*रेंजर बंगले में सागौन-चंदन कटने के मामले में जांच की धीमी रफ्तार पर सवाल*
*क्या विभागीय स्तर पर भी हो भूमिका की जांच? हालिया तबादलों के बाद उठे नए सवाल*

 

मानपुर। रेंजर बंगले से सागौन और चंदन जैसे बेशकीमती पेड़ों की कटाई का मामला अब जांच की धीमी रफ्तार को लेकर सवालों के घेरे में है। वन विभाग के ही परिसर से वर्षों पुराने इमारती पेड़ कट जाने के बावजूद जिम्मेदारों तक अब तक नहीं पहुंच पाने को लेकर आमजन में चर्चा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या जांच में घटना के समय पदस्थ विभागीय अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका और निगरानी व्यवस्था को भी शामिल किया गया है?
गौरतलब है कि 17 जुलाई 2026 की रात मानपुर रेंजर बंगले परिसर से वर्षों पुराना चंदन का पेड़ काटे जाने का मामला सामने आया था। इससे पहले इसी परिसर से करीब 100 सेंटीमीटर का सागौन का पेड़ भी काटे जाने की बात सामने आई थी। दोनों घटनाओं को लेकर संबंधित अधिकारियों के समक्ष लिखित शिकायतें की जा चुकी हैं और जिम्मेदारों की पहचान कर कार्रवाई की मांग की गई है।
*शिकायतों के बाद भी जांच की गति पर सवाल*
मामले में 20 जुलाई को उपवन मंडल अधिकारी, उपवन मंडल मानपुर तथा 24 जुलाई को उपसंचालक, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के समक्ष शिकायत देकर दोनों घटनाओं की जानकारी दी गई थी। शिकायतों में पेड़ों की कटाई के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान कर कार्रवाई की मांग की गई।
इसके बावजूद कई सप्ताह बीतने के बाद भी आरोपियों तक पहुंचने को लेकर कोई ठोस जानकारी सामने नहीं आई है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब घटना वन विभाग के ही परिसर में हुई है, तो जांच की रफ्तार इतनी धीमी क्यों है?
*हालिया तबादलों ने बढ़ाई चर्चा*
इसी बीच हाल ही में मानपुर वन परिक्षेत्र में पदस्थ कई अधिकारियों और कर्मचारियों के तबादले भी हुए हैं। ऐसे में जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह होना चाहिए कि घटना के समय मानपुर वन परिक्षेत्र में पदस्थ अधिकारियों और कर्मचारियों की जिम्मेदारी तथा उस समय की निगरानी व्यवस्था की भी पड़ताल की जाए।
क्या रेंजर बंगले परिसर में मौजूद पेड़ों का कोई रिकॉर्ड या निरीक्षण रिपोर्ट उपलब्ध है? पेड़ों की निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी? काटे गए पेड़ों की लकड़ी कहां गई? क्या घटना के समय पदस्थ अधिकारियों-कर्मचारियों से पूछताछ की गई? क्या हालिया तबादलों के बाद भी संबंधित लोगों से इस मामले में जानकारी ली गई? इन सवालों के जवाब निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकते हैं।
*100 दिन चले अढ़ाई कोस’ न बन जाए जांच*
शिकायतों के बावजूद यदि जांच की गति इसी तरह धीमी रही तो आमजन के बीच यह सवाल उठना लाजिमी है कि कहीं मामला ‘जांच के नाम पर 100 दिन चले अढ़ाई कोस’ जैसा तो नहीं बन रहा है।
यदि किसी विभागीय अधिकारी या कर्मचारी की कोई भूमिका नहीं है, तो जांच तेजी से पूरी कर वास्तविक आरोपियों तक पहुंचना विभाग के हित में होगा। वहीं यदि जांच के दौरान किसी विभागीय व्यक्ति की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है, तो तथ्यों के आधार पर उसकी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
*वन संपदा की सुरक्षा पर भी सवाल*
रेंजर बंगला वन विभाग के अधिकारियों की निगरानी वाला परिसर है। ऐसे में वहां से सागौन और चंदन जैसे बेशकीमती पेड़ों का कट जाना वन संपदा की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
जब विभाग के अपने परिसर में वन संपदा की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं, तो जंगलों में मौजूद बेशकीमती वन संपदा की सुरक्षा व्यवस्था कितनी मजबूत है? यह सवाल अब आमजन के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
अब देखना होगा कि वन विभाग इस मामले में निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच करते हुए घटना के समय पदस्थ अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका, निगरानी व्यवस्था और कटाई के बाद लकड़ी की स्थिति समेत सभी पहलुओं की पड़ताल करता है या नहीं।