बालाघाट: खरीफ सीजन के दौरान कृषि क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देने और किसानों की आय दोगुनी करने के उद्देश्य से बालाघाट जिला प्रशासन और कृषि विभाग पूरी तरह सक्रिय है। इसी कड़ी में लालबर्रा विकासखंड के ग्राम नेवरगांव (वा) में एक सराहनीय कार्य का प्रदर्शन किया गया, जहाँ 12 एकड़ भूमि पर डीएसआर (डायरेक्ट सीडेड राइस) पद्धति से धान की बुवाई की गई। यह कार्यक्रम न केवल तकनीक के प्रति जागरूकता लाने वाला था, बल्कि किसानों को भविष्य की आधुनिक खेती के लिए तैयार करने का एक सशक्त माध्यम भी बना।

डीएसआर तकनीक: आधुनिक खेती का नया आधार

कृषि विभाग के अधिकारियों ने ग्राम नेवरगांव में कृषक श्री अरुण रहांगडाले एवं श्री राजेश रहांगडाले के खेतों को चयन कर वहां सुपर सीडर मशीन की सहायता से डीएसआर पद्धति का जीवंत प्रदर्शन किया। यह तकनीक पारंपरिक रोपा विधि के मुकाबले अत्यधिक प्रभावी है।

डीएसआर तकनीक के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं:

  • लागत में कमी: पारंपरिक विधि में पौध तैयार करने, उसे उखाड़ने और फिर रोपाई करने में जो भारी खर्च होता है, वह डीएसआर पद्धति में पूरी तरह समाप्त हो जाता है।

  • श्रम की बचत: इसमें नर्सरी प्रबंधन की आवश्यकता नहीं होती, जिससे किसानों को मजदूरी पर होने वाला अतिरिक्त खर्च नहीं करना पड़ता।

  • पानी का समुचित प्रबंधन: डीएसआर विधि धान की खेती के लिए जल संरक्षण में मदद करती है, जो वर्तमान जल संकट के दौर में अत्यंत आवश्यक है।

  • समय की बचत: पौध रोपण के झंझट से मुक्ति मिलने के कारण किसान समय पर बुवाई कर पाते हैं, जिसका सीधा असर फसल की गुणवत्ता और उत्पादन पर पड़ता है।

कृषि विभाग द्वारा बीज वितरण और योजनाओं का पंजीयन

इस जागरूकता कार्यक्रम के दौरान विभाग द्वारा केवल तकनीकी जानकारी ही नहीं दी गई, बल्कि किसानों को प्रत्यक्ष रूप से संसाधन भी उपलब्ध कराए गए। कृषि विभाग ने दलहनी और अन्य फसलों को बढ़ावा देने के लिए उन्नत बीज वितरित किए:

  1. श्री हेमराज पारधी: इन्हें मक्का एवं अरहर के उन्नत बीज प्रदान किए गए।

  2. डॉ. रुपेंद्र रहांगडाले: इन्हें अरहर का उच्च गुणवत्ता वाला बीज वितरित किया गया।

विभागीय अधिकारियों ने जोर देकर कहा कि किसान केवल धान पर निर्भर न रहें, बल्कि 'फसल विविधीकरण' (Crop Diversification) को अपनाएं। दलहनी फसलों की बुवाई से न केवल मिट्टी की उर्वरक शक्ति बढ़ती है, बल्कि किसानों को अतिरिक्त आर्थिक लाभ भी प्राप्त होता है।

इसके साथ ही, कार्यक्रम में मौजूद सभी किसानों का विभिन्न शासकीय योजनाओं के अंतर्गत पंजीयन भी किया गया। इसमें कृषि यंत्रीकरण, प्राकृतिक खेती, अनुदान आधारित बीज वितरण और अन्य कल्याणकारी योजनाओं को शामिल किया गया है, ताकि योजनाओं का लाभ अंतिम छोर तक बैठे किसान तक समय पर पहुंच सके।

अधिकारियों का दृष्टिकोण और भविष्य की राह

बालाघाट जिले के उप संचालक कृषि, श्री फूलसिंह मालवीय ने इस पहल पर विस्तृत चर्चा करते हुए बताया कि विभाग का मुख्य लक्ष्य जिले के किसानों को वैज्ञानिक खेती की ओर ले जाना है। उन्होंने कहा कि बढ़ती जनसंख्या और घटते संसाधनों के बीच आधुनिक तकनीक ही एकमात्र विकल्प है।

श्री मालवीय ने आगे कहा, "हमारा उद्देश्य कृषि उत्पादन लागत को कम करना और प्रति एकड़ उपज में वृद्धि करना है। जब किसान डीएसआर तकनीक और उन्नत बीजों का तालमेल बिठाएंगे, तो निश्चित रूप से उनकी आय में बढ़ोतरी होगी। विभाग का पूरा प्रयास है कि हर किसान को इन योजनाओं की जानकारी हो और वे इनका लाभ उठाएं।"

किसानों में आधुनिकता के प्रति बढ़ती रुचि

कार्यक्रम में भाग लेने वाले ग्रामीणों ने जब सुपर सीडर मशीन के माध्यम से बुवाई का दृश्य देखा, तो उनमें इस नई तकनीक को लेकर विशेष उत्साह दिखा। किसानों ने अधिकारियों से बुवाई की गहराई, खाद के प्रबंधन और खरपतवार नियंत्रण से संबंधित गहन प्रश्न पूछे।

यह प्रदर्शन केवल 12 एकड़ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नेवरगांव और आसपास के क्षेत्रों के लिए एक रोल मॉडल के रूप में देखा जा रहा है। कृषि विभाग को विश्वास है कि आगामी वर्षों में बालाघाट जिले के अन्य विकासखंडों में भी इसी प्रकार की आधुनिक तकनीकों का प्रसार होगा।

यह संपूर्ण कार्यक्रम बालाघाट के कृषि परिदृश्य में एक सकारात्मक बदलाव का संकेत है। जहां एक ओर विभाग किसानों को डिजिटल और यांत्रिक सहायता दे रहा है, वहीं दूसरी ओर किसान भी अपनी परंपराओं के साथ आधुनिक विज्ञान को अपनाने के लिए आगे आ रहे हैं। कृषि विभाग का यह समन्वित प्रयास निश्चित रूप से आने वाले समय में जिले की कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करेगा।

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