फसल सुरक्षा और उन्नत तकनीकी मार्गदर्शन के उद्देश्य से कृषि रोडमैप के अंतर्गत मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में कृषि वैज्ञानिकों एवं विभागीय अमले द्वारा लगातार निरीक्षण और प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। इसी सिलसिले में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), नई दिल्ली के कृषि वैज्ञानिकों तथा कृषि विभाग विदिशा के संयुक्त दल ने विदिशा विकासखंड के अंतर्गत आने वाले ग्राम हसुआ का दौरा किया। इस दौरान खेतों का प्रत्यक्ष निरीक्षण कर किसानों को सोयाबीन और उड़द की फसलों में लगने वाले रोगों तथा कीट-व्याधियों के नियंत्रण के लिए वैज्ञानिक एवं तकनीकी उपाय बताए गए।

खेतों का निरीक्षण और किसानों के साथ संवाद

विदिशा जिले के उपसंचालक कृषि कार्यालय के मार्गदर्शन में चलाए जा रहे इस अभियान के तहत एसएडीओ श्री रूपेश वाघेल, प्रभारी एसएडीओ श्री विशाल यादव और IARI नई दिल्ली के कृषि वैज्ञानिकों—डॉ. लक्ष्मण प्रसाद, श्री गगन कुमार महापात्रा तथा श्री नफीस अहमद ने ग्राम हसुआ के किसानों के साथ खेतों का सघन भ्रमण किया। इस मौके पर स्थानीय प्रगतिशील किसान श्री विशाल दांगी, श्री कमलेश लोधी और अहमदपुर मंडल अध्यक्ष श्री रामेश्वर किरार सहित गांव के अन्य किसान भी उपस्थित रहे। दल ने किसानों के साथ मिलकर उनके खेतों में लहलहा रही सोयाबीन और उड़द की फसलों की वर्तमान स्थिति का बारीकी से अवलोकन किया और फसलों में उभर रही समस्याओं पर चर्चा की।

ग्राम पंचायत भवन में आयोजित हुआ विशेष प्रशिक्षण शिविर

खेतों के सफल निरीक्षण के पश्चात ग्राम पंचायत हसुआ के पंचायत भवन में एक विशेष तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस प्रशिक्षण शिविर में लगभग 40 स्थानीय किसानों ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया। कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों की फसलों में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे रहे पीला मोजेक, सोयाबीन मोजेक, पत्ती खाने वाली इल्ली तथा अन्य कीट एवं रोगों के लक्षणों की विस्तार से जानकारी ली। वैज्ञानिकों ने मौके पर ही किसानों की विभिन्न समस्याओं का समाधान करते हुए फसल सुरक्षा के बेहद कारगर और व्यावहारिक उपाय सुझाए।

वैज्ञानिकों ने किसानों को स्पष्ट रूप से सलाह दी कि यदि उनकी फसल में किसी भी प्रकार के रोग या कीट के शुरुआती लक्षण दिखाई दें, तो वे बिना देर किए स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से संपर्क करें और उनके द्वारा अनुशंसित एवं प्रमाणित उपाय ही अपनाएं। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि फसलों में किसी भी स्थिति में अनावश्यक रूप से अथवा कृषि विभाग की अनुशंसा से अधिक मात्रा में कीटनाशकों और फफूंदनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे न केवल लागत बढ़ती है बल्कि पर्यावरण और फसल पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।

राइजोक्टोनिया एरियल ब्लाइट की पहचान और उसके रोकथाम के उपाय

प्रशिक्षण के दौरान कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को 'राइजोक्टोनिया एरियल ब्लाइट' नामक गंभीर फफूंदजनित रोग की पहचान करने और उसकी रोकथाम के विस्तृत तरीके बताए। वैज्ञानिकों ने समझाया कि इस रोग की शुरुआत अमूमन पत्तियों पर पानी जैसे दाग या धब्बों के रूप में दिखाई देती है। यदि समय रहते इस बीमारी पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह तेजी से फैलती है और पौधे पूरी तरह से सूख सकते हैं।

इस रोग से फसल को बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी कि जैसे ही खेतों में इस रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई दें, तुरंत अनुशंसित फफूंदनाशकों का उपयोग किया जाना चाहिए। इसके तहत फ्लूक्सापायरोक्साड तथा पायराक्लोस्ट्रोबीन के मिश्रण की 300 मिलीलीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर अथवा पायराक्लोस्ट्रोबीन और एपॉक्सीकोनाजोल के मिश्रण की 750 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की अनुशंसित मात्रा के हिसाब से खेतों में छिड़काव करना चाहिए। इससे पौधे स्वस्थ रहते हैं और रोग का प्रसार रुक जाता है।

पीला मोजेक एवं सोयाबीन मोजेक रोग से बचाव की तकनीकी जानकारी

सोयाबीन की फसल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाने वाले पीला मोजेक तथा सोयाबीन मोजेक रोगों पर चर्चा करते हुए वैज्ञानिकों ने बताया कि यदि फसल में इन रोगों के लक्षण नजर आएं, तो प्रारंभिक अवस्था में ही उन सभी रोगग्रस्त पौधों को खेत से उखाड़कर तुरंत बाहर फेंक देना चाहिए ताकि संक्रमण अन्य स्वस्थ पौधों तक न फैले।

वैज्ञानिकों ने किसानों को यह भी जानकारी दी कि इन खतरनाक रोगों के खेतों में तेजी से फैलाव के पीछे सफेद मक्खी और एफिड जैसे वाहक कीटों की मुख्य भूमिका होती है। इन वाहक कीटों के सफल नियंत्रण के लिए किसानों को निम्नलिखित अनुशंसित कीटनाशकों के प्रयोग की जानकारी दी गई:

  • थायोमेथोक्सम तथा लैम्ब्डा-साइहेलोथ्रिन के मिश्रण की 125 मिलीलीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर।

  • बीटासाइफ्लूथ्रिन की 350 मिलीलीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर।

  • एसिटामिप्रिड 25 प्रतिशत के साथ बाइफेंथ्रिन 25 प्रतिशत डब्ल्यूजी की 250 ग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर।

इन छिड़काव उपायों को अपनाने से तना मक्खी के नियंत्रण में भी काफी हद तक सहायता मिलती है। इसके अलावा, सफेद मक्खी की नियमित निगरानी करने और उसके जैविक नियंत्रण के लिए खेत में अलग-अलग स्थानों पर पीले स्टिकी ट्रैप (पीले रंग के चिपचिपे पाश) लगाने की अत्यंत उपयोगी सलाह भी दी गई।

पत्ती खाने वाली इल्लियों की रोकथाम के लिए वैज्ञानिक निर्देश

सोयाबीन और उड़द की फसल को भारी क्षति पहुँचाने वाली पत्ती खाने वाली तंबाकू की इल्ली तथा अन्य विनाशकारी पत्तीभक्षी इल्लियों के प्रभावी नियंत्रण के लिए केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड द्वारा अनुशंसित कीटनाशकों के बारे में किसानों को विस्तार से समझाया गया। वैज्ञानिकों ने बताया कि किसान अपनी सुविधा और आवश्यकता के अनुसार निम्नलिखित विकल्पों में से किसी एक का चयन कर सकते हैं:

  • क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.5 एससी की 150 मिलीलीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर।

  • स्पाइनोटेरम 11.7 एससी की 450 मिलीलीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर।

  • इमामेक्टिन बेंजोएट 1.9 एसजी की अनुशंसित मात्रा।

इसी प्रकार, पत्ती खाने वाली अन्य प्रजाति की इल्लियों के संपूर्ण नियंत्रण के लिए इमामेक्टिन बेंजोएट 1.9 प्रतिशत की 425 मिलीलीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर अथवा फ्लूबेंडियामाइड 20 डब्ल्यूजी की 250 से 300 ग्राम प्रति हेक्टेयर की अनुशंसित मात्रा का उपयोग करने की तकनीकी जानकारी भी किसानों को प्रदान की गई, जिससे वे अपनी फसल को समय रहते सुरक्षित कर सकें।

एंथ्रेक्नोज रोग के प्रति किसानों को किया गया जागरूक

फसल सुरक्षा अभियान के अंतिम चरण में कृषि वैज्ञानिकों ने एंथ्रेक्नोज नामक खतरनाक फफूंदजनित रोग पर भी किसानों का ध्यान आकर्षित किया। वैज्ञानिकों ने बताया कि एंथ्रेक्नोज एक प्रमुख फफूंदजनित रोग है, जिसकी शुरुआत आमतौर पर सोयाबीन की पत्तियों की निचली सतह पर सिरों के काले पड़ने के रूप में दिखाई देती है।

यदि समय रहते इस रोग की पहचान न की जाए तो यह फसल को भारी नुकसान पहुँचा सकता है। ऐसी स्थिति में समय पर नियंत्रण पाने के लिए कार्बेन्डाजिम 12 प्रतिशत और मैन्कोजेब 63 प्रतिशत डब्ल्यूपी के मिश्रण की 1.25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की अनुशंसित मात्रा के उपयोग की जानकारी किसानों को दी गई। अंत में कृषि वैज्ञानिकों ने सभी किसानों से पुरजोर अपील की कि वे सप्ताह में नियमित रूप से अपने खेतों का सतत निरीक्षण करते रहें ताकि किसी भी कीट या बीमारी की समय रहते पहचान की जा सके और समय पर उसका उचित उपचार किया जा सके।

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