नई दिल्ली, 27 अप्रैल, 2026। भारत की राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली से एक बार फिर पड़ोसी देशों में मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया है। विश्व हिन्दू परिषद ने पाकिस्तान और बांग्लादेश में रहने वाले धार्मिक अल्पसंख्यकों पर लगातार हो रहे अत्याचारों, मानवाधिकार उल्लंघनों और सुनियोजित हिंसा पर गहरी चिंता व्यक्त की है। संगठन ने वैश्विक मंच पर इस गंभीर मुद्दे को उठाते हुए संयुक्त राष्ट्र (UN) से तत्काल, निष्पक्ष और प्रभावी हस्तक्षेप करने की पुरजोर मांग की है। नई दिल्ली स्थित विश्व हिन्दू परिषद मुख्यालय से जारी एक विस्तृत बयान में इस बात पर जोर दिया गया है कि मानवाधिकारों की रक्षा का दावा करने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठनों को अब मूकदर्शक बने रहने के बजाय जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई करनी चाहिए।

विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष श्री आलोक कुमार ने इस संवेदनशील विषय पर सीधे संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की अध्यक्षा अन्नालेना बेयरबॉक को एक विस्तृत पत्र लिखा है। यह पत्र ऐसे समय में भेजा गया है जब यूएन महासभा की अध्यक्षा मंगलवार से नई दिल्ली की एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक यात्रा पर आने वाली हैं। उनकी नई दिल्ली यात्रा से ठीक पूर्व ई-मेल के माध्यम से भेजे गए इस पत्र में पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों ही देशों में हिन्दू, सिक्ख, बौद्ध और ईसाई समुदायों के साथ हो रहे अमानवीय उत्पीड़न, जबरन धर्मांतरण, अपहरण और सुनियोजित हिंसा के भयावह मामलों को अंतरराष्ट्रीय पटल पर उजागर किया गया है। विश्व हिन्दू परिषद का यह कदम नई दिल्ली के कूटनीतिक हलकों में भी चर्चा का विषय बन गया है।

पत्र में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार तंत्र की हालिया विस्तृत रिपोर्टों और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की गंभीर टिप्पणियों का प्रमुखता से हवाला दिया गया है। श्री आलोक कुमार ने पत्र के माध्यम से स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान में, विशेषकर वहां के ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में, नाबालिग लड़कियों के जबरन धर्मांतरण और उनकी इच्छा के विरुद्ध अधेड़ उम्र के पुरुषों से विवाह के मामलों में एक बहुत ही चिंताजनक और खौफनाक वृद्धि देखने को मिली है। इन जघन्य अपराधों में अधिकांश पीड़ित महिलाएं और छोटी बच्चियां अल्पसंख्यक हिन्दू और ईसाई समुदाय से संबंध रखती हैं।

पाकिस्तान के सिंध प्रांत का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए बताया गया है कि यह क्षेत्र ऐसे मानवाधिकार उल्लंघनों का केंद्र बन चुका है। वहां आए दिन अल्पसंख्यक परिवारों की बेटियों का अपहरण कर लिया जाता है और फिर उन्हें डरा-धमका कर उनका धर्म परिवर्तन करा दिया जाता है। पीड़ितों और उनके परिवारों को न केवल शारीरिक हिंसा का शिकार होना पड़ता है, बल्कि उन्हें गहरे मानसिक आघात और सामाजिक बहिष्कार का भी सामना करना पड़ता है। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि ऐसे गंभीर और संवेदनशील मामलों में पाकिस्तान की कानून प्रवर्तन एजेंसियों (पुलिस और प्रशासन) की प्रतिक्रिया बेहद उदासीन, अपर्याप्त और कई बार तो अपराधियों के पक्ष में झुकी हुई दिखाई देती है। स्थानीय पुलिस थानों में पीड़ितों की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की जाती, जिससे अपराधियों के हौसले और भी बुलंद हो जाते हैं।

इसी तरह के चिंताजनक हालात पड़ोसी देश बांग्लादेश में भी देखे जा रहे हैं। विश्व हिन्दू परिषद ने अपने पत्र में बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिन्दुओं के विरुद्ध बढ़ रही लक्षित हिंसा, भूमि पर अवैध कब्जों, मंदिरों में तोड़फोड़ और सामाजिक भेदभाव के अनेक मामलों का विस्तार से उल्लेख किया है। अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय मानवाधिकार रिपोर्टों के अनुसार, हाल ही में अगस्त 2024 के दौरान बांग्लादेश के विभिन्न हिस्सों में बड़ी संख्या में सांप्रदायिक हिंसा की भयंकर घटनाएं दर्ज की गईं। इन हिंसक घटनाओं में अल्पसंख्यक समुदायों के घरों, व्यवसायों और पूजा स्थलों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया। इस सुनियोजित हिंसा ने वहां रहने वाले अल्पसंख्यक समाज के भीतर एक गहरा डर और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है, जिसके कारण कई परिवार पलायन करने को भी मजबूर हुए हैं।

विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने अपने बयान में कड़े शब्दों में कहा कि इन घटनाओं की निरंतरता, क्रूरता और व्यापकता इस बात का स्पष्ट संकेत देती है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों ही देशों में अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों, उनके जीवन और उनकी संपत्ति की सुरक्षा के लिए जो मौजूदा कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्थाएं हैं, वे पूरी तरह से विफल और अपर्याप्त साबित हुई हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि यह संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समुदाय और विशेषकर संयुक्त राष्ट्र की सर्वोच्च जिम्मेदारी है कि वे इन गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों को रोकने के लिए केवल निंदा प्रस्तावों तक सीमित न रहें, बल्कि ऐसे ठोस और प्रभावी कदम उठाएं जिनका असर जमीन पर दिखाई दे।

संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष अन्नालेना बेयरबॉक के नई दिल्ली आगमन के संदर्भ में, विश्व हिन्दू परिषद अध्यक्ष आलोक कुमार ने अपने पत्र में संयुक्त राष्ट्र के समक्ष निम्नलिखित चार प्रमुख और स्पष्ट मांगें रखी हैं, जिन पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है:

  1. स्वतंत्र एवं निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय जांच: पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रही हिंसा, लक्षित हमलों और जबरन धर्मांतरण के मामलों की एक स्वतंत्र, पारदर्शी और निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय कमेटी द्वारा जांच करवाई जाए, क्योंकि स्थानीय एजेंसियों पर अब कोई भरोसा नहीं किया जा सकता।

  2. विशेष सुरक्षा तंत्र की स्थापना: पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, उन्हें बिना किसी भय के कानूनी लड़ाई लड़ने का माहौल देने और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में एक विशेष तंत्र (Special Mechanism) की तत्काल स्थापना की जाए।

  3. अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही तय करना: मानवाधिकारों का हनन करने वाले संबंधित देशों (पाकिस्तान और बांग्लादेश) की सरकारों पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप जवाबदेही तय की जाए। यदि वे अपने अल्पसंख्यकों की रक्षा करने में विफल रहते हैं, तो उन पर उचित अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव बनाया जाए।

  4. सख्त कानूनी और संस्थागत उपाय: महिलाओं, किशोरियों और नाबालिग बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए, उनके अपहरण और जबरन धर्मांतरण को रोकने के लिए इन देशों में अंतरराष्ट्रीय दबाव के माध्यम से सख्त कानूनी और संस्थागत उपाय लागू करवाए जाएं।

विश्व हिन्दू परिषद ने संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष नेतृत्व से यह पुरजोर आग्रह किया है कि वह इस मानवीय त्रासदी को कूटनीतिक फाइलों में दबने न दे, बल्कि इस मुद्दे को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए ठोस और परिणामदायी कार्रवाई सुनिश्चित करे। संगठन का मानना है कि ऐसा करके ही इन दोनों देशों में रहने वाले पीड़ित और प्रभावित अल्पसंख्यक समुदायों के जीवन, उनकी धार्मिक स्वतंत्रता, मानवीय गरिमा और उनके बुनियादी मानवाधिकारों की रक्षा की जा सकेगी।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाने के साथ-साथ, विश्व हिन्दू परिषद ने भारत सरकार को भी इस मामले में सक्रिय रूप से शामिल करने का प्रयास किया है। यूएन महासभा अध्यक्षा को भेजे गए इस महत्वपूर्ण पत्र की एक-एक प्रति संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के साथ-साथ भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर को भी नई दिल्ली स्थित उनके कार्यालयों में भेजी गई है। इसके पीछे का मुख्य उद्देश्य यह है कि भारत सरकार भी अपने कूटनीतिक चैनलों और द्विपक्षीय वार्ताओं के माध्यम से इन देशों पर दबाव बनाए और वैश्विक मंचों पर अल्पसंख्यक अधिकारों की इस लड़ाई को मजबूती प्रदान करे।

नई दिल्ली से उठी यह मांग अब देखना यह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय और विशेषकर संयुक्त राष्ट्र इस पर क्या रुख अपनाता है, क्योंकि यह मामला केवल किसी एक धर्म का नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता और विश्व भर में मानवाधिकारों की रक्षा के मूल सिद्धांतों से जुड़ा हुआ है।

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