नरसिंहपुर/गोटेगाँव:-(मोहन सिंह राजपूत)-नरसिंहपुर की उपजाऊ धरती कभी अपनी हरियाली, मेहनतकश किसानों और भरपूर उत्पादन के लिए पहचानी जाती थी। यहाँ खेतों में उगती फसल केवल अन्न नहीं होती थी, बल्कि किसान के सपनों, परिवार की उम्मीदों और पूरे समाज की जीवनरेखा मानी जाती थी। लेकिन समय के साथ व्यवस्था का चेहरा ऐसा बदला कि खेत का मालिक कहलाने वाला किसान आज अपनी ही उपज बेचने के लिए मंडियों में घंटों नहीं, बल्कि कई-कई दिनों तक कतारों में खड़ा रहने को मजबूर है।

आज हालात यह हैं कि खरीदी केंद्रों पर किसान की पहचान एक सम्मानित अन्नदाता के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के रूप में होती है जिसे हर कदम पर अपनी ईमानदारी साबित करनी पड़ती है। नरसिंहपुर जिले में इन दिनों चल रही उपार्जन प्रक्रिया किसानों के लिए किसी उत्सव से कम और संघर्ष से अधिक दिखाई देती है। प्रशासन इसे “खरीदी व्यवस्था” कहता है, लेकिन किसान के लिए यह व्यवस्था कई बार अपमान, असहायता और मानसिक पीड़ा का पर्याय बन जाती है।

सुबह होते ही मंडियों और खरीदी केंद्रों के बाहर ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की लंबी कतारें दिखाई देती हैं। किसान रातभर खुले आसमान के नीचे जागकर अपनी बारी का इंतजार करता है। कोई ट्रॉली पर बैठा ऊंघ रहा होता है, तो कोई चिंता में आसमान की ओर देख रहा होता है कि कहीं मौसम खराब न हो जाए। खेत में महीनों की मेहनत के बाद तैयार हुई फसल अब सरकारी प्रक्रिया की कसौटी पर टिकी होती है।

खरीदी केंद्रों पर सबसे बड़ा हथियार बन चुका है—“नमी ज्यादा है”।

यह एक ऐसा वाक्य है जो किसान की छह महीने की मेहनत पर पलभर में पानी फेर देता है। किसान समझ नहीं पाता कि आखिर वह अपनी उपज को कितना सुखाए कि वह सरकारी मानकों पर खरी उतर सके। विडंबना यह है कि जिस देश में खुले आसमान के नीचे लाखों टन अनाज खराब हो जाता है, वहीं किसान से ऐसी गुणवत्ता की अपेक्षा की जाती है मानो वह किसी प्रयोगशाला में तैयार किया गया नमूना लेकर आया हो।

प्रशासनिक अमला कई बार किसान के साथ ऐसे व्यवहार करता दिखाई देता है जैसे वह कोई अपराधी हो। दानों की जांच, नमी की माप और दस्तावेजों की जांच के बीच किसान की असली समस्या कहीं पीछे छूट जाती है। किसान को लगता है कि उसकी मेहनत पर भरोसा करने के बजाय उस पर संदेह किया जा रहा है।

इस पूरी व्यवस्था का सबसे पीड़ादायक पक्ष यह है कि किसान धीरे-धीरे अपनी ही जमीन पर मालिक कम और मजदूर ज्यादा महसूस करने लगा है। कभी खेत उसका गर्व हुआ करते थे, आज वही किसान मंडियों में पर्चियों, स्लॉट और सर्वर की दया पर निर्भर दिखाई देता है। खरीदी केंद्रों पर सर्वर डाउन होना अब एक सामान्य घटना बन चुकी है। घंटों तक काम ठप रहता है, ऑपरेटर गायब हो जाते हैं और किसान अपनी ट्रॉली के पास बैठा केवल इंतजार करता रहता है।

समय पर तुलाई न होने का डर किसान के मन में लगातार बना रहता है। मौसम बिगड़ जाए तो फसल खराब होने का खतरा अलग। कई किसानों को अपनी उपज वापस ले जाने की नौबत तक आ जाती है। ऐसे में प्रशासन के लिए यह केवल एक “प्रक्रिया” हो सकती है, लेकिन किसान के लिए यह उसके पूरे परिवार के भविष्य का सवाल होता है।

इस स्थिति में जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में खड़ी दिखाई देती है। चुनावी मंचों पर किसानों के हितों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नेता खरीदी केंद्रों की अव्यवस्थाओं पर अक्सर मौन नजर आते हैं। किसान को यह चुप्पी सबसे ज्यादा कचोटती है। उसे लगता है कि वोट के समय जो नेता उसके घर तक पहुंचते थे, वही आज उसकी समस्याओं पर आंखें मूंदे बैठे हैं।

गाडरवारा से लेकर गोटेगांव तक की पूरी बेल्ट में किसान इस व्यवस्था की पीड़ा महसूस कर रहा है। जिस मिट्टी ने प्रदेश और देश को मिठास, अन्न और समृद्धि दी, उसी मिट्टी का असली मालिक आज व्यवस्था के बोझ तले दबता जा रहा है। खेतों में मेहनत करने वाला हाथ अब सरकारी पर्चियों और हस्ताक्षरों के लिए अधिकारियों के सामने झुकने को मजबूर है।

यह केवल प्रशासनिक अव्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि उस सोच का संकट है जिसमें किसान को सम्मान से ज्यादा प्रक्रिया का हिस्सा मान लिया गया है। लोकतंत्र में “अन्नदाता” शब्द केवल भाषणों और निबंधों की शोभा बनकर रह जाए, इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है।

एक समय था जब किसान भोर होते ही कंधे पर हल और हाथ में रोटी का पोटला लेकर खेत की ओर निकल पड़ता था। उसके चेहरे पर आत्मविश्वास होता था, क्योंकि वह सृजनकर्ता था। आज वही किसान खरीदी केंद्रों की कतार में खड़ा होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहा है। खेत अब उसके लिए केवल कर्मभूमि नहीं, बल्कि संघर्षभूमि बनते जा रहे हैं।

जरूरत इस बात की है कि खरीदी व्यवस्था को केवल सरकारी प्रक्रिया न मानकर किसान के सम्मान और अस्तित्व से जोड़ा जाए। जब तक मंडियों में किसान को सुविधा, सम्मान और विश्वास नहीं मिलेगा, तब तक मिट्टी की यह पुकार यूँ ही गूंजती रहेगी—

कि खेत का मालिक आखिर कब तक अपनी ही उपज के लिए व्यवस्था के सामने याचक बना रहेगा।

पत्रकार आशीष साहू की कलम से