कोयले की कालिख में घुटता धनपुरी: SECL और नगर पालिका की लापरवाही से शहर बना 'डस्ट ज़ोन'

शहडोल: कोयलांचल का दिल कहे जाने वाला धनपुरी नगर आज विकास नहीं, बल्कि बदहाली और लापरवाही की सबसे भयावह तस्वीर पेश कर रहा है। अरबों रुपए का कोयला निकालकर देश की ऊर्जा जरूरतें पूरी करने वाला यह क्षेत्र खुद कोयले की कालिख में इस कदर डूब चुका है कि अब यहां की पहचान "धूल-धुआं और तबाही" बनकर रह गई है।

यहां के हालात इतने बदतर हैं कि हर साल घरों में दो-दो बार रंग-रोगन कराने के बाद भी दीवारें काली पड़ जाती हैं और दिनभर सफाई के बावजूद घरों में कोयले की महीन धूल की मोटी परत जम जाती है। यह सिर्फ गंदगी का मामला नहीं, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य और जीवन पर सीधा हमला है।

सड़कें नहीं, गड्ढों का जाल

धनपुरी की सड़कें अब सड़क नहीं, बल्कि गड्ढों का जाल बन चुकी हैं। रीवा-अमरकंटक मुख्य मार्ग, जो इस क्षेत्र की लाइफलाइन माना जाता है, आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। बगिया पुलिया से लेकर धनपुरी ओपन कास्ट खदान, ग्राम देवहरा तक सड़कें पूरी तरह गायब हो चुकी हैं।

स्थानीय लोग मजबूरी में खुद ही मिट्टी डालकर और पानी का छिड़काव कर रास्ता बनाने की कोशिश करते हैं। सवाल यह है कि करोड़ों रुपए का राजस्व वसूलने वाली नगर पालिका आखिर किस काम की है? और पीडब्ल्यूडी की सड़क पर SECL किस अधिकार से भारी-भरकम कोयला लोड ट्रकों की आवाजाही करवा रही है?

बिना तिरपाल दौड़ते ट्रक: मौत बनकर उड़ती धूल

स्थिति और भी भयावह तब हो जाती है जब बगिया पुलिया से रेलवे साइडिंग तक सैकड़ों ट्रक बिना तिरपाल के कोयला ढोते नजर आते हैं। ये ट्रक सिर्फ ज्यादा ट्रिप के लालच में सड़कों पर कोयला गिराते हुए दौड़ते हैं। यही कोयला बाद में वाहनों के दबाव से पिसकर महीन धूल बन जाता है और हवा में घुलकर सीधे लोगों के फेफड़ों में पहुंचता है।

सफाई के नाम पर दिखावा

अब बात करें उस तथाकथित "सफाई अभियान" की, जिसे SECL अपनी उपलब्धि बताने में लगी है। सड़कों पर ऑटोमैटिक मशीन से झाड़ू लगाने वाला ट्रक जरूर दिखाई देता है, लेकिन उसकी रफ्तार महज 5 किलोमीटर प्रति घंटा है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस मशीन के नाम पर रोज हजारों रुपए का डीजल खर्च दिखाया जा रहा है, लेकिन जमीन पर कोई असर नजर नहीं आता। लोगों का तंज है कि यह डीजल ट्रक में कम और "अफसरों की गाड़ियों" में ज्यादा खप रहा है।

जनता का दर्द: अफसरों तक क्यों नहीं पहुंचता?

एक बुजुर्ग की व्यंग्यात्मक टिप्पणी इस पूरे सिस्टम की पोल खोल देती है। उनका कहना है—"आप पत्रकार हैं? लिख दीजिए कि सड़कें बहुत अच्छी हैं, सफाई शानदार है और पानी का छिड़काव भी हो रहा है। क्योंकि यहां के अधिकारी तो एसी गाड़ियों में चलते हैं और एसी कमरों में बैठते हैं, उन्हें धूल-डस्ट का क्या पता?"

यह बयान सिर्फ एक व्यक्ति की नाराजगी नहीं, बल्कि पूरे धनपुरी की पीड़ा है। यहां के लोग पूछ रहे हैं कि आखिर उनका कसूर क्या है? क्यों उनके हिस्से में सिर्फ प्रदूषण, टूटी सड़कें और बर्बादी ही आई?

आखिर कब जागेगा सिस्टम?

धनपुरी की यह हालत किसी एक दिन की देन नहीं है, बल्कि वर्षों की लापरवाही, भ्रष्टाचार और मिलीभगत का नतीजा है। SECL और नगर पालिका परिषद अगर अब भी नहीं चेते, तो हालात और भयावह हो जाएंगे।

अब जरूरत है दिखावे की नहीं, बल्कि ठोस और सख्त कार्रवाई की। ट्रकों पर तिरपाल अनिवार्य हो, सड़कों की तत्काल मरम्मत हो, नियमित पानी का छिड़काव हो और सबसे जरूरी—जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।

वरना वह दिन दूर नहीं जब धनपुरी सिर्फ नक्शे में रह जाएगा और जमीनी हकीकत में "कोयले की कालिख में दफन एक शहर" बनकर रह जाएगा।