बालाघाट: किसानों को आधुनिक, टिकाऊ और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों से जोड़ने के संकल्प के साथ बालाघाट जिले में 'खेत बचाव अभियान' के अंतर्गत व्यापक जागरूकता गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। इसी कड़ी में, खैरलांजी विकासखंड के ग्राम मोवाड़ में 15 जून को एक विशेष जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य खरीफ सीजन की तैयारियों को और अधिक प्रभावी बनाना तथा किसानों को कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त करने के लिए प्रेरित करना था।

डीएसआर (DSR) तकनीक: धान की खेती में एक क्रांतिकारी बदलाव

कार्यक्रम में कृषि विभाग के अधिकारियों एवं विशेषज्ञों ने किसानों को धान की खेती की पारंपरिक रोपा विधि से हटकर डीएसआर (डायरेक्ट सीडेड राइस) पद्धति अपनाने का सुझाव दिया। विशेषज्ञों ने बताया कि धान की सीधी बुवाई की यह तकनीक वर्तमान समय की मांग है।

डीएसआर तकनीक के प्रमुख लाभ:

  • संसाधनों की बचत: इस पद्धति से धान की खेती करने पर पानी की भारी बचत होती है, जो जल संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  • कम लागत और श्रम: नर्सरी तैयार करने और पौध की रोपाई करने में होने वाले खर्च तथा शारीरिक श्रम में उल्लेखनीय कमी आती है।

  • समय का सदुपयोग: रोपाई के झंझट से मुक्ति मिलने के कारण किसान समय पर बुवाई कर पाते हैं, जिससे फसल का प्रबंधन आसान हो जाता है।

कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को बीज चयन से लेकर बीजोपचार तक की वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के बारे में बारीकी से समझाया, ताकि प्रति एकड़ पैदावार को अधिकतम किया जा सके।

दलहनी फसलों का महत्व और अरहर की वैज्ञानिक खेती

'खेत बचाव अभियान' के दौरान अरहर को एक महत्वपूर्ण आय बढ़ाने वाली फसल के रूप में रेखांकित किया गया। विशेषज्ञों ने किसानों को बताया कि धान के साथ-साथ दलहनी फसलों का समावेश करना 'फसल विविधीकरण' की दिशा में एक बेहतरीन कदम है।

अरहर की खेती के लिए महत्वपूर्ण सुझाव:

  1. उन्नत किस्मों का चुनाव: अधिक पैदावार देने वाली और रोग प्रतिरोधी उन्नत किस्मों का ही चयन करें।

  2. बीजोपचार: बुवाई से पूर्व बीजों का उपचार करने से मिट्टी से होने वाले रोगों से फसल की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।

  3. संतुलित उर्वरक प्रबंधन: अरहर की खेती न केवल मिट्टी की उर्वरक शक्ति (नाइट्रोजन स्थिरीकरण द्वारा) को बढ़ाती है, बल्कि किसानों को बाजार में बेहतर मूल्य भी प्रदान करती है।

  4. कीट एवं रोग प्रबंधन: समय पर निगरानी और विशेषज्ञों की सलाह से रसायनों का उपयोग कम किया जा सकता है।

मृदा स्वास्थ्य और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण

कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा 'मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन' पर केंद्रित रहा। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि "स्वस्थ मिट्टी ही संपन्न किसान की कुंजी है।" किसानों को सलाह दी गई कि वे अंधाधुंध उर्वरकों का प्रयोग न करें।

  • मृदा परीक्षण (Soil Testing): अपने खेतों की मिट्टी की जांच अनिवार्य रूप से करवाएं और रिपोर्ट के अनुसार ही पोषक तत्वों का प्रयोग करें।

  • जैविक और प्राकृतिक खेती: विभाग द्वारा किसानों को रसायनों के प्रभाव को कम करने के लिए जैविक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। संतुलित पोषण प्रबंधन से न केवल उत्पादन लागत कम होती है, बल्कि फसल की गुणवत्ता में भी सुधार होता है।

खेत बचाव अभियान: आत्मनिर्भर किसान की ओर अग्रसर

खेत बचाव अभियान के माध्यम से किसानों को जल संरक्षण की विभिन्न तकनीकों, आधुनिक कृषि यंत्रीकरण और फसल चक्र अपनाने के लाभों के बारे में जानकारी दी गई। कार्यक्रम के दौरान कृषि विशेषज्ञों ने उपस्थित किसानों के साथ संवाद किया और उनकी खेती से संबंधित समस्याओं एवं जिज्ञासाओं का समाधान किया।

कृषि विभाग ने सभी किसानों से अपील की है कि वे विभाग द्वारा संचालित प्रशिक्षण कार्यक्रमों का लाभ उठाएं। बालाघाट जिले के ग्राम मोवाड़ में आयोजित यह कार्यक्रम इस बात का प्रमाण है कि यदि सही तकनीक और सही मार्गदर्शन मिल जाए, तो किसान अपनी कृषि को न केवल सुरक्षित बना सकते हैं, बल्कि उसे लाभ का धंधा भी बना सकते हैं।

इस पहल से न केवल किसानों के आत्मविश्वास में वृद्धि हुई है, बल्कि उन्हें खरीफ सीजन के लिए एक स्पष्ट दिशा-निर्देश भी प्राप्त हुआ है। आने वाले समय में, इस प्रकार के जमीनी कार्यक्रम बालाघाट जिले की कृषि समृद्धि में एक मील का पत्थर साबित होंगे।

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