यह कोई साधारण खबर नहीं है। यह उस व्यवस्था की चीत्कार है, जहां 44,605 करोड़ रुपये की 'केन-बेतवा लिंक परियोजना' के नाम पर गरीबों को उनके ही घरों से खदेड़ दिया गया। यह उस सत्ता का रवैया है, जिसने हक मांगने पर किसानों, महिलाओं और बुजुर्गों को आधी रात के समय धरना स्थल से हटा दिया। इस लेख को पढ़ते हुए अपने जमीर से सिर्फ एक सवाल पूछिएगा कि जिस विकास की नींव गरीबों के आशियाने उजाड़कर रखी जा रही हो, क्या वो न्याय है?
देश भर में बारिश का मौसम आते ही लोग अपने घरों में दुबक जाते हैं। लेकिन सोचिए उस खौफनाक मंजर के बारे में, जब आसमान से मूसलाधार बारिश हो रही हो और ठीक उसी वक्त आपके आंगन में सरकारी बुलडोजर गरजने लगें। केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के नाम पर इन आदिवासियों की पुश्तैनी जमीनें अधिग्रहित कर ली गईं। नियम कहते हैं कि विस्थापन से पहले पुनर्वास होना चाहिए, उन्हें नई जगह और बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए।
लेकिन हकीकत में क्या हुआ? बिना किसी पूर्व सूचना के, बिना कोई वैकल्पिक व्यवस्था किए, बारिश के इस खौफनाक मौसम में 5000 से ज्यादा लोगों के घरों और कुंओं को जमींदोज कर दिया गया। एक पल में उनके बच्चे, उनकी बुजुर्ग माताएं और उनके मवेशी खुले आसमान के नीचे आ गए। जिनके पास रहने को दूसरी कोई जगह नहीं थी, जिनकी पीढ़ियों की जड़ें उस मिट्टी से जुड़ी थीं, उन्हें एक झटके में बेघर कर दिया गया। जो लोग अपने वातानुकूलित कमरों में बैठकर इस 'ऐतिहासिक' नदी-जोड़ो परियोजना का जश्न मना रहे हैं, क्या उन्हें इन 5000 उजड़े हुए परिवारों की चीखें सुनाई नहीं देतीं?
आखिर इन ग्रामीणों का घर क्यों छीना गया? क्योंकि वे गरीब हैं? क्योंकि वे आदिवासी हैं? आंदोलनकारियों की आंखों में झांककर देखिए, वहां सिर्फ बेबसी नहीं, बल्कि लूटे जाने का भारी आक्रोश है।
किसानों का स्पष्ट आरोप है कि मुआवजे के नाम पर अधिकारियों ने 400 करोड़ रुपये का महाघोटाला किया है। यह कोई छोटी-मोटी रकम नहीं है। यह उन गरीबों के खून-पसीने की कमाई का मुआवजा था। लेकिन विडंबना देखिए जिन अपात्र लोगों का उस इलाके में कोई वजूद तक नहीं है, जिनके वहां कोई मकान नहीं थे, उन्हें अफसरों की मिलीभगत से करोड़ों रुपये का मुआवजा दे दिया गया। और जिनका सब कुछ लुट गया, जिनकी आजीविका पूरी तरह उसी जमीन पर निर्भर थी, उनके हाथों में सिर्फ मायूसी, दर-दर की ठोकरें और आंसू छोड़ दिए गए। क्या इसे आप एक सभ्य समाज कहेंगे? जहां असली हकदार को बेघर छोड़ दिया जाए और सिस्टम के दलाल तिजोरियां भर लें?
जब सब कुछ छिन गया, तो इन बेबस लोगों ने क्या किया? उन्होंने कोई दंगा नहीं किया, कोई पत्थर नहीं फेंके। उन्होंने गांधी के देश में शांतिपूर्ण जल सत्याग्रह का रास्ता चुना। कमर तक पानी में डूबकर, अपनी ही चिताओं पर लेटकर और महिलाओं ने अपने गले में फांसी के फंदे डालकर न्याय की गुहार लगाई। 'जय किसान संगठन' के नेता अमित भटनागर 10 दिनों तक आमरण अनशन पर बैठे रहे।
उन्हें लगा कि शायद सरकार पसीजेगी। शायद कोई नुमाइंदा आकर उनके आँसू पोंछेगा और उन्हें उनके उजड़े हुए घर का जवाब देगा। लेकिन इसके बाद पुलिस प्रशासन द्वारा आधी रात को कार्रवाई की गई।
जब पूरा देश सुकून की नींद सो रहा था, तब भारी पुलिस बल ने धरना स्थल को खाली करा लिया। अनशन कर रहे लोगों, महिलाओं और कांपते बुजुर्गों को वहां से हटा दिया गया। रातों-रात उनके तंबू हटा दिए गए ताकि विरोध का कोई नामोनिशान ही बाकी न रहे।
यह स्थिति सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है। खोजी रिपोर्टें बता रही हैं कि इस प्रोजेक्ट में पर्यावरण के नियमों की किस तरह अनदेखी की जा रही है।
फॉरेस्ट क्लीयरेंस की शर्तों को सरेआम किनारे कर दिया गया है। जिस पन्ना टाइगर रिजर्व के जंगलों में बेजुबान जानवर रहते हैं, उसके अति-संवेदनशील 'कोर एरिया' में 78 मेगावाट क्षमता का पावर प्लांट लगाने की गुपचुप तैयारी चल रही है, वह भी वन विभाग की सख्त मनाही के बावजूद! मुनाफे की चाह इतनी बड़ी हो गई है कि न तो आदिवासियों को उनका हक दिया जा रहा है और न ही बेजुबान वन्यजीवों को उनके जंगल। सब कुछ उजाड़ कर कैसा विकास लाना चाहती है यह व्यवस्था?
यह लेख महज कुछ हजार शब्दों की एक खबर नहीं है, यह उन आदिवासियों की आह है, जो शायद कभी दिल्ली या भोपाल के सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंच पाएगी। आज पुलिस ने भले ही छतरपुर के उस धरना स्थल को खाली करा लिया हो, लेकिन उन 5000 लोगों के सीने में जो आग धधक रही है, वह कैसे बुझेगी?
इस रिपोर्ट को पढ़ते हुए क्या आपको अंदर से यह महसूस नहीं होता कि हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां एक गरीब की जान और उसकी जमीन की कीमत कुछ भी नहीं है?
बुंदेलखंड की प्यास बुझनी चाहिए, यह देश की जरूरत है। लेकिन मेरे दोस्त, यह सवाल अपने आप से पूछना... कि क्या किसी एक की प्यास बुझाने के लिए हजारों लोगों के आँसुओं का घूंट पीना न्याय है? बारिश में लोगों के घर तोड़ देना, और जब वे रोते हुए जवाब मांगें तो उन्हें धरना स्थल से हटा देना क्या यह उस 'नए भारत' की तस्वीर है जिस पर हमें गर्व करना चाहिए?
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