आमला। आमला सिविल अस्पताल में महिला सर्जन डॉ. आस्था सोलंकी की पदस्थापना के समय फोटो खिंचवाने, गुलदस्ता भेंट करने और सोशल मीडिया पर खुद को उनकी नियुक्ति का श्रेय देने वाले कई स्थानीय नेता, स्वयंभू समाजसेवी और व्यापारिक चेहरे अब पूरी तरह खामोश नजर आ रहे हैं। जिस नियुक्ति को अपनी उपलब्धि बताकर प्रचारित किया गया, उसी चिकित्सक के कुछ ही महीनों बाद हुए तबादले पर किसी ने सार्वजनिक रूप से विरोध दर्ज कराना भी जरूरी नहीं समझा।
*नियुक्ति का श्रेय लिया, तबादले पर क्यों चुप्पी?*
शहर में अब यह सवाल उठ रहा है कि यदि डॉक्टर की नियुक्ति वास्तव में इन्हीं लोगों के प्रयासों से हुई थी, तो उनके स्थानांतरण को रोकने या उसे निरस्त कराने के लिए कोई पहल क्यों नहीं की गई? क्या जनहित केवल फोटो सेशन और सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित था, या फिर जनता के नाम पर सिर्फ श्रेय लेने की राजनीति की गई?
*गुलदस्ता संस्कृति में दब गए जनहित के मुद्दे-
नगर की राजनीति में अब स्वागत-सम्मान, गुलदस्ता और फोटोबाजी की संस्कृति हावी होती दिखाई दे रही है। अस्पतालों, सड़कों, पानी और अन्य मूलभूत सुविधाओं जैसे गंभीर मुद्दों की बजाय प्रचार और व्यक्तिगत छवि निर्माण को अधिक महत्व दिया जा रहा है। आम नागरिक समस्याओं से जूझता रहता है, जबकि जनप्रतिनिधियों के बीच श्रेय लेने की होड़ जारी रहती है।
*भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे अधिकारी बने हुए हैं, जरूरी डॉक्टर चली गईं*
विडंबना यह भी है कि जिन अधिकारियों पर लंबे समय से भ्रष्टाचार और लापरवाही के आरोप लगते रहे हैं, वे आज भी अपने पदों पर बने हुए हैं। वहीं दूसरी ओर अस्पताल की एक आवश्यक महिला चिकित्सक का स्थानांतरण हो जाता है और इसे रोकने के लिए जनप्रतिनिधियों की ओर से कोई ठोस पहल सामने नहीं आती। इससे यह सवाल भी उठता है कि आखिर जनता की प्राथमिकताएं किसकी जिम्मेदारी हैं।
*सत्ता और विपक्ष दोनों पर उठे सवाल*
नगर के जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। सत्ता पक्ष पर जनहित से अधिक राजनीतिक समीकरण और व्यक्तिगत छवि को प्राथमिकता देने के आरोप लग रहे हैं। वहीं विपक्ष भी स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर प्रभावी जनआंदोलन या दबाव बनाने में सफल नहीं दिख रहा है।
*जनता पूछ रही है जवाब*
महिला सर्जन का स्थानांतरण केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि आमला की श्रेय आधारित राजनीति और जनप्रतिनिधियों की सक्रियता की भी परीक्षा बन गया है। अब जनता जानना चाहती है कि जो लोग नियुक्ति के समय सबसे आगे थे, वे आज इस महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सुविधा को बचाने के लिए आखिर क्यों मौन हैं? यदि जनहित सर्वोपरि है, तो इस चुप्पी का जवाब भी जनता को मिलना चाहिए।

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