भारत आज ज्ञान, विज्ञान, नवाचार और तकनीक के क्षेत्र में एक नई छलांग लगाने की तैयारी कर रहा है। विकसित भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक विकास और आधुनिक बुनियादी ढाँचे से पूरा नहीं होगा। इसके लिए ऐसे विश्वविद्यालय, शोध संस्थान और शिक्षण केंद्र चाहिए जहाँ प्रतिभाशाली लोग न केवल आएँ, बल्कि पूरे मन, स्वतंत्रता और उत्साह के साथ काम भी करें। भारत में प्रतिभा की कमी कभी नहीं रही। हमारे विद्यार्थी और शोधकर्ता दुनिया के प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी क्षमता साबित करते रहे हैं। फिर भी एक असहज प्रश्न सामने हेः क्या हम प्रतिभा पैदा करने के साथ-साथ उसके भीतर काम करने का उत्साह भी बचाकर रख पा रहे हैं?

यह सवाल केवल प्रतिभा के विदेश जाने या किसी संस्था से इस्तीफा देने का नहीं है। इससे पहले एक अधिक मौन प्रक्रिया शुरू होती है। व्यक्ति देश या संस्था छोड़ता बाद में है, कई बार वह उससे मानसिक रूप से बहुत पहले दूर हो चुका होता है।

भारत में सरकारी शिक्षण और शोध संस्थानों की एक विशिष्ट वास्तविकता है। नौकरी की सुरक्षा और स्थायित्व के कारण अधिकांश लोग इस्तीफा नहीं देते। इसलिए किसी व्यक्ति का नौकरी में बने रहना यह साबित नहीं करता कि वह अपने काम से संतुष्ट और पूरी तरह जुड़ा हुआ है। कई बार व्यक्ति नौकरी नहीं छोड़ता, लेकिन अपने काम से मन का रिश्ता छोड देता है। वह महाविद्यालय आता है, कक्षाएँ लेता है, परीक्षा के पेपर बनाता है. कॉपियां जांचता है और अन्य सौंपी गयी निर्धारित जिम्मेदारियाँ निभाता है। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाई देता है, लेकिन लेकिन व्यक्ति के भीतर कुछ बदल चुका होता है। नए विचारों के लिए उत्साह कम हो जाता है। अतिरिक्त प्रयास करने की इच्छा घट जाती है। शोध में जोखिम लेने का साहस कम होता है। विद्यार्थियों के लिए कुछ अलग करने की प्रेरणा कमजोर पड़ती है। व्यक्ति काम करना बंद नहीं करता, लेकिन काम में अपना मन लगाना बंद कर देता है। यह स्थिति इस्तीफे से भी अधिक गंभीर होती है, क्योंकि व्यक्ति संस्था में मोजूद रहते हुए भी अपनी क्षमता का पूरा उपयोग करना बंद कर देता है।
 

किसी भी संस्थान को समझने के लिए केवल सेवा नियम और प्रशासनिक प्रक्रियाएँ पर्याप्त नहीं हैं। हमें मानव मन को भी समझना होगा। मनुष्य तब बेहतर काम करता है जब उसे अपने काम में अर्थ दिखाई देता है, अपने निर्णयों में कुछ स्वतंत्रता महसूस होती है, अपने प्रयास की पहचान मिलती है और उसे लगता है कि उसके साथ न्याय हो रहा है।

जब किसी व्यक्ति को लगातार यह महसूस होने लगे कि उसकी मेहनत और परिणाम के बीच कोई संबंध नहीं है, उसकी राय का कोई महत्व नहीं है, पहल करने का कोई लाभ नहीं है ओर अच्छे काम की पहचान निश्चित नहीं है, तो उसके भीतर धीरे-धीरे अपने काम के प्रति जुड़ाव और उद्देश्य की भावना कम होने लगती है। फिर वह अपने काम को अपना योगदान नहीं, केवल अपनी ड्यूटी समझने लगता है। यहीं से उत्साह का क्षरण शुरू होता है।

व्यक्ति आमतौर पर एक दिन में निराश नहीं होता। निराशा एक संचयी अनुभव है। वह पहल करता है, प्रतिक्रिया नहीं मिलती। मेहनत करता है, पहचान नहीं मिलती। बदलाव का सुझाव देता है, लेकिन व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं आता। धीरे-धीरे उसके भीतर यह धारणा बन सकती है कि "यहाँ कुछ बदलने वाला नहीं है।" इसके बाद वह संघर्ष करना कम कर देता है और अपनी ऊर्जा बचाने लगता है। यह हमेशा आलस्य नहीं होता। कई बार यह निराश मन की आत्म-सुरक्षा की प्रक्रिया होती है।

दार्शनिक अल्बेयर कामू का विचार है, "Without work, all life goes rotten. But when work is soulless, life stifles and dies." अर्थात, काम जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन जब काम में आत्मा न रह जाए तो जीवन भीतर से घुटने लगता है। शिक्षण और शोध में यह बात और अधिक महत्वपूर्ण है। शिक्षक से कक्षा में उपस्थित रहना सुनिश्चित किया जा सकता है, लेकिन विद्यार्थियों में जिज्ञासा पैदा करने का आदेश नहीं दिया जा सकता। वैज्ञानिक से परियोजना पूरी करवाई जा सकती है, लेकिन किसी बड़ी खोज का आदेश नहीं दिया जा सकता। रचनात्मकता और उत्कृष्टता अंततः आंतरिक प्रेरणा से आती हैं।

निष्पक्षता भी मानव मन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। व्यक्ति केवल यह नहीं देखता कि उसे क्या मिला, वह यह भी देखता है कि दूसरों को क्या मिला और क्यों मिला। यदि किसी संस्थान में योग्यता, मेहनत और परिणाम से अधिक व्यक्तिगत समीकरण महत्वपूर्ण दिखाई देने लगें, तो निष्पक्षता की भावना कमजोर होती है। तब व्यक्ति के भीतर यह प्रश्न जन्म ले सकता है कि यदि परिणाम मेरे प्रयास के अनुपात में नहीं हैं, तो में अपनी पूरी ऊर्जा क्यों लगाऊँ?

यहीं से एक प्रतिभाशाली व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी क्षमता से कम काम करने लगता है। नौकरी वहीं रहती है. वेतन वही रहता है, पद वही रहता है। केवल मन बदल जाता है।

यह प्रश्न शोध के क्षेत्र में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत में प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की कमी नहीं है। फिर भी विश्वस्तरीय शोध और नोबेल पुरस्कार जैसी असाधारण उपलब्धियाँ भारत से अपेक्षाकृत कम क्यों निकलती हैं? इसका उत्तर केवल शोध बजट, प्रयोगशालाओं या उपकरणों में तलाशना पर्याप्त नहीं होगा। ऐसी उपलब्धियों के पीछे वर्षों की जिज्ञासा, स्वतंत्र सोच, असफलताओं के बावजूद निरंतर प्रयास और अपने काम के प्रति असाधारण जुनून होता है।

यदि किसी प्रतिभाशाली वैज्ञानिक की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा अनावश्यक प्रशासनिक प्रक्रियाओं, लगातार संस्थागत तनाव, स्वायत्तता की कमी या अपने काम के मूल्य को लेकर निराशा में खर्च हो जाए, तो उसकी वैज्ञानिक क्षमता का पूरा उपयोग कैसे होगा? यह कहना उचित नहीं होगा कि नोबेल पुरस्कार न मिलने का एकमात्र कारण संस्थागत संस्कृति है, लेकिन यह प्रश्न अवश्य पूछा जाना चाहिए कि क्या हमारी शोध व्यवस्था प्रतिभा को असाधारण उपलब्धियों तक पहुँचने के लिए आवश्यक मानसिक और संस्थागत वातावरण दे रही है |

किसी संस्थान के लिए सबसे चिंताजनक स्थिति तब आती है जब व्यक्ति यह कहना शुरू कर दे, "अब मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।" शिकायत करने वाला व्यक्ति अभी भी उम्मीद रखता है। वह चाहता है कि चीजें सुधरें। लेकिन उदासीन व्यक्ति ने भीतर से प्रयास करना छोड़ दिया होता है। वह उपस्थित है, लेकिन मानसिक रूप से जुड़ा हुआ नहीं। वह काम कर रहा है, लेकिन अपनी पूरी क्षमता से नहीं।

भारत में प्रतिभा के विदेश जाने की चर्चा लंबे समय से होती रही है। लेकिन अब चर्चा को व्यापक बनाने की आवश्यकता है। किसी प्रतिभाशाली व्यक्ति का देश में रहना ही पर्याप्त नहीं है। उसका नोकरी में बने रहना भी पर्याप्त नहीं है। वास्तविक प्रतिभा संरक्षण तब है जब व्यक्ति वर्षों बाद भी उसी जिज्ञासा, ऊर्जा और प्रतिबद्धता के साथ काम करे, जिसके साथ उसने अपने करियर की शुरुआत की थी।

हमें ऐसे संस्थान बनाने होंगे जहाँ लोग केवल नौकरी करने के लिए नहीं, कुछ सार्थक करने के लिए काम करें। जहाँ शिक्षक को लगे कि उसका पढ़ाना महत्वपूर्ण है, वैज्ञानिक को लगे कि उसका शोध मायने रखता है, युवा शोधकर्ता को लगे कि उसके विचार सुने जा सकते हैं और अच्छे काम की पहचान होती है। जहाँ असहमति को विद्रोह न माना जाए और सवाल पूछने वाले व्यक्ति को समस्या नहीं, समाधान का हिस्सा समझा जाए।हमें संस्थान के व्यक्तियों को संक्रिय और उत्साहित बनाए रखने की आवश्यकता है। विकसित भारत का निर्माण केवल प्रतिभाशाली लोगों से नहीं होगा। वह ऐसे संस्थानों से होगा जहाँ प्रतिभाशाली लोग अपने काम में अर्थ, सम्मान, स्वतंत्रता और उद्देश्य महसूस करें और अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए भीतर से उत्साहित हों।