मरे हुए रावण को हर साल जलाना नहीं, अपने भीतर के रावण का अंत करना जरूरी : आचार्य श्री सुंदरसागरजी महाराज

 

संकल्पपूर्वक बुराइयों को जीवित रखना और फिर उनका दहन करना भी हिंसा का कारण है, आत्मचिंतन से ही संभव है सच्चा परिवर्तन

विशेष समाचार।(संवाददाता मुकेश कुमार जैन )

परम पूज्य दिव्य तपस्वी आचार्य श्री 108 सुंदरसागरजी महाराज ने अपने प्रेरणादायी वचनों के माध्यम से जीवन में आत्मचिंतन, अहिंसा और संकल्प की महत्ता को समझाया है। उन्होंने संदेश दिया कि दशहरा पर्व पर हर वर्ष रावण का पुतला जलाने से अधिक आवश्यक है अपने भीतर मौजूद रावण रूपी बुराइयों का अंत करना।

 

आचार्य श्री के संदेश के अनुसार, यदि मनुष्य बुराइयों को जानते हुए भी उन्हें संकल्पपूर्वक अपने जीवन में बनाए रखता है और फिर प्रतीकात्मक रूप से उनका दहन करता है, तो यह आत्मचिंतन का विषय है। वास्तविक परिवर्तन बाहरी प्रदर्शन से नहीं, बल्कि मन के भीतर उठने वाले विकारों को पहचानकर उन्हें समाप्त करने के प्रयास से आता है।

 

बुराइयों का त्याग ही सच्चा विजयादशमी संदेश

 

रावण का दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है, लेकिन इस परंपरा की सार्थकता तभी है, जब मनुष्य अपने जीवन से क्रोध, मान, माया, लोभ, अहंकार और द्वेष जैसी बुराइयों को दूर करने का प्रयास करे। केवल पुतला जलाने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन नहीं आता; इसके लिए विचारों और व्यवहार में सुधार आवश्यक है।

 

अहिंसा और आत्मकल्याण का मार्ग

 

जैन दर्शन में अहिंसा, आत्मसंयम और आत्मशुद्धि को विशेष महत्त्व दिया गया है। आचार्य श्री का यह संदेश मनुष्य को अपने आचरण की समीक्षा करने तथा प्रत्येक कार्य के पीछे छिपे भावों को समझने की प्रेरणा देता है। जब व्यक्ति अपने भीतर के विकारों पर विजय प्राप्त करने का संकल्प लेता है, तभी वह सच्चे अर्थों में आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ता है।

 

आचार्य श्री सुंदरसागरजी महाराज का यह प्रेरक संदेश समाज को बाहरी आडंबर के साथ-साथ आंतरिक शुद्धि पर भी ध्यान देने की सीख देता है। सच्ची विजय किसी दूसरे पर नहीं, बल्कि स्वयं की बुराइयों पर प्राप्त की गई विजय है।