विषय-वासनाओं में भटका मन बनता है बंधन का कारण, सम्यक ज्ञान से मिलता है मुक्ति का मार्ग : आचार्य श्री सुनीलसागरजी महाराज

मोबाइल के बढ़ते उपयोग से प्रभावित हो रहा आपसी संवाद, मन की स्थिरता और इंद्रिय संयम आत्मकल्याण के लिए आवश्यक

नेमी नगर जैन कॉलोनी, इंदौर। (संवाददाता मुकेश कुमार जैन)

परम पूज्य आचार्य श्री 108 सुनीलसागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में मन की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में मन ही बंधन और मोक्ष का प्रमुख कारण है। विषय-वासनाओं में लीन रहने वाला मन व्यक्ति को संसार के बंधनों में उलझाता है, जबकि सम्यक ज्ञान से प्रेरित मन उसे मुक्ति के मार्ग की ओर अग्रसर करता है। इसलिए मनुष्य को अपने मन को सही दिशा देना और उस पर नियंत्रण रखना सीखना चाहिए।

आचार्य श्री ने वर्तमान समय में मोबाइल के बढ़ते उपयोग की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि मोबाइल ने मनुष्य की दिनचर्या और आपसी संवाद को काफी प्रभावित किया है। आज स्थिति ऐसी बनती जा रही है कि व्यक्ति अपने आसपास मौजूद लोगों से ठीक से बात नहीं करता, उनकी ओर ध्यान नहीं देता और न ही उनकी बातों को एकाग्रता से सुनता है। तकनीक के बढ़ते उपयोग के बीच मानवीय संवेदनाओं और आपसी संवाद को बनाए रखना भी आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि सामान्यतः हमें शिक्षा दी जाती है कि बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत बोलो, लेकिन आज मनुष्य अच्छी बातों को देखने, सुनने और समझने से भी दूर होता जा रहा है। जीवन में सद्विचारों और ज्ञानवर्धक बातों को स्थान देना आवश्यक है, क्योंकि वही व्यक्ति के विचारों और व्यवहार को सही दिशा प्रदान करते हैं।

आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य के लिए इंद्रियों पर नियंत्रण रखना जितना जरूरी है, उतना ही मन को स्थिर और एकाग्र बनाना भी आवश्यक है। इंद्रियों पर नियंत्रण होने के बाद भी यदि मन चंचल बना रहता है, तो व्यक्ति अपने लक्ष्य से भटक सकता है। इसलिए मन को विषय-विकारों से हटाकर सम्यक ज्ञान, सद्विचार और आत्मकल्याण की ओर प्रेरित करना चाहिए।उन्होंने संदेश दिया कि मनुष्य को अपनी दिनचर्या में आत्मचिंतन, संयम और ज्ञानार्जन के लिए समय निकालना चाहिए। मन की चंचलता पर विजय प्राप्त कर तथा विवेकपूर्ण जीवन अपनाकर ही व्यक्ति आत्मिक शांति की अनुभूति कर सकता है और मोक्षमार्ग की दिशा में आगे बढ़ सकता है।