*"उमरार" खुद तय करेगी अपनी सीमा*
*लगभग 5 एकड़ नदी का पाट बिका, जिला प्रशासन मौन*
जिले को नाम और शहर वासियों को उनकी पहचान दिलाने वाली उमरार नदी थक हार कर इस बार बारिश में अपनी सीमा स्वयं तय कर सकेगी, बस उसको केवल मूसलाधार बारिश का इंतजार है, जब जीवन दायिनी की धारा पुल पुलियों के ऊपर से बहती है। बताया जाता है कि खलेसर स्थित नदी का करीब 5 एकड़ भूमि का पाट ही बेच दिया गया है, जिसकी न तो आज तक जांच हो सकी और नहीं जिला प्रशासन ने कोई कार्यवाही सुनिश्चित की, जिसके बाद यह कहना ग़लत नहीं होगा कि उमरार नदी के उफान के बाद घरों और सड़कों सहित आसपास बने घरों में पानी समाता है तो उसके लिए जिम्मेदार जिला प्रशासन है। आपको बता दें कि कर्बला और ज्वालामुखी स्थित नदी किनारे बने मकानों का गंदा पानी नदी में समाहित हो रहा है, जिसकी शिकायत के बाद भी प्रशासन ने आंख बंद कर रखी है। वहीं जिले में विपक्ष की भूमिका निभाने वाले नेताओं ने भी आंखों पर पट्टी बांध ली है जिसके कारण यह भी कहा जाने लगा है कि नदी की इस दुर्दशा के लिए जितनी जिम्मेदार जिला प्रशासन है उतना ही जिम्मेदार विपक्ष भी है। अगर समय समय पर इसका विरोध किया जाता तो अविरल बहने वाली उमरार नदी आज भी उसी स्वरुप में बहती..?
*पहले उजाड़ो फिर करो दिखावा..!*
एक समय था जब बड़ी बड़ी बातें और नदी को संरक्षित करने जैसे भाषण विपक्षी नेताओं ने खूब दिये थे, कोसने के साथ साथ जमकर खरी खोटी भी बिना नाम लिए मंचों से सुनाए, मगर कभी भी जीवन दायिनी उमरार नदी को उजाड़ने वालों के नाम नहीं बताये और न ही कभी लिखित शिकायत की। जिसके कारण सत्ता पक्ष का साथ पाकर माफियाओं ने अपने निजी स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए ज्वालामुखी से नदी का पाट बेचना शुरू किया और वह घंघरी तक पहुंचा, वह बात अलग है कि मीडिया के हस्तक्षेप के बाद चंद वर्ग फिट भूमि घंघरी के सांई कालोनी में जिला प्रशासन ने अपने कब्जे में लेकर वाहवाही लूट ली हो मगर सवाल आज भी मुंह बांए खड़ा है कि कौन उन्हें बचा रहा है जो उमरार को नाले में तब्दील करने कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहें हैं। दामन पर उमरार की धारा को मोड़ने का दाग़ लगाकर साहब मंत्रियों और विधायकों के साथ नदी को सुरक्षित, संरक्षित और व्यवस्थित करने का संकल्प लें रहे हैं और उसके ठीक उल्टे यहां हो रहा कि नदी संरक्षित होने के बजाय तेजी के साथ अव्यवस्थित हो रही है। बहरहाल जो भी हो जिले और उमरिया शहर के लिए यह नदी एक नदी नहीं बल्कि वह गाथा है, जिसने आसपास के हजारों एकड़ भूमि को सिंचित किया और लोगों की प्यास भी बुझाती आई मगर समय ने एक ऐसा खेला खेला कि जिनके सूखे कंठों को पानी दिया वहीं लोग उसे बर्बाद करने में सबसे आगे खड़े दिखाई दे रहे हैं। वह दिन दूर नहीं जब आने पीढ़ी नदी को केवल नाले की संज्ञा से विभूषित करेगी।
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