मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों मुद्दों की कमी नहीं है। बेरोजगारी है, किसानों की परेशानी है, शिक्षा व्यवस्था के सवाल हैं, स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियां हैं। लेकिन लगता है कि इन सब समस्याओं से निपटने से पहले राजनीति ने अपने लिए एक नया विषय खोज लिया है "दो-दो हाथ।"

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन को लेकर कहा कि भाजपा किसी भी अराजकता को सहन नहीं करेगी और यदि कांग्रेस नहीं सुधरी तो "चाहे विचारों से हो, चाहे संघर्ष से, चाहे भाषणों से, चाहे मैदान में हो, दो-दो हाथ करने के लिए भारतीय जनता पार्टी तैयार है।"

बयान सुनते ही ऐसा लगा जैसे हम किसी राजनीतिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं, बल्कि किसी अखाड़े के उद्घाटन समारोह में बैठे हों। फर्क सिर्फ इतना था कि वहां दांव-पेच की जगह माइक्रोफोन थे और पहलवानों की जगह नेता।

अब सवाल यह है कि आखिर राजनीति का मैदान कब से कुश्ती का मैदान बन गया? जनता तो अब तक यही समझती थी कि लोकतंत्र में विचार भिड़ते हैं, नीतियां टकराती हैं और तर्कों से मुकाबला होता है। लेकिन अब पता चल रहा है कि राजनीति का नया संस्करण लॉन्च हो चुका है, जिसमें बहस के साथ-साथ "दो-दो हाथ" का विकल्प भी उपलब्ध है।

हेमंत खंडेलवाल का कहना है कि राहुल गांधी विदेशों में जाकर देश का अपमान करते हैं और कांग्रेस अराजकता फैला रही है। यह उनका राजनीतिक मत हो सकता है और लोकतंत्र में हर दल को अपनी राय रखने का अधिकार है। लेकिन जब बात "मैदान में दो-दो हाथ" तक पहुंच जाए तो फिर जनता को भी थोड़ा भ्रम होना स्वाभाविक है कि आखिर यह राजनीतिक संघर्ष है या किसी दंगल का निमंत्रण।

वैसे भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के कार्यकर्ताओं को भी अब तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। हो सकता है आने वाले समय में चुनाव आयोग को आचार संहिता के साथ-साथ कुश्ती के नियम भी जारी करने पड़ें। प्रेस कॉन्फ्रेंस की जगह वेट कैटेगरी तय हो और विधानसभा सत्र शुरू होने से पहले खिलाड़ियों का वजन भी नापा जाए।

सबसे मजेदार बात यह है कि जब कोई बेरोजगार युवा नौकरी मांगने सड़क पर उतरता है तो उसे कानून-व्यवस्था का पाठ पढ़ाया जाता है। किसान अपनी फसल का उचित मूल्य मांगता है तो उसे धैर्य रखने की सलाह दी जाती है। छात्र प्रदर्शन करते हैं तो उन्हें अनुशासन का महत्व समझाया जाता है। लेकिन जब राजनीतिक दलों के नेता सार्वजनिक मंचों से दो-दो हाथ करने की बातें करते हैं, तब उसे राजनीतिक जोश कहा जाता है।

दरअसल लोकतंत्र में ताकत की सबसे बड़ी पहचान मांसपेशियां नहीं, बल्कि विचार होते हैं। अगर कांग्रेस गलत है तो उसे तथ्यों से हराइए। यदि राहुल गांधी देश का अपमान कर रहे हैं तो जनता के सामने उनके बयान रखिए। यदि भाजपा के पास बेहतर दृष्टिकोण है तो उसे जनता तक पहुंचाइए। लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि यहां प्रतिद्वंद्वी को पराजित करने का हथियार तर्क होता है, ताकत नहीं।

आज जनता यह नहीं जानना चाहती कि कौन किससे दो-दो हाथ करेगा। जनता यह जानना चाहती है कि महंगाई से कौन दो-दो हाथ करेगा। भ्रष्टाचार से कौन दो-दो हाथ करेगा। बेरोजगारी से कौन दो-दो हाथ करेगा। किसानों की समस्याओं से कौन दो-दो हाथ करेगा। लेकिन राजनीतिक दलों का उत्साह देखकर लगता है कि उनका सबसे बड़ा मुकाबला एक-दूसरे से ही है।

राजनीति में भाषा का महत्व बहुत बड़ा होता है। प्रदेश अध्यक्ष जैसे बड़े पद पर बैठा व्यक्ति जब कोई बात कहता है तो वह केवल बयान नहीं रहता, वह संदेश बन जाता है। हजारों कार्यकर्ता उसे सुनते हैं और उसी भावना को आगे बढ़ाते हैं। इसलिए नेताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे संघर्ष की बात करें तो लोकतांत्रिक संघर्ष की करें, विरोध की बात करें तो वैचारिक विरोध की करें।

क्योंकि सड़कें लड़ाई के लिए नहीं होतीं। सड़कें जनता के चलने के लिए होती हैं। सड़कें बच्चों को स्कूल पहुंचाने के लिए होती हैं। मजदूर को काम तक पहुंचाने के लिए होती हैं। मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए होती हैं। अगर हर राजनीतिक विवाद का समाधान सड़क और संघर्ष में खोजा जाएगा तो लोकतंत्र का असली उद्देश्य कहीं पीछे छूट जाएगा।

भाजपा और कांग्रेस दोनों को यह याद रखना चाहिए कि वे अखाड़े के पहलवान नहीं, लोकतंत्र के प्रतिनिधि हैं। जनता उन्हें दांव-पेच दिखाने के लिए नहीं चुनती, बल्कि समस्याओं का समाधान खोजने के लिए चुनती है।

इसलिए अध्यक्ष जी, अखाड़ा अगर सचमुच दो-दो हाथ करने के लिए है तो वहां पहलवानों को जाने दीजिए। राजनीति को विचारों का मंच रहने दीजिए। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी जीत प्रतिद्वंद्वी को चित करने से नहीं, जनता का विश्वास जीतने से मिलती है। और जहां तक सड़क का सवाल है, वह अभी भी चलने के लिए ही बनी है... अखाड़े के लिए नहीं।