आलोट। हरिजन कन्या छात्रावास में छात्राओं के वीडियो बनाए जाने से शुरू हुआ विवाद अब जांच की निष्पक्षता को लेकर सवालों के घेरे में आ गया है। शुक्रवार को विभागीय आयुक्त प्रियंका राही जांच के लिए छात्रावास पहुंचीं। जांच के बाद छात्राओं ने आरोप लगाया कि उनकी बात पूरी तरह नहीं सुनी गई और केवल चुनिंदा छात्राओं के बयान लेकर जांच प्रक्रिया पूरी कर दी गई। इसके विरोध में छात्राओं ने एकजुट होकर नाराजगी जाहिर की और निष्पक्ष जांच की मांग उठाई।
छात्राओं का कहना है कि छात्रावास में करीब 50 बालिकाएं निवास करती हैं, लेकिन जांच के दौरान सभी संबंधित छात्राओं से स्वतंत्र रूप से जानकारी लेने के बजाय केवल चार-पांच छात्राओं के बयान लिए गए। छात्राओं का सवाल है कि जिस घटनाक्रम को लेकर विवाद हुआ, उसके प्रत्यक्षदर्शी सभी छात्राओं की बात सुने बिना जांच किस आधार पर पूरी की गई।
फटकार और निलंबन की कथित धमकी के बाद छात्राएं हुईं अस्वस्थ
छात्राओं ने आरोप लगाया कि जब उन्होंने आयुक्त प्रियंका राही से स्वयं बात कर अपना पक्ष रखने और जांच में उनकी बात दर्ज करने का आग्रह किया तो उन्हें कथित रूप से फटकार लगाई गई। छात्राओं के अनुसार, इसी दौरान अधीक्षिका निर्मला भंवर को निलंबित करने की बात कही गई।
छात्राओं का दावा है कि इस घटनाक्रम से वे मानसिक रूप से आहत हुईं और चार छात्राओं की तबीयत बिगड़कर उनके मूर्छित होने की स्थिति बन गई। इसके बाद उन्हें उपचार के लिए शासकीय अस्पताल ले जाया गया। वहां उनका उपचार कराया गया। इस पूरे घटनाक्रम की पुष्टि अस्पताल के मेडिकल रिकॉर्ड और संबंधित छात्राओं के बयान से की जा सकती है।
छात्राओं का आरोप है कि वे केवल अपनी बात अधिकारियों तक पहुंचाना चाहती थीं, लेकिन उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। इसको लेकर छात्रावास में काफी नाराजगी देखी गई।
वीडियो बनाने से रोकने पर हुई थी शिकायत
मामले की शुरुआत छात्रावास परिसर में छात्राओं के वीडियो बनाए जाने को लेकर हुई थी। छात्राओं की निजता और सुरक्षा को देखते हुए अधीक्षिका निर्मला भंवर द्वारा वीडियो बनाने का विरोध किए जाने की बात सामने आई थी। विवाद के बाद अधीक्षिका ने संबंधित व्यक्ति के खिलाफ आलोट थाने में शिकायत भी की थी।
मामला समाचार पत्रों में प्रकाशित होने के बाद मंदसौर विधायक विपिन जैन ने विधानसभा में छात्रावास परिसर में प्रवेश कर छात्राओं के वीडियो बनाए जाने और उनकी सुरक्षा का मुद्दा उठाते हुए सरकार से कार्रवाई को लेकर जवाब मांगा था।
जांच के दौरान ‘बेडरूम के कैमरे’ को लेकर भी उठा सवाल
अधीक्षिका निर्मला भंवर के अनुसार, जांच के दौरान आयुक्त प्रियंका राही ने छात्रावास की बालिकाओं के बेडरूम की सीसीटीवी फुटेज के संबंध में जानकारी मांगी। अधीक्षिका ने स्पष्ट किया कि छात्राओं के सोने वाले कमरों में कैमरे लगाए ही नहीं गए हैं।
बताया गया कि इस दौरान यह सवाल भी सामने आया कि यदि करण सिंह जाट के छात्राओं के बेडरूम तक पहुंचने की बात कही जा रही है तो वहां की वीडियो फुटेज उपलब्ध कराई जाए। अधीक्षिका ने बताया कि बालिकाओं के सोने वाले कमरों में कैमरे नहीं लगाए गए हैं।
यह बिंदु भी मामले में महत्वपूर्ण है। छात्रावास में रहने वाली बालिकाओं की निजता और गरिमा को देखते हुए उनके सोने वाले कमरों में सीसीटीवी लगाए जाने का सवाल गंभीर है। बेडरूम में कैमरे लगाने के बजाय छात्रावास के प्रवेश द्वार, गलियारे और अन्य सार्वजनिक हिस्सों में सुरक्षा व्यवस्था होना अधिक उपयुक्त है, ताकि सुरक्षा भी बनी रहे और छात्राओं की निजता भी सुरक्षित रहे।
अब अधीक्षिका के खिलाफ जांच पर छात्राओं की आपत्ति
छात्राओं का कहना है कि मूल विवाद में छात्राओं के वीडियो बनाए जाने के मामले में कार्रवाई होने के बजाय अब अधीक्षिका और उनके पति के खिलाफ जांच की गई। छात्राओं ने आरोप लगाया कि जांच के दौरान उनकी बात रखने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
छात्राओं के अनुसार, अधीक्षिका उनके साथ अभिभावक जैसा व्यवहार करती हैं और उनकी सुरक्षा तथा जरूरतों का ध्यान रखती हैं। छात्राओं ने अधीक्षिका के खिलाफ लगाए गए आरोपों को गलत बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।
करीब 50 छात्राएं हैं, सभी के बयान क्यों नहीं?
जांच प्रक्रिया पर छात्राओं का सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि विभाग वास्तव में निष्पक्ष जांच करना चाहता था तो छात्रावास में रहने वाली सभी संबंधित छात्राओं से स्वतंत्र रूप से पूछताछ क्यों नहीं की गई।
छात्राओं का आरोप है कि चुनिंदा छात्राओं के बयान के आधार पर निष्कर्ष निकालने का प्रयास किया गया। वहीं उन्होंने यह भी कहा कि वे स्वयं जांच अधिकारी के सामने अपना पक्ष रखना चाहती थीं, लेकिन उनकी बात को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।
कलेक्टर से स्वतंत्र जांच की मांग
छात्राओं के विरोध के बाद अब मामले में स्वतंत्र जांच की मांग उठ रही है। छात्राओं का कहना है कि कलेक्टर स्तर से किसी वरिष्ठ एवं निष्पक्ष अधिकारी की निगरानी में दोबारा जांच कराई जाए। इसमें सभी संबंधित छात्राओं के स्वतंत्र बयान लिए जाएं और मूल शिकायत, पुलिस आवेदन, उपलब्ध वीडियो, सीसीटीवी की वास्तविक लोकेशन तथा अन्य दस्तावेजों को भी जांच का हिस्सा बनाया जाए।
साथ ही चार छात्राओं के अस्वस्थ होने की घटना की भी निष्पक्ष जांच हो और अस्पताल में हुए उपचार के रिकॉर्ड को जांच में शामिल किया जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि घटनाक्रम के दौरान वास्तव में क्या स्थिति बनी थी।
सवाल सिर्फ अधीक्षिका का नहीं, छात्राओं की सुरक्षा और जांच की पारदर्शिता का भी
मामले में छात्राओं की सुरक्षा और निजता सबसे महत्वपूर्ण है। यदि छात्राओं के वीडियो उनकी अनुमति के बिना बनाए गए थे तो उसकी निष्पक्ष जांच और कार्रवाई आवश्यक है। वहीं अधीक्षिका के खिलाफ लगाए गए आरोपों की सच्चाई भी सभी पक्षों के स्वतंत्र बयान और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही तय होनी चाहिए।
अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन शुक्रवार की जांच को ही अंतिम मानेगा या छात्राओं द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों—एकतरफा बयान, अपनी बात नहीं सुने जाने, कथित फटकार और चार छात्राओं के अस्वस्थ होने—को गंभीरता से लेते हुए स्वतंत्र जांच के आदेश देगा?
कलेक्टर स्तर से स्वतंत्र जांच होने पर ही पूरे घटनाक्रम की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकेगी और यह भी स्पष्ट होगा कि छात्रावास में छात्राओं की सुरक्षा के लिए आवाज उठाने वाली अधीक्षिका के खिलाफ लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है तथा मूल विवाद में जिम्मेदारी किसकी बनती है।
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