November 04, 2026 11:39 AM
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विकारों का त्याग ही आत्मशुद्धि, सद्गुणों का संचय ही सच्ची संपदा : आचार्य श्री सुनीलसागरजी महाराज
नेमी नगर जैन कॉलोनी, इंदौर। (संवाददाता मुकेश कुमार जैन)।
आचार्य श्री सुनीलसागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि धन-दौलत और भौतिक सुख-सुविधाओं को ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मान लेना मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है। वास्तविक संपत्ति सोना-चांदी, ऊंचे महल और अपार धन-संपदा नहीं, बल्कि मन की निर्मलता, विचारों की पवित्रता और जीवन में अपनाए गए सद्गुण हैं। यही मनुष्य की सच्ची पूंजी और जीवन की वास्तविक कमाई है।
गुरुदेव ने कहा कि जीवन में सच्ची सफाई बाहरी धूल-मिट्टी को हटाने से नहीं, बल्कि मन में जड़ जमाए बैठे क्रोध, मान, माया, लोभ, ईर्ष्या और अहंकार जैसे विकारों को दूर करने से होती है। इसी प्रकार सच्ची कमाई बैंक बैलेंस बढ़ाने में नहीं, बल्कि दया, क्षमा, करुणा, संतोष, संयम और विनम्रता जैसे सद्गुणों को अपने आचरण में उतारने में है। जिस व्यक्ति ने अपने मन को विकारों से मुक्त कर लिया, उसी का जीवन वास्तव में स्वच्छ और पवित्र है।
उन्होंने कहा कि आज मनुष्य धन-संपत्ति के संग्रह में अपना संपूर्ण जीवन लगा देता है, लेकिन यह भूल जाता है कि संसार की समस्त भौतिक संपदा यहीं रह जाने वाली है। मृत्यु के बाद न धन साथ जाता है और न ही वैभव, बल्कि मनुष्य के कर्म, संस्कार और चरित्र ही उसके जीवन की वास्तविक पहचान बनते हैं। जिसने अपने भीतर के विकारों का त्याग किया, इच्छाओं पर नियंत्रण पाया और आत्मकल्याण का मार्ग अपनाया, वही सच्चे अर्थों में धनवान है।
भगवान महावीर स्वामी का जीवन इस परम सत्य का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने राजसी वैभव, सुख-सुविधाओं और सांसारिक मोह-माया का त्याग कर आत्मज्ञान एवं मोक्षमार्ग को अपनाया। उनका जीवन संदेश देता है कि पाने की दौड़ में नहीं, बल्कि त्याग की भावना में जीवन की वास्तविक महानता निहित है।
गुरुदेव ने प्रेरणा देते हुए कहा कि जीवन में संग्रह की अपेक्षा त्याग की भावना विकसित करें। दूसरों की कमियां खोजने से पहले अपने भीतर झांकें और अपने विकारों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करें। धन कमाने के साथ-साथ सद्गुण कमाने का भी पुरुषार्थ करें, क्योंकि धन से सुविधाएं खरीदी जा सकती हैं, लेकिन आत्मिक शांति और सम्मान सदाचार से ही प्राप्त होते हैं।