मध्य प्रदेश सरकार द्वारा पथरिया नगरीय क्षेत्र में वर्ष 2014 में स्वच्छ एवं पेयजल पानी घर-घर पहुंचने के उद्देश्य से 21 करोड़ 95 लख रुपए की लागत से फिल्टर प्लांट शुद्धिकरण लैब बिना लैब टेक्नीशियन के नगर के 15 वार्डों में संचालित की जा रही है,जिसमें करीब 4 हजार नल कनेक्शन धारी जुड़े हुए है फिल्टर प्लांट में कैल्शियम गैस मशीन लंबे समय से बंद पड़ी है और जल शुद्धिकरण सिर्फ फिटकरी व ब्लीचिंग पाउडर के भरोसे किया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि बिना किसी वैज्ञानिक जांच और लैब मॉनिटरिंग के प्रतिदिन करीब 8 लाख लीटर पानी नगर में सप्लाई किया जा रहा है, जिससे नलों के माध्यम से दूषित व गंदा पानी लोगों के घरों तक पहुंच रहा है। इस लापरवाही से नागरिकों की सेहत के साथ खुला खिलवाड़ किया जा रहा है।
बिना लैब टेक्नीशियन के चल रही करोड़ों की पेयजल लैब
पथरिया नगर परिषद क्षेत्र में पेयजल व्यवस्था को लेकर गंभीर लापरवाही सामने आई है। करोड़ों रुपये की लागत से बने फिल्टर प्लांट की लैब वर्षों से बिना लैब टेक्नीशियन के ही संचालित की जा रही है, फिल्टर प्लांट में पेयजल की गुणवत्ता की नियमित मॉनिटरिंग के लिए अत्याधुनिक लैब तो बनाई गई, लेकिन हैरानी की बात यह है कि वर्षों से वहां लैब टेक्नीशियन की नियुक्ति ही नहीं की गई। नियमों के अनुसार फिल्टर प्लांट की लैब में प्रशिक्षित लैब टेक्नीशियन का होना अनिवार्य है, जो समय-समय पर पानी की जांच कर उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करे, आवश्यक मापदंडों का पालन कराए और प्लांट की साफ-सफाई व तकनीकी प्रक्रियाओं की निगरानी करे। लेकिन पथरिया नगर परिषद के अंतर्गत संचालित फिल्टर प्लांट में यह जिम्मेदारी साधारण कर्मचारियों के भरोसे छोड़ दी गई है।
क्लोरीन गैस मशीन बंद, फिटकरी-ब्लीचिंग के भरोसे जल शुद्धिकरण
फिल्टर प्लांट में पेयजल शुद्धिकरण व्यवस्था की एक और बड़ी लापरवाही सामने आई है। जानकारी के अनुसार फिल्टर प्लांट में लगी क्लोरीन गैस की मशीन लंबे समय से बंद पड़ी है, जबकि यही मशीन पानी को बैक्टीरिया-मुक्त और सुरक्षित बनाने का मुख्य साधन होती है।मशीन बंद होने के बाद भी पानी की सप्लाई निर्बाध जारी है। वर्तमान में जल शुद्धिकरण का पूरा दारोमदार केवल फिटकरी और ब्लीचिंग पाउडर पर छोड़ दिया गया है, जो निर्धारित मानकों के अनुसार पर्याप्त और सुरक्षित विकल्प नहीं माने जाते। विशेषज्ञों के मुताबिक बिना क्लोरीनेशन के पानी में हानिकारक जीवाणु पनपने का खतरा बना रहता है, जिससे डायरिया, पीलिया सहित अन्य जलजनित बीमारियां फैल सकती हैं।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2014 में तत्कालीन नगर परिषद अध्यक्ष लक्ष्मण सिंह ठाकुर द्वारा 21 करोड़ 95 लाख रुपये की भारी लागत से इस फिल्टर प्लांट का निर्माण किया गया था। इसके अंतर्गत करीब 4 हजार नल कनेक्शन धारक आते हैं। पानी को शुद्ध एवं पेयजल बनाने के लिए करीब 13 किलो बिलीचिग पाउडर एवं 13 किलो फटकारी का उपयोग कर फिल्टर प्लांट से प्रतिदिन लगभग साढ़े 8 लाख लीटर पानी टंकियों तक पहुंचाया जाता है, जहां से नगर में सप्लाई की जाती है।
स्थायीय का आरोप
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कई बार नलों से गंदा और बदबूदार पानी आता है, तो कई बार पानी में मैल दिखाई देता है। ऐसे में यह पानी पीने योग्य नहीं रह जाता। मजबूरी में लोग दूसरे स्रोतों से पीने का पानी इस्तेमाल कर रहे हैं। नगरवासियों में इस बात को लेकर भय बना रहता है कि इस दूषित पानी के सेवन से गंभीर बीमारियां फैल सकती हैं, इसी कारण अधिकांश लोग इस पानी का उपयोग केवल अन्य कार्यों के लिए करते हैं, पीने से परहेज करते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब करोड़ों की लागत से फिल्टर प्लांट और लैब बनाई गई, तो फिर लैब टेक्नीशियन की नियुक्ति क्यों नहीं की गई और बंद पड़ी मशीनों की मरम्मत क्यों नहीं कराई गई? यह लापरवाही सीधे तौर पर आम जनता की सेहत से खिलवाड़ है।
अब देखना होगा कि नगर परिषद और संबंधित विभाग इस गंभीर मुद्दे पर कब संज्ञान लेते हैं और कब जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई कर नागरिकों को शुद्ध व सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जाता है।
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