावहारिक चुनौतियों और शंकाओं पर खुलकर अपने प्रश्न पूछे। वक्ता श्री पराग जी ने बहुत ही सरलता, स्पष्टता और तार्किकता के साथ सभी प्रश्नों के विस्तारपूर्वक समाधान प्रस्तुत किए, जिससे उपस्थित जनसमूह पूरी तरह संतुष्ट और प्रेरित नजर आया।

कार्यक्रम के समापन अवसर पर मंच की ओर से उपस्थित सभी नागरिकों, मातृशक्ति और युवाओं से यह भावपूर्ण आह्वान किया गया कि वे आज की इस गोष्ठी से प्राप्त पंच परिवर्तन के इन अमूल्य सूत्रों को केवल सुनकर न भूल जाएं, बल्कि आज से ही इन्हें अपने व्यक्तिगत जीवन, अपने परिवार और अपने कार्यक्षेत्र में आत्मसात करने का संकल्प लें। यदि गुना का प्रत्येक नागरिक इन पांच बिंदुओं को अपना ले, तो राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य और भारत को परम वैभव पर ले जाने के लक्ष्य में यह एक अत्यंत सक्रिय और ऐतिहासिक भूमिका होगी।

इस वैचारिक महाकुंभ में गुना नगर के प्रतिष्ठित प्रबुद्धजन, शिक्षाविद्, वरिष्ठ समाजसेवी, जाने-माने व्यवसायी, सज्जन शक्ति और मातृशक्ति की भारी और उल्लेखनीय उपस्थिति रही। सभी ने एक स्वर में भारत माता की जयघोष के साथ राष्ट्र निर्माण के इस महायज्ञ में अपनी आहुति देने का संकल्प लिया। कार्यक्रम का समापन शांति पाठ और राष्ट्र कल्याण की कामना के साथ संपन्न हुआ।

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