मध्य प्रदेश के सागर जिले में प्रशासनिक कार्यप्रणाली को और अधिक चुस्त-दुरुस्त, पारदर्शी और पूर्ण रूप से जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से जिला प्रशासन ने अब बेहद कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। शासन के कामकाज में लेटलतीफी और विशेषकर न्यायालयीन मामलों में बरती जाने वाली किसी भी प्रकार की लापरवाही को अब बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सागर जिले की कलेक्टर श्रीमती प्रतिभा पाल ने प्रशासनिक अधिकारियों और जिले के विभिन्न विभागों के प्रमुखों को इस संबंध में स्पष्ट और बेहद सख्त निर्देश जारी किए हैं। प्रशासन का मुख्य लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि शासकीय कार्य समय-सीमा के भीतर पूरे हों और आम जनता या न्यायालय के समक्ष शासन की छवि एक जिम्मेदार तंत्र के रूप में प्रस्तुत हो।
कलेक्टर श्रीमती प्रतिभा पाल की अध्यक्षता में समय-सीमा (टीएल) प्रकरणों की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विस्तृत समीक्षा बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य जिले में लंबित पड़े महत्वपूर्ण कार्यों, विभिन्न न्यायालयों में चल रहे प्रकरणों और शासन की सर्वोच्च प्राथमिकताओं वाले मामलों की गहन समीक्षा करना था। इस गरिमामय और महत्वपूर्ण बैठक में जिला प्रशासन के कई शीर्ष अधिकारी प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। बैठक में मुख्य रूप से नगर निगम कमिश्नर श्री राजकुमार खत्री, अपर कलेक्टर श्री अविनाश रावत सहित जिले के समस्त अनुविभागीय दंडाधिकारी (एसडीएम) एवं जिले के समस्त विभागों के प्रमुख अधिकारी (विभाग अधिकारी) मौजूद थे। इस दौरान कलेक्टर ने एक-एक कर सभी विभागों की कार्यप्रणाली की समीक्षा की और आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।
इस पूरी समय-सीमा बैठक और कलेक्टर द्वारा दिए गए कड़े निर्देशों को निम्नलिखित विस्तृत बिंदुओं के माध्यम से स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है:
1. न्यायालयीन प्रकरणों में लापरवाही पर 1000 रुपये की पेनल्टी: समय-सीमा बैठक की समीक्षा करते हुए कलेक्टर श्रीमती प्रतिभा पाल ने सबसे अधिक जोर न्यायालयीन मामलों के त्वरित निराकरण और उनमें शासन का पक्ष मजबूती से रखने पर दिया। प्रशासन के संज्ञान में यह बात आई है कि कई बार विभागीय अधिकारियों की सुस्ती या लापरवाही के कारण न्यायालय में लंबित प्रकरणों में शासन की ओर से समय पर जवाब (रिप्लाई) प्रस्तुत नहीं किया जाता है, जिससे न केवल न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक देरी होती है, बल्कि शासन की छवि भी धूमिल होती है। इस लेटलतीफी पर कड़ा प्रहार करते हुए कलेक्टर ने एक ऐतिहासिक और सख्त निर्देश जारी किया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जो भी विभागीय अधिकारी न्यायालय में लंबित प्रकरणों में तय समय-सीमा के भीतर अपना जवाब या प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं करते हैं, उनके खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही की जाएगी। ऐसे लापरवाह अधिकारियों पर व्यक्तिगत रूप से एक-एक हजार (1000) रुपये की पेनल्टी (जुर्माना) लगाई जावे। इस आर्थिक दंड का उद्देश्य अधिकारियों में जिम्मेदारी का अहसास जगाना और न्यायिक कार्यों के प्रति गंभीरता सुनिश्चित करना है।
2. न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) के प्रति जीरो टॉलरेंस: न्यायालय के आदेशों की अवहेलना करना एक अत्यंत गंभीर न्यायिक अपराध है। बैठक के दौरान कलेक्टर ने इस विषय पर भी अधिकारियों को कड़ी हिदायत दी है। उन्होंने सभी विभाग अधिकारियों को यह व्यक्तिगत रूप से सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं कि सागर जिले के किसी भी सरकारी विभाग के खिलाफ न्यायालय की अवमानना (कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट) का कोई भी प्रकरण लंबित नहीं होना चाहिए। अवमानना से बचने का एकमात्र उपाय यही है कि न्यायालय द्वारा मांगी गई जानकारी या दिए गए निर्देशों का शत-प्रतिशत पालन करते हुए समय-सीमा में न्यायालय के पटल पर जवाब प्रस्तुत किया जाए। अधिकारियों को अपने-अपने विभागों के कानूनी मामलों की नियमित मॉनिटरिंग करने के निर्देश दिए गए हैं।
3. सीएम मॉनिट, आयोगों और जनप्रतिनिधियों के पत्रों का त्वरित निराकरण: सरकारी कामकाज में सर्वोच्च स्तर से आने वाले निर्देशों और जन-प्रतिनिधियों के पत्रों का विशेष महत्व होता है। कलेक्टर श्रीमती प्रतिभा पाल ने समीक्षा बैठक में कड़े निर्देश दिए हैं कि विभिन्न संवैधानिक और वैधानिक आयोगों (जैसे मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग आदि) के द्वारा प्राप्त पत्रों, मुख्यमंत्री मॉनिट (सीएम मॉनिट) कार्यालय से प्राप्त निर्देशों एवं निर्वाचित जनप्रतिनिधियों (सांसद, विधायक आदि) के पत्रों को सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखा जाए। किसी भी स्थिति में इन महत्वपूर्ण पत्रों का जवाब देने में विलंब नहीं होना चाहिए। अधिकारी यह सुनिश्चित करें कि वे निर्धारित समय-सीमा के भीतर इन सभी पत्रों का विधिवत और संतोषजनक जवाब प्रस्तुत करें।
4. व्यक्तिगत रूप से अवगत कराने की अनिवार्यता: जनप्रतिनिधियों और उच्च स्तरीय आयोगों के पत्रों के संबंध में कलेक्टर ने केवल लिखित जवाब भेजने तक ही अपनी बात को सीमित नहीं रखा, बल्कि एक कदम और आगे बढ़ते हुए एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि पत्रों का जवाब समय-सीमा में तैयार कर भेजने के साथ-साथ, संबंधित अधिकारी की यह भी जिम्मेदारी होगी कि वे पत्र भेजने वाले आयोग या जनप्रतिनिधि को की गई कार्यवाही के बारे में व्यक्तिगत रूप से अवगत भी कराएं। इस संवाद से प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय बेहतर होगा और किसी भी प्रकार के संचार अंतराल (कम्युनिकेशन गैप) को समाप्त किया जा सकेगा।
5. सीएम हेल्पलाइन: संवेदनशीलता और व्यक्तिगत संपर्क से होगा संतुष्टिपूर्ण निराकरण: मध्य प्रदेश शासन की सबसे महत्वपूर्ण जन-कल्याणकारी योजनाओं में से एक 'सीएम हेल्पलाइन' (CM Helpline) की स्थिति पर भी बैठक में विस्तार से चर्चा की गई। जनसमस्याओं के त्वरित निराकरण के लिए कलेक्टर ने सभी विभाग प्रमुखों को कड़े निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि सीएम हेल्पलाइन के तहत प्राप्त होने वाली आम जनता की शिकायतों को केवल एक सरकारी खानापूर्ति न माना जाए, बल्कि उनका निराकरण पूरी 'संवेदनशीलता' के साथ किया जाना चाहिए। अधिकारियों को निर्देशित किया गया है कि वे शिकायतकर्ता से व्यक्तिगत रूप से संपर्क (फोन कॉल या मुलाकात) करें, उनकी समस्या की मूल जड़ को समझें और उसका ऐसा तत्काल निराकरण करें जिससे शिकायतकर्ता पूरी तरह से संतुष्ट हो (संतुष्टि पूर्ण निराकरण)। कलेक्टर ने स्पष्ट किया कि सीएम हेल्पलाइन की शिकायतों का गुणवत्तापूर्ण निराकरण करके ही जिले और संबंधित विभाग की राज्य स्तरीय रैंकिंग को ठीक किया जा सकता है।
6. तहसीलदार, नायब तहसीलदार और रीडर्स के लिए अनिवार्य प्रशिक्षण कार्यक्रम: जिले की राजस्व व्यवस्था और राजस्व न्यायालयों की कार्यप्रणाली को पूरी तरह से त्रुटिहीन बनाने के लिए कलेक्टर ने एक बड़ा निर्णय लिया है। उन्होंने निर्देश दिए हैं कि सागर जिले में पदस्थ समस्त तहसीलदारों, समस्त नायब तहसीलदारों एवं उनके न्यायालयों के कामकाज को संभालने वाले संबंधित रीडर तथा अन्य सहयोगी अधिकारी-कर्मचारियों के कार्य-कौशल को निखारने के लिए एक विशेष प्रशिक्षण सत्र का आयोजन किया जाए। यह एक दिवसीय सघन प्रशिक्षण कार्यक्रम सीधे कलेक्टर कार्यालय के सभाकक्ष में आयोजित किया जाएगा। इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य इन सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को राजस्व न्यायालय की प्रक्रियाओं, कानूनी बारीकियों और न्यायालय से संबंधित सभी आवश्यक और अद्यतन जानकारी प्रदान करना है, ताकि वे अपने दायित्वों का निर्वहन बिना किसी कानूनी या प्रक्रियात्मक त्रुटि के कर सकें।
7. प्रशिक्षण के बाद गलती मिलने पर न्यायालय प्रमुख पर होगी सीधी और कठोर कार्यवाही: प्रशासनिक अमले को कार्य सिखाने के साथ-साथ कलेक्टर ने जवाबदेही तय करने का भी पूरा प्रबंध किया है। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा है कि कलेक्टर कार्यालय में आयोजित होने वाले इस एक दिवसीय विशेष प्रशिक्षण के माध्यम से सभी कानूनी जानकारियां प्रदान कर दी जाएंगी। परंतु, इस विस्तृत प्रशिक्षण के पूरा होने के बाद भी, यदि भविष्य में राजस्व कार्य के दौरान या किसी भी राजस्व न्यायालय (चाहे वह तहसीलदार का न्यायालय हो या नायब तहसीलदार का) के कामकाज में किसी भी प्रकार की गलती, विसंगति या लापरवाही प्राप्त होती है, तो इसके लिए सीधे तौर पर संबंधित 'न्यायालय प्रमुख' (यानी पीठासीन अधिकारी) को जिम्मेदार माना जाएगा। ऐसी स्थिति निर्मित होने पर उस संबंधित न्यायालय प्रमुख के खिलाफ अत्यंत सख्त और दंडात्मक कार्यवाही सुनिश्चित की जाएगी। यह निर्देश राजस्व अधिकारियों को अपने कामकाज में शत-प्रतिशत सटीकता लाने के लिए एक कड़ा संदेश है।
8. आदेशों की तामीली और अमल की समय-सीमा एवं मॉनिटरिंग (फीडबैक सिस्टम): राजस्व न्यायालयों के फैसले केवल कागजों तक सीमित न रहें, इसके लिए भी कलेक्टर ने ठोस रणनीति तैयार की है। बैठक के अंत में उन्होंने निर्देश दिया कि यह सुनिश्चित किया जावे कि जिले के किसी भी तहसीलदार या नायब तहसीलदार द्वारा जो भी राजस्व आदेश पारित किए जाते हैं, उन आदेशों की जमीनी स्तर पर तामीली (प्रदान करना/सूचित करना) और उन आदेशों पर अमल (कार्यान्वयन) एक निर्धारित समय-सीमा के भीतर अनिवार्य रूप से हो जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल आदेश का पालन होना ही काफी नहीं है, बल्कि जिस अधिकारी या कर्मचारी को आदेश के पालन की जिम्मेदारी सौंपी गई है, वह यह सुनिश्चित करेगा कि आदेश की तामीली और अमल हो जाने की विस्तृत रिपोर्ट/जानकारी वापस उसी तहसीलदार या नायब तहसीलदार के पास समय-सीमा में पहुंचे जिसने वह आदेश जारी किया था। इस क्लोज्ड-लूप मॉनिटरिंग सिस्टम से राजस्व प्रकरणों के निराकरण में जबरदस्त तेजी और पारदर्शिता आएगी।
Image Source: https://sagar.mpinfo.org
Continue With Google
Comments (0)