विदिशा। कृषि प्रधान देश भारत में जब आधुनिक तकनीक का मेल सरकारी योजनाओं के साथ होता है, तो परिणाम बेहद सुखद होते हैं। विदिशा जिले के विकासखंड विदिशा के अंतर्गत आने वाले ग्राम निटरी के निवासी कृषक श्री राजकुमार किरार ने इसी आधुनिक सोच को अपनाकर न केवल अपनी आय में वृद्धि की है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। आज वे विदिशा जिले के अन्य किसानों के लिए एक प्रेरणास्रोत बनकर उभरे हैं।

शासकीय सहयोग से आधुनिकता का सफर

श्री राजकुमार किरार ने कृषि विभाग द्वारा संचालित फसल अवशेष प्रबंधन योजनाओं की जानकारी प्राप्त की और उसका लाभ उठाने का निर्णय लिया। विभाग की ओर से उन्हें स्ट्रॉ रीपर मशीन क्रय करने के लिए 1 लाख 20 हजार रुपये का अनुदान प्राप्त हुआ। यह वित्तीय सहायता उनके लिए एक बड़ा संबल साबित हुई। इस मशीन के आने से खेती करने का उनका तरीका पूरी तरह बदल गया और वे पारंपरिक खेती से हटकर आधुनिक और लाभकारी खेती की ओर अग्रसर हुए।

नरवाई का वैज्ञानिक प्रबंधन: आय का नया जरिया

आम तौर पर गेहूँ की कटाई के बाद किसान फसल के अवशेष यानी 'नरवाई' को जला देते हैं, जो न केवल पर्यावरण के लिए हानिकारक है, बल्कि मिट्टी की उर्वरक शक्ति को भी नष्ट कर देता है। श्री राजकुमार किरार ने इस चुनौती को अवसर में बदला। हार्वेस्टर से गेहूँ की कटाई के बाद खेत में बची नरवाई को उन्होंने स्ट्रॉ रीपर मशीन की सहायता से भूसे में परिवर्तित करना शुरू किया।

उनकी इस पहल के दोहरे लाभ हुए:

  1. अतिरिक्त आय का स्रोत: उन्होंने न केवल अपने खेतों में इस मशीन का उपयोग किया, बल्कि आस-पास के गांवों के किसानों के खेतों में भी किराए पर भूसा बनाने का कार्य प्रारंभ किया। इससे उन्हें खेती के अलावा अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होने लगी।

  2. पशुपालन में सहायक: तैयार किए गए भूसे का भंडारण गांव में ही किया जा रहा है, जिससे क्षेत्र के पशुपालकों को उचित मूल्य पर चारा आसानी से उपलब्ध हो रहा है।

पर्यावरण संरक्षण और मिट्टी की उर्वरता

नरवाई जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण और मिट्टी के सूक्ष्म जीवाणुओं के नष्ट होने की समस्या को लेकर श्री किरार का कार्य अत्यंत सराहनीय है। स्ट्रॉ रीपर मशीन के उपयोग से नरवाई को जलाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। इससे पर्यावरण प्रदूषण में कमी आई है और मिट्टी की जैविक संरचना और उर्वरता सुरक्षित बनी हुई है। कृषि विभाग के अधिकारियों का मानना है कि श्री किरार का मॉडल अन्य किसानों के लिए एक ब्लूप्रिंट की तरह है, जिसे अपनाकर पर्यावरण और किसान दोनों का भला हो सकता है।

किसानों के लिए प्रेरणा और संदेश

श्री राजकुमार किरार का जीवन स्तर आज सकारात्मक रूप से परिवर्तित हो चुका है। उनका मानना है कि सरकार द्वारा दी जाने वाली योजनाओं का यदि सही दिशा में और सही समय पर उपयोग किया जाए, तो खेती घाटे का नहीं, बल्कि मुनाफे का व्यवसाय बन सकती है। उन्होंने कहा कि स्ट्रॉ रीपर मशीन उनके लिए वरदान साबित हुई है। उनके इस प्रयास ने गांव के अन्य युवाओं और किसानों को भी प्रेरित किया है कि वे कृषि अवशेषों को कचरा न समझें, बल्कि उन्हें संसाधन के रूप में देखें।

विभाग की भूमिका और भविष्य की राह

कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि फसल अवशेष प्रबंधन हेतु संचालित योजनाओं का मूल ध्येय किसानों को नरवाई जलाने की कुप्रथा से दूर करना है। श्री राजकुमार किरार की सफलता इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि तकनीकी हस्तक्षेप से कृषि अवशेषों का उपयोग एक बहुमूल्य संसाधन के रूप में किया जा सकता है। विभाग द्वारा ऐसे किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है ताकि विदिशा जिला कृषि क्षेत्र में न केवल उत्पादन के मामले में, बल्कि प्रबंधन और आधुनिकता के मामले में भी अग्रणी रहे।

निश्चित रूप से, राजकुमार किरार की यह सफलता की कहानी उन तमाम किसानों के लिए एक आईना है, जो परंपरागत तौर-तरीकों से जूझ रहे हैं। यह साबित करता है कि संकल्प शक्ति और उचित तकनीकी मार्गदर्शन के साथ कोई भी किसान अपनी प्रगति की कहानी स्वयं लिख सकता है। विदिशा की मिट्टी से निकली यह सफलता की गाथा आने वाले समय में जिले के कृषि परिदृश्य में बड़ा बदलाव लाएगी।

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