पक्ष-विपक्ष की नजदीकियों के बीच घिरा आमला शहर, 18 वार्डों में बुनियादी समस्याओं का अंबार

पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं — यह कहावत इन दिनों आमला नगर पालिका परिषद की कार्यशैली पर सटीक बैठती नजर आ रही है। करीब चार वर्ष पूर्व गठित परिषद में पर्याप्त संख्या बल के बावजूद भाजपा सत्ता नहीं बना सकी और कांग्रेस ने कमान संभाली। अब शहर के विकास को लेकर जताई जा रही आशंकाएं हकीकत बनती दिखाई दे रही हैं।

बुनियादी समस्याओं की जकड़ में आमला

शहर के सभी 18 वार्डों में सड़क, नाली, पेयजल, सफाई, स्ट्रीट लाइट और यातायात जैसी बुनियादी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। आवारा पशुओं से दुर्घटनाएं और अतिक्रमण की शिकायतें भी आम हो गई हैं। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि परिषद की सक्रियता केवल कागजों और पोस्टर-बैनरों तक सीमित है, जबकि जमीनी स्तर पर हालात जस के तस बने हुए हैं।

जनता की पीड़ा: "आखिर किसे बताएं और कितनी बार"

शहर के विभिन्न वार्डों में लोगों से बातचीत के दौरान व्यापक नाराजगी सामने आई। नागरिकों जैसे रिकेश भिखोंडे, मालती, सुरेखा, और अन्य ने कहा कि शिकायतों के बावजूद ठोस कार्रवाई न होने से निराशा बढ़ रही है।

पार्षदों में असंतोष

नगर परिषद के कुछ पार्षद भी कार्यप्रणाली से अप्रसन्न हैं। पार्षद काशीबाई, नीलम साहू, और अन्य ने कहा कि परिषद स्तर पर सहयोग न मिलने से वे तय लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पाए।

भाजपा की संगठनात्मक कमजोरी

प्रदेश और देश में सत्ता में होने के बावजूद आमला नगर परिषद में भाजपा नेता प्रतिपक्ष तय नहीं कर सकी है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, प्रभावी प्रतिपक्ष की कमी से जनहित के मुद्दों पर असर पड़ा है।

जनता की उम्मीदें कायम

शहरवासियों को उम्मीद है कि परिषद और अधिकारी जल्द ठोस कदम उठाएंगे, ताकि अव्यवस्था पर विराम लग सके और शहर विकास की पटरी पर लौट सके।