सरदार सरोवर परियोजना के विस्थापित परिवार शासन की मूलभूत बिजली, सड़क, शिक्षा पेयजल जैसी सुविधाओं से दूर, सुविधाओं को लेकर किया गया वादा आज भी है अधूरा। किराए के टैंकरो से की जा रही पेयजल की पूर्ति पूरी।

 बड़वानी-दरअसल मध्यप्रदेश सरकार पुनर्वास स्थलों पर भूखंडों की रजिस्ट्री के लिए शिविर आयोजित जरूर कर रही हैं और उनके आवेदन भी ले रही है। लेकिन ऐसे में इन विस्थापितो को पानी जैसी मूलभूत बुनियादी सुविधाए मिलनी चाहिए थी लेकिन वह आज भी अपने जीवन व्यापन से कोसो दूर हैं। वही पेयजल संकट को लेकर न तो जनप्रतिनिधि ओर नही प्रशासन का ध्यान इस पेयजल समस्या की ओर केंद्रित हुँआ है जिसके चलते यह स्थिति आज भी इन डूब विस्थापितो के जल संकट के रूप में मंडरा रही है

 ऐसा हि एक मामला अंजड से सटे ग्राम छोटा बड़दा का सामने आया है। जहाँ एक ओर पेयजल जैसी समस्या के संकट से जूझ रहे उन डूब विस्थापितो के लिए पेयजल आसानी से मिलना किसी चुनौती से कम नही है। पेयजल जैसी संकट स्थिति सरदार सरोवर विस्थापितो की दर्द की पीड़ा खुद के मुंह जुबानी बयां हो रही हैं।

आईए क्या कहते है ग्रामीण।

*बुनियादी सुविधाओं के सपने दिखाकर लाए- जीवन व्यापन के संसाधनो की खल रही कमी*

वहीं स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्हें मूल गांव छोटा बड़दा से विस्थापित कर यहां लाया गया था, लेकिन ऐसे में उनके जीवनयापन के लिए आवश्यक संसाधनो की कमी आज भी अब भी नदारद हैं।

*पड़ोसी से पानी मांगकर करना पड़ता है गुजारा*
वृद्धा सुमन बाई ने बताया है कि विगत दो से तीन महीनों से यह पेयजल की गंभीर समस्या यथवात बनी हुई है। वही गृहस्थी जीवन चलाने के लिए रोजमर्रा कि तरह परिवार का एक व्यक्ति बाहर मजदूरी करता है, ऐसे में उन्हें पड़ोसियों से पानी मांगकर गुजारा करना पड़ रहा है।

*गंदे पानी को लेकर की थी शिकायत बाद में हटा दी गई है मोटर -किराए के टैंकर बुलाकर बुझाना पड़ रही है प्यास*
गाँव के बुजुर्ग मोतीलाल ने जानकारी दी कि पहले मोटर से पानी मिलता था, लेकिन गंदे पानी की शिकायत के चलते बाद में उस मोटर को हटा दी गई। लेकिन ऐसे में अब उन्हें पानी के लिए तीन से चार किलोमीटर दूर दराज का स्थान तय करना पड़ता है ओर वहाँ से पानी लाना पड़ रहा हैं।
वही पानी की पूर्ति को लेकर किराए के टैंकर भी मंगवाने पड़ते हैं जिसपर जेब का 300 से 400 रुपए अतिरिक्त शुल्क का भार बढ़ जाता है यानी यह जेब खर्च जिम्मेदारों की अनदेखी के चलते गरीब तपके मजदूरों की जेब से उठानी पड़ रही है।

*पानी की कमी से बेचना पड़ी भैस।*

वही पानी की किल्लत से जूझ रहे गाँव के महेश ने भी बताया कि पहले कुएं से उन्हें पानी मिल जाता था , लेकिन अब मोटर की केबल काट दी गई है। जिसके चलते ऐसे में उन्हें पानी की कमी के कारण अपनी भैंस तक बेचना पड़ी है।

*समस्याओं को लेकर किया गया अवगत नहीं हुई बुनियादी समस्याएं  दूर।*

दुर्गा बाई ने बताया कि उन्हें मजबूरी में 400 रुपए का निजी पानी का टैंकर खरीदना पड़ता है। लेकिन ग्रामीणों का सामूहिक रूप से कहना है कि उन्होंने अधिकारियों को कई बार इस समस्या से अवगत भी कराया गया है, लेकिन अभी तक कोई समस्या का समाधान नहीं निकला है। इस संबंध में एनवीडीए के इंजीनियर लोकेश सोलंकी से संपर्क किया तो जिसपर उन्होंने बताया कि क्षेत्र में एक ट्यूबवेल कराया गया है। उन्होंने आश्वासन दिया कि बड़ी मोटर लगाकर जलप्रदाय व्यवस्था में सुधार की कार्रवाई की जा रही है, जिससे पानी का संकट दूर होने की उम्मीद है।

हॉलाकि देखना अब यह हैं कि इन सरदार सरोवर परियोजना विस्थापित परिवार के लोगों की यह समस्या कब तक बनी रहेंगी और कब इन्हें शासन की बुनियादी सुविधाए मिल पाएगी  या फिर इसी तरह से यह परिवार पेयजल संकट जैसी सहित अन्य सुविधाओं से  जूझते रहेंगे ।