छतरपुर जिले के चंदला थाना क्षेत्र अंतर्गत बछौन चौकी के ग्राम बिलहरी से सामने आए सामूहिक दुष्कर्म के गंभीर मामले ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि शादी का झांसा देकर 19 वर्षीय युवती को जंगल में कैद कर चार आरोपियों ने सात दिनों तक सामूहिक दुष्कर्म किया, लेकिन घटना के तीन महीने बाद भी पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की।

पीड़ित परिवार के अनुसार, 26 अक्टूबर को गांव का ही एक शादीशुदा युवक युवती को शादी का झांसा देकर घर से ले गया। इसके बाद उसे करतल–नरैनी के जंगलों में ले जाकर तीन अन्य युवकों के साथ मिलकर लगातार सात दिनों तक दुष्कर्म किया गया। 31 अक्टूबर को दबाव बनाकर समाज के ही एक युवक से युवती का जबरन विवाह करा दिया गया।

घर लौटने पर युवती ने परिजनों को आपबीती बताई। आरोप है कि शिकायत करने पर आरोपियों ने पीड़िता की मां और भाभी को निर्वस्त्र कर पूरे गांव में घुमाने की धमकी दी। लगातार मिल रही धमकियों से भयभीत होकर पूरा परिवार गांव छोड़कर लवकुशनगर में डेरा डालने को मजबूर हो गया है।

चौकी से एसपी कार्यालय तक आवेदन, फिर भी कार्रवाई शून्य

पीड़ित परिवार का कहना है कि बछौन चौकी, चंदला थाना और एसपी कार्यालय तक लिखित शिकायतें दी गईं, बावजूद इसके एफआईआर दर्ज नहीं की गई। आरोप है कि मामले को दबाने के लिए भाजपा के एक मंडल स्तर के पदाधिकारी का दबाव बनाया जा रहा है और समझौते के लिए मजबूर किया जा रहा है।

164 के बयान तक नहीं, जांच पर सवाल

पीड़ित पक्ष का आरोप है कि पुलिस ने मनमाने बयान और वीडियो तैयार किए, लेकिन पीड़िता के न्यायालय में धारा 164 के तहत बयान दर्ज नहीं कराए गए। न ही काउंसलिंग की गई, जिससे निष्पक्ष जांच पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

“भैया मुझे बचा लो…”

पीड़िता के भाई ने बताया कि घटना के दौरान बहन का फोन आया था। फोन पर वह रोते हुए कह रही थी—

“भैया मुझे बचा लो, मेरे साथ रोज ज्यादती हो रही है।”

इसके बाद अजयगढ़ थाना क्षेत्र अंतर्गत हनुमतपुर चौकी पुलिस की मदद से युवती को आरोपियों के चंगुल से बाहर निकाला गया।

पुलिस का पक्ष

इस मामले में एसडीओपी लवकुशनगर नवीन दुबे का कहना है कि चंदला थाने में गुमशुदगी दर्ज थी, जिसे बाद में दस्तयाब किया गया। दस्तयाबी के दौरान युवती ने अपनी इच्छा से शादी करने और पति के साथ रहने की बात कही थी। बाद में लगाए गए आरोपों की जांच की जा रही है।

अब सवाल यह है कि इतना संगीन आरोप होने के बावजूद एफआईआर दर्ज न होना, क्या पीड़ित को न्याय से वंचित करने जैसा नहीं है?