मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के प्रमुख पर्यटन स्थल और हिल स्टेशन कुकरू में कॉफी प्लांटेशन को एक बड़े आर्थिक और रोजगारपरक मिशन के रूप में विकसित करने की दिशा में जिला प्रशासन ने ठोस कदम उठाए हैं। बुधवार, 19 अगस्त 2026 को जिला कलेक्ट्रेट सभाकक्ष में कलेक्टर डॉ. सौरभ संजय सोनवणे की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में कृषि विज्ञान केंद्र (बैतूल बाजार), उद्यानिकी विभाग, आरईएस, नाबार्ड और पीएचई विभाग के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। इस चर्चा का मुख्य उद्देश्य कुकरू क्षेत्र में कॉफी की खेती को तकनीकी रूप से सक्षम बनाना और इसे स्थानीय किसानों के लिए आय का मुख्य स्रोत बनाना है। कलेक्टर डॉ. सोनवणे ने स्पष्ट किया कि जिले की प्राकृतिक संपदा का दोहन सही दिशा में किया जाए तो बैतूल न केवल पर्यटन, बल्कि कृषि उत्पादकता में भी नए आयाम स्थापित कर सकता है।
कुकरू में कॉफी उत्पादन की संभावनाओं पर मंथन और भौगोलिक अनुकूलता
बैठक के दौरान कलेक्टर डॉ. सोनवणे ने कुकरू की भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों को कॉफी उत्पादन के लिए अत्यंत उपयुक्त बताया। उन्होंने कहा कि कुकरू का पठारी इलाका और वहां की विशिष्ट जलवायु अरेबिका और रोबेस्टा कॉफी की पैदावार के लिए एक 'हॉटस्पॉट' के रूप में विकसित हो सकता है। चर्चा के दौरान निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं पर विस्तार से कार्ययोजना तैयार की गई:
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जल प्रबंधन और सिंचाई का सुदृढ़ीकरण: कॉफी की फसल को साल भर नियमित नमी की आवश्यकता होती है। कलेक्टर ने आरईएस, नाबार्ड और पीएचई विभाग को एक एकीकृत 'जल सुरक्षा कार्ययोजना' तैयार करने के सख्त निर्देश दिए हैं। इसमें वाटरशेड विकास, चेक डैम का निर्माण और पुरानी जल संरचनाओं का जीर्णोद्धार शामिल है। उनका मानना है कि जब तक पानी की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं होगी, कॉफी प्लांटेशन का लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता।
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क्षेत्र का व्यापक विस्तार और वैज्ञानिक सर्वे: वर्तमान में निर्धारित कॉफी उत्पादन क्षेत्रों के अलावा, प्रशासन ने अन्य संभावित भौगोलिक क्षेत्रों का भी चिन्हांकन करने को कहा है। इसके लिए नाबार्ड को पूरे क्षेत्र का विस्तृत सर्वे करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। यह सर्वे मिट्टी की उर्वरता, ढलान की स्थिति और धूप की दिशा के आधार पर किया जाएगा, ताकि पौधों का विकास अधिकतम हो सके।
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कॉफी की उन्नत किस्में: बैठक में विशेष रूप से 'रोबेस्टा' (Robusta) और 'अरेबिका' (Arabica) किस्मों पर चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने इन किस्मों के लिए कुकरू की मिट्टी और वहां के तापमान को अनुकूल बताया है। इन किस्मों के चयन से भविष्य में वैश्विक बाजार में भी बैतूल की कॉफी को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिल सकता है।
किसानों की आय का नया स्रोत और रोजगार सृजन की कार्ययोजना
कलेक्टर डॉ. सोनवणे ने बैठक में जोर देते हुए कहा कि कॉफी उत्पादन का सीधा लाभ स्थानीय किसानों को मिलना चाहिए। यह केवल सरकारी प्रोजेक्ट न होकर, किसान केंद्रित पहल होनी चाहिए। इस दिशा में प्रशासन ने निम्नलिखित लक्ष्य निर्धारित किए हैं:
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कृषक उत्पादक संगठनों (FPO) का गठन: कॉफी उत्पादन को व्यवस्थित, संगठित और लाभदायक बनाने के लिए एफपीओ का गठन किया जाएगा। इससे छोटे किसानों को बाजार में अपनी उपज बेचने की बेहतर सौदेबाजी करने की शक्ति मिलेगी। FPO के जरिए बीजों की खरीद, खाद और उपकरणों की व्यवस्था साझा रूप से हो सकेगी।
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प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन: किसानों को केवल जमीन का आवंटन नहीं किया जाएगा, बल्कि उन्हें कॉफी रोपण से लेकर कटाई तक की आधुनिक तकनीक सिखाना अनिवार्य है। कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. तिवारी और उनकी टीम के माध्यम से उन्हें नियमित प्रशिक्षण सत्र, कार्यशालाएं और ऑन-फील्ड मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाएगा।
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स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर: कॉफी प्लांटेशन न केवल किसानों की सीधे आय में वृद्धि करेगा, बल्कि प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, ग्रेडिंग और मार्केटिंग के स्तर पर भी भारी रोजगार पैदा करेगा। क्षेत्र के युवाओं को प्रशिक्षण देकर प्रोसेसिंग यूनिट्स में जोड़ा जाएगा, जिससे स्थानीय पलायन रुकेगा।
कृषि के साथ अन्य नवाचारी प्रोजेक्ट्स: एक समग्र विकास दृष्टिकोण
कॉफी प्लांटेशन के साथ-साथ, कलेक्टर ने कुकरू क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए अन्य कृषि आधारित परियोजनाओं को भी तेजी से आगे बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। उनका मानना है कि एक ही क्षेत्र में विविध कृषि प्रोजेक्ट्स होने से जोखिम कम होता है और जमीन की उत्पादकता बढ़ती है:
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सोलर मॉडल का समावेश: सिंचाई के लिए बिजली की निर्भरता कम करने हेतु सोलर पंप और सोलर मॉडल पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। कुकरू जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में जहां बिजली की लाइनें बिछाना कठिन है, वहां सोलर ऊर्जा वरदान साबित हो सकती है।
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मिलेट्स उत्पादन पर जोर: कॉफी की पंक्तियों के बीच या निर्धारित अन्य क्षेत्रों में मोटे अनाजों (मिलेट्स) की खेती को प्रोत्साहन दिया जाएगा। मिलेट्स कम पानी में और पहाड़ी मिट्टी में भी बेहतर परिणाम देते हैं, जो स्थानीय किसानों के लिए एक सुरक्षित फसल विकल्प है।
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ड्रिप सिंचाई प्रणाली: जल की बचत के लिए कॉफी और अन्य फसलों में ड्रिप सिंचाई प्रणाली को अनिवार्य बनाने का प्रयास किया जाएगा। इससे बूंद-बूंद पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचेगा, जो उत्पादन क्षमता को दोगुना कर सकता है।
बैठक में उपस्थित विशेषज्ञों का तकनीकी योगदान
इस समीक्षा बैठक में कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. तिवारी, डॉ. इंगले, डॉ. बोहर पी, और उद्यानिकी विभाग से श्री आर के कोरी ने अपने तकनीकी सुझाव साझा किए। अधिकारियों ने कुकरू क्षेत्र में वर्तमान में उपलब्ध संसाधनों की समीक्षा की और भविष्य की चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि कुकरू में कॉफी के लिए मिट्टी का परीक्षण रिपोर्ट सकारात्मक है, बस सही प्रबंधन की आवश्यकता है।
निष्कर्ष और भविष्य की राह
बैतूल जिले के कुकरू हिल स्टेशन पर कॉफी उत्पादन की यह पहल कृषि क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। यदि यह प्रोजेक्ट अपनी पूरी क्षमता के साथ लागू होता है, तो बैतूल जिला आने वाले समय में मध्य प्रदेश के कॉफी मानचित्र पर एक प्रमुख नाम के रूप में उभर सकता है। कलेक्टर डॉ. सोनवणे की दूरदर्शी सोच और विभागवार एकीकृत कार्ययोजना का उद्देश्य स्पष्ट है—स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर किसानों की समृद्धि सुनिश्चित करना और पर्यटन के साथ कृषि को जोड़कर एक नया 'एग्रो-टूरिज्म' मॉडल विकसित करना।
प्रशासन अब नाबार्ड द्वारा किए जाने वाले सर्वे और एफपीओ के गठन की प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, जिससे आगामी खरीफ और रबी सीजन के दौरान कॉफी प्लांटेशन का कार्य धरातल पर दिखाई दे सके। इस मिशन की सफलता न केवल कृषि विभाग के लिए बल्कि पूरे बैतूल जिले के लिए एक उपलब्धि होगी, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए स्थायी आजीविका का मार्ग प्रशस्त करेगी। प्रशासन की मंशा है कि कुकरू की पहचान केवल एक खूबसूरत हिल स्टेशन के तौर पर न रहे, बल्कि वह 'कॉफी उत्पादन के केंद्र' के रूप में भी विश्व प्रसिद्ध हो।
image source: https://betul.mpinfo.org
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