नफीस खान सीहोर.......

सीहोर जिले में विधानसभा चुनाव 2023 के दौरान शासन ने किसानों को खुश करने के लिए गेहूं की बंपर खरीदी की। न छोटे-बड़े का अंतर रहा। स्लॉट बुकिंग की झंझट भी नहीं रही। इस बार चुनावी वर्ष नहीं है। शासन ने गेहूं खरीदी के नियम और प्रक्रिया जटिल कर दी। खरीदी प्रभावित हो रही है। बड़े किसानों को स्लॉट देर से मिले। नियमों से नाराज कई किसानों ने केंद्र की जगह मंडी में गेहूं बेच दिया। प्रति क्विंटल 40 रुपए के बोनस का भी उन्होंने मोह नहीं देखा। इस बार खरीदी के आंकड़े पलट गए। समर्थन मूल्य पर जिले में अभी तक 5 लाख 13 हजार मीट्रिक टन गेहूं की खरीदी हो सकी है। मंडियों में इस बार 7 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदा जा चुका है। किसानों का कहना है कि मंडी में तुरंत भुगतान मिल रहा है। समर्थन मूल्य पर बेचने पर भुगतान तब होता है, जब तक गेहूं गोदाम के अंदर नहीं पहुंच जाता। इसी वजह से इस बार अभी तक कई किसानों को उपार्जन का भुगतान नहीं हुआ। किसान समितियों के चक्कर लगा रहे हैं। इस बार समर्थन मूल्य पर गेहूं की खरीदी लगातार आगे बढ़ती गई।

किसानःअन्नदाता नहीं, देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ है

अगर किसान एक दिन खेत में काम करना बंद कर दे. तो शहरों की रसोई टेडी पड़ जाएगी, फैक्टरियों के पहिए थम जाएंगे और बाजारों में सन्नाटा छा जाएगा। किसान सिर्फ गेहूं, चावल या दाल नहीं उगाता, वो देश की अर्थव्यवस्था, समाज और संस्कृति को भी सीचता है।

 किसान के योगदान के कुछ अहम पहलू

 देश की 70% से अधिक आबादी को भोजन कराता है।

 खेती से जुड़े उद्योगों को कच्चा माल मिलता है।

 गांव की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाता है।

 कृषि निर्यात से देश की आधिक स्थिति मजबूत होती है।

प्राकृतिक संतुलन और पर्यावरण को बनाए रखता है।

ये गर्मी, ये धूप और ये इंतजार... फिर भी हौंसला नहीं हारते

42-45 डिग्री की गर्मी में ट्रैक्टर पर बैठे किसान, घंटों कतार में खड़े रहते हैं, पसीने से लथपथ हो जाते हैं। फिर भी ना शिकावत, ना गुस्सा बस एक ही उम्मीद कि उनकी मेहनत की कमाई उन्हें सही दाम नहीं मिलता

आज भी शहरों में 'गंवार' कहलाता है देश का अन्नदाता

किसान की आज भी गांवों में 'गंवार' कहकर बुलाया जाता है. जबकि वही देश को पढ़ाता है। ये कैसा समाज है जो अन्नदाता का सम्मान करना भूल गया? समय आ गया है कि हम अपने नजरिये बदलें और किसान को वो सम्मान दें जिसका वो हकदार है।