आज गुड़ी पड़वा है.  "देश के कोने-कोने में आज उत्सव है. महाराष्ट्र में गुड़ी सजाई जा रही है, दक्षिण भारत में उगादि की पच्चड़ी बन रही है, सिंधी परिवारों में चेटीचंड की धूम है और कश्मीर से कन्याकुमारी तक नव-वर्ष का स्वागत हो रहा है. रेशमी वस्त्र, नीम की पत्तियाँ, गुड़ और नारियल से सुसज्जित वह ध्वज जो विजय का, नव-वर्ष का, और एक नई शुरुआत का प्रतीक है. इसी दिन से चैत्र नवरात्रि का शुभारम्भ होता है. वह नौ दिवसीय उत्सव जो आदिशक्ति की उपासना को समर्पित है. 


ब्रह्मपुराण के अनुसार, इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना का आरम्भ किया था. वाल्मीकि रामायण में उल्लेख मिलता है कि इसी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को भगवान राम ने अयोध्या लौटकर रामराज्य की स्थापना की थी.  सम्राट शालिवाहन ने भी इसी दिन शक संवत् का प्रवर्तन किया था — वह पंचांग जो आज भी भारतीय गणतंत्र का राजकीय कैलेंडर है.

तो यह केवल पर्व नहीं है-  यह भारतीय सभ्यता की उस अविच्छिन्न धारा का पड़ाव है, जो हजारों वर्षों से बहती आ रही है। और इसी धारा के केंद्र में सदैव रही है — शक्ति।

 

शक्ति: एक दार्शनिक अवधारणा
भारत की सांस्कृतिक स्मृति में "शक्ति" केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक जीवित दर्शन है। ऋग्वेद के दशम मण्डल में "देवीसूक्त" में वाक् देवी का उद्घोष है-  "अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः" - अर्थात्, मैं ही रुद्रों, वसुओं और आदित्यों के साथ विचरण करती हूँ। यह स्त्री-सत्ता का वह महाघोष था जो वैदिक काल में ही गूँज उठा था. 


देवीभागवत और दुर्गासप्तशती में इस अवधारणा का और विस्तार हुआ। पुराणों की कथा कहती है कि जब महिषासुर के आतंक से त्रिलोक व्याकुल हो उठा, जब ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी उस असुर को परास्त करने में असमर्थ हो गए, तब समस्त देवताओं की संयुक्त ऊर्जा से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई देवी दुर्गा. दस भुजाओं में दस अस्त्र-शस्त्र धारण किए, सिंह पर आरूढ़, महाकाल का तेज लिए. यह कथा एक गहरा संदेश देती है-  जब-जब व्यवस्था असहाय हो जाती है, शक्ति स्त्री के रूप में प्रकट होती है. 


दुर्गासप्तशती का वह श्लोक आज भी भारतीय जनमानस में गूँजता है —
"या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥"
अर्थात्-  जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में विराजमान हैं, उन्हें बारंबार नमस्कार है। यह केवल स्तुति नहीं है — यह स्वीकृति है कि प्रत्येक स्त्री में वह दिव्य ऊर्जा विद्यमान है. 

 

इतिहास के झरोखे से: जब स्त्री ने राज्य सँभाला
भारतीय इतिहास केवल देवियों की कथाओं से नहीं, बल्कि उन वास्तविक नारियों से भी भरा पड़ा है जिन्होंने अपनी शक्ति को चरितार्थ किया. चन्द्रगुप्त मौर्य के काल में कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उल्लेख है कि राजकाज में महिलाओं की भूमिका सुनिश्चित थी. मध्यकाल में रानी दुर्गावती ने 1564 ई. में अकबर की विशाल सेना के समक्ष झुकने से इनकार किया और रणभूमि में वीरगति प्राप्त की. गोंडवाना की इस रानी की शौर्यगाथा आज भी मध्यप्रदेश के कण-कण में बसी है. चाँद बीबी ने अहमदनगर की रक्षा में स्वयं कवच धारण किया. रानी लक्ष्मीबाई ने 1857 के स्वाधीनता संग्राम में वह अध्याय लिखा जिसे विश्व इतिहास के पन्नों पर सुवर्णाक्षरों में अंकित किया जाता है. लेकिन यहीं पर एक दूसरा इतिहास भी है - वह इतिहास जो प्रायः मौन रहता है. 


मनुस्मृति के कुछ श्लोकों ने शताब्दियों तक स्त्री की स्वायत्तता को संकुचित किया. मध्यकाल में सती प्रथा, बाल-विवाह और पर्दा प्रथा जैसी कुरीतियों ने उस "आदिशक्ति" को घर की चारदीवारी में समेट दिया. 1829 में लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने राजा राममोहन राय के अथक प्रयासों के फलस्वरूप सती प्रथा निषेध अधिनियम पारित किया.  किन्तु यह सोचनीय है कि जिस देश ने स्त्री को "आदिशक्ति" कहा, उसे ही एक अंग्रेज़ गवर्नर-जनरल द्वारा बनाए गए कानून की आवश्यकता पड़ी. 

पश्चिमी नारीवाद और भारतीय 'शक्ति': दो विचार, एक मंज़िल
जब 19वीं शताब्दी में पश्चिम में Mary Wollstonecraft की "A Vindication of the Rights of Woman" और बाद में suffragette आंदोलन की लहरें उठ रही थीं, तब भारत में भी अपने ढंग से एक जागरण हो रहा था.  सावित्रीबाई फुले ने 1848 में पुणे में पहली बालिका पाठशाला खोली -  उस समाज में जहाँ लड़कियों का पढ़ना "अपशकुन" माना जाता था. पंडिता रमाबाई ने संस्कृत में पारंगत होकर उस पुरुष-प्रभुत्व को चुनौती दी जिसने शास्त्र-अध्ययन को स्त्रियों के लिए वर्जित किया था. पश्चिमी नारीवाद मूलतः अधिकारों की राजनीतिक लड़ाई थी.  मतदान का अधिकार, सम्पत्ति का अधिकार, समान वेतन का अधिकार। यह एक व्यवस्थागत परिवर्तन की माँग थी. 


भारतीय "शक्ति" की अवधारणा इससे भिन्न थी- यह आध्यात्मिक था, सांस्कृतिक था, और कहीं अधिक व्यापक था। देवी दुर्गा में युद्ध-कौशल था, देवी सरस्वती में ज्ञान था, देवी लक्ष्मी में समृद्धि थी और देवी काली में उस क्रोध का स्वर था जो अन्याय के समक्ष मौन नहीं रह सकता. 


किन्तु यहीं वह असहज प्रश्न भी जन्म लेता है जिससे आँखें चुराना उचित नहीं - 


यदि भारतीय सभ्यता ने सहस्राब्दियों पूर्व स्त्री को "आदिशक्ति" मान लिया था, तो फिर इतिहास के अनेक कालखण्डों में स्त्रियों को शिक्षा, सम्पत्ति और निर्णय की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ा?


इतिहासकार रोमिला थापर और समाजशास्त्री आंद्रे बेतेय जैसे विद्वानों ने इस विरोधाभास को रेखांकित किया है-  धार्मिक प्रतीक और सामाजिक संरचना सदैव एक-दूसरे के पूरक नहीं होते. देवी की पूजा एक आदर्श था, किन्तु समाज की संरचना उस आदर्श से बहुधा विमुख रही. 


एक सामाजिक चिंतक ने इसी विरोधाभास को बड़ी पैनी दृष्टि से कहा था- 
"समाज ने स्त्री को देवी बना दिया, लेकिन इंसान के रूप में बराबरी देने में सदियाँ लगा दीं।
"

 

समकालीन भारत: आँकड़ों का यथार्थ
आज का भारत उस दोहरेपन को और स्पष्टता से उजागर करता है. विश्व आर्थिक मंच की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2023 में भारत 146 देशों में 127वें स्थान पर था. यह आँकड़ा उस देश का है जो नवरात्रि में नौ दिन आदिशक्ति की आराधना करता है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार देश में 18 वर्ष से पूर्व विवाह की दर अभी भी 23 प्रतिशत से ऊपर है। संसद में महिलाओं की भागीदारी अभी भी 15 प्रतिशत के आसपास है. 


वहीं दूसरी ओर भारत की पहली महिला IPS अधिकारी किरण बेदी, पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, अंतरिक्ष में जाने वाली कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स, ओलम्पिक पदक विजेता पी.वी. सिंधु और मीराबाई चानू, ISRO की महिला वैज्ञानिकें जिन्होंने मंगलयान और चन्द्रयान को सफलता दिलाई — यह सब भी उसी भारत की कहानियाँ हैं. 


तो क्या यह भारत दो हिस्सों में बँटा हुआ है? एक वह जो देवी को सिंहासन देता है, और एक वह जो बेटी को जन्म से पहले ही मार देता है?

नारी का आधुनिक युद्ध: असुर बदल गए हैं
पौराणिक कथाओं में देवी ने महिषासुर, चण्ड-मुण्ड और शुम्भ-निशुम्भ का संहार किया था। आज की नारी के असुर और हैं- और शायद इसीलिए अधिक दुर्जेय हैं.


आज की स्त्री का संघर्ष कार्यस्थल पर होने वाले भेदभाव से है, जहाँ समान योग्यता होने पर भी पुरुष सहकर्मी को अधिक वेतन मिलता है। उसका संघर्ष उन पारिवारिक अपेक्षाओं से है जो उसे एक साथ आदर्श बेटी, आदर्श पत्नी, आदर्श माँ और आदर्श कर्मचारी - सब कुछ होने को बाध्य करती हैं. उसका संघर्ष उन सड़कों से है जो रात के आठ बजे के बाद उसके लिए असुरक्षित हो जाती हैं.  उसका संघर्ष उस मानसिकता से है जो अभी भी उसकी पोशाक, उसके मित्र-मंडल और उसके करियर के चुनाव पर "राय" देने का अधिकार रखती है.


2012 के दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड के बाद निर्भया के नाम पर पारित कानून ने निश्चय ही एक कदम आगे बढ़ाया। 2013 में यौन उत्पीड़न से कार्यस्थल में संरक्षण अधिनियम (POSH) बना। 2018 में #MeToo आंदोलन ने भारत में भी उन आवाज़ों को स्वर दिया जो दशकों से घुट रही थीं।
किन्तु कानून और सामाजिक परिवर्तन के बीच की खाई अभी भी गहरी है।

गुड़ी पड़वा का सन्देश: नई शुरुआत की संभावना
गुड़ी पड़वा केवल एक उत्सव नहीं- यह नवीनता का आमंत्रण है. गुड़ी-  वह ध्वज जो घरों की छत पर ऊँचा फहराया जाता है-  विजय का, संकल्प का और नव-निर्माण का प्रतीक है। इस वर्ष जब हम यह पर्व मना रहे हैं, तो क्या हम उस परंपरा और उस यथार्थ के बीच की खाई पाटने का संकल्प भी ले सकते हैं?


शक्ति की अवधारणा को केवल नवरात्रि के नौ दिनों तक सीमित रखना — और शेष तीन सौ छप्पन दिन उस शक्ति को उसके अधिकारों से वंचित रखना — यह न तो आस्था के अनुकूल है, न ही तर्क के।


जब देवी दुर्गा के नौ रूपों -  शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री  की पूजा होती है, तो क्या हम यह भी स्मरण कर सकते हैं कि ये रूप केवल पूजनीय नहीं, अनुकरणीय भी हैं?
स्कन्दमाता जो माँ होकर भी योद्धा है। कात्यायनी जो अन्याय के विरुद्ध खड़ी होती है। सिद्धिदात्री जो ज्ञान और सिद्धि की दात्री है।

आज की नारी: प्रतीक नहीं, व्यक्ति
आज की भारतीय नारी उस विरासत और उस यथार्थ के संधिस्थल पर खड़ी है जहाँ इतिहास ने उसे देवी बनाया और समाज ने उसे सीमित किया। वह अब न पूजा का विषय बनना चाहती है, न ही निषेध का। वह शिक्षा की कक्षाओं में ज्ञान की मशाल जलाती है, नेतृत्व की कुर्सियों पर नए मानदंड स्थापित करती है, विज्ञान और खेल में इतिहास रचती है, और समाज की उन रूढ़ियों को चुनौती देती है जो उसे उसकी क्षमता से कमतर आँकती हैं।


उसका युद्ध रोज़मर्रा का है — वह हर दिन महिषासुर से नहीं, बल्कि असमानता, भेदभाव और अवसरों के अभाव से लड़ती है। और इस युद्ध में उसकी शक्ति न तो प्रतीकात्मक है, न ही किसी मंत्र से प्रकट होती है — यह शक्ति उसके संघर्ष में है, उसके धैर्य में है, उसकी जिजीविषा में है।


महात्मा गाँधी ने एक बार कहा था -  "जिस दिन से एक महिला रात में सड़कों पर स्वतंत्र रूप से चलने लगेगी, उस दिन हम कह सकेंगे कि भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली।" वह दिन अभी पूर्णतः नहीं आया।

उपसंहार: शक्ति को अधिकार चाहिए, आदर्श नहीं
गुड़ी पड़वा के इस शुभ दिन पर, जब हम नव-वर्ष का स्वागत कर रहे हैं और नवरात्रि में आदिशक्ति की आराधना का संकल्प ले रहे हैं, तब यह विमर्श और भी आवश्यक हो जाता है।

"शक्ति" की परंपरा को जीवित रखने का अर्थ केवल देवी की प्रतिमाओं में दीप जलाना नहीं है। इसका अर्थ है — उस "शक्ति" को, जो प्रत्येक स्त्री में विद्यमान है, उसे अपनी सम्पूर्ण सम्भावनाओं के साथ विकसित होने का अवसर देना. असली सशक्तिकरण वहाँ होता है जहाँ स्त्री को प्रतीक नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र, स्वायत्त और समान मनुष्य के रूप में स्वीकार किया जाए।


और शायद इसीलिए आज का सबसे प्रासंगिक उद्घोष यही है -
"हमें देवी का दर्जा मत दीजिए, बस एक मनुष्य की तरह बराबरी दीजिए।"


यह उद्घोष न तो आस्था-विरोधी है, न परंपरा-विरोधी। यह उस "शक्ति" के दर्शन का ही स्वाभाविक विस्तार है जो कहता है — "या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।" क्योंकि जब हर स्त्री में देवी विराजमान है, तो हर स्त्री सम्मान, स्वतंत्रता और समानता की अधिकारिणी भी है।


सम्पादकीय टिप्पणी: यह लेख भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के प्रति आदर-भाव रखते हुए समसामयिक सामाजिक प्रश्नों पर एक निष्पक्ष एवं साहित्यिक दृष्टि से विचार करता है। इसमें उद्धृत ऐतिहासिक तथ्य सर्वमान्य स्रोतों पर आधारित हैं।