आमला। शहर की मुख्य सड़कों, चौराहों और गलियों में इन दिनों बड़ी संख्या में बेसहारा गोवंश खुलेआम विचरण करता और सड़क के बीचों-बीच बैठा नजर आ रहा है। बरसात के मौसम में यह स्थिति और अधिक चिंताजनक हो गई है। फिसलन भरी सड़कों और कम दृश्यता के बीच गोवंश की मौजूदगी से दुर्घटनाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह केवल यातायात व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि बेजुबान पशुओं के संरक्षण, सार्वजनिक सुरक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारी से जुड़ा गंभीर विषय है।
*उपयोगिता खत्म होते ही बेसहारा हो रहा गोवंश*
एक समय खेती-किसानी की पहचान रहे बैल और देसी गाय आज बदलती कृषि व्यवस्था में उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। खेतों में ट्रैक्टरों और आधुनिक मशीनों के बढ़ते उपयोग से बैलों की जरूरत लगभग समाप्त हो गई है। वहीं दूध देना बंद करने या वृद्ध हो जाने पर कई पशुपालक गोवंश को सड़कों पर छोड़ देते हैं। परिणामस्वरूप शहर और आसपास के क्षेत्रों में लावारिस गोवंश की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
*सड़क सुरक्षा के साथ मानव जीवन भी खतरे में*
सड़कों पर बैठे या अचानक दौड़ते गोवंश के कारण दोपहिया और चारपहिया वाहन चालकों को हर समय दुर्घटना का डर बना रहता है। रात के समय यह खतरा और बढ़ जाता है, जब अंधेरे में सड़क पर बैठे पशु समय रहते दिखाई नहीं देते। कई बार हादसों में पशुओं के साथ-साथ लोगों को भी गंभीर चोटें पहुंचती हैं।
*किसान संगठनों और जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर उठ रहे सवाल*
स्थानीय लोगों का कहना है कि फसल, खाद-बीज और कृषि से जुड़े अन्य मुद्दों पर सक्रिय रहने वाले किसान संगठनों ने अब तक बेसहारा गोवंश की समस्या पर अपेक्षित पहल नहीं की है। वहीं जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों की ओर से भी इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए कोई ठोस योजना सामने नहीं आई है।
*सरकारी गौशालाओं की बढ़ी मांग*
नागरिकों का मानना है कि पंचायत और नगरपालिका स्तर पर पर्याप्त क्षमता वाली सरकारी गौशालाओं का निर्माण समय की आवश्यकता है। इससे बेसहारा गोवंश को सुरक्षित आश्रय मिलेगा, सड़क दुर्घटनाओं में कमी आएगी और शहर की स्वच्छता व्यवस्था भी बेहतर होगी। साथ ही गोबर से जैविक खाद, गो-काष्ठ और अन्य उत्पाद तैयार कर गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी प्रयास किए जा सकते हैं।
*जनसहयोग के भरोसे चल रही श्री महावीर हनुमान गौशाला*
वार्ड क्रमांक 5 स्थित श्री महावीर हनुमान गौशाला के प्रबंधन के अनुसार शहर में घायल, बीमार और बेसहारा गोवंश का लगातार रेस्क्यू कर उनका उपचार किया जाता है। हालांकि शासन स्तर से पर्याप्त आर्थिक सहायता नहीं मिलने के कारण गौशाला का संचालन पूरी तरह जनसहयोग पर निर्भर है। बढ़ती संख्या के बीच पशुओं के भोजन, उपचार और रखरखाव की व्यवस्था करना लगातार कठिन होता जा रहा है। गौशाला प्रबंधन का कहना है कि सरकार को शहर के आसपास पर्याप्त क्षमता वाली सरकारी गौशालाएं स्थापित करनी चाहिए, ताकि इस समस्या का स्थायी समाधान निकल सके।
*प्रशासन से ठोस पहल की अपेक्षा*
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि प्रशासन को पशुपालकों की जवाबदेही तय करने, बेसहारा गोवंश के नियमित रेस्क्यू, टैगिंग, चिकित्सा और सुरक्षित आश्रय की व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी अभियान चलाना चाहिए। साथ ही इस दिशा में सामाजिक संगठनों और आमजन की भागीदारी भी आवश्यक है।
बेसहारा गोवंश की समस्या अब केवल पशु संरक्षण तक सीमित नहीं रह गई है। यह सड़क सुरक्षा, जनसुविधा, पर्यावरण और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा एक गंभीर सामाजिक विषय बन चुकी है। जब तक शासन, प्रशासन, जनप्रतिनिधि, पशुपालक और समाज मिलकर समन्वित एवं स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाते, तब तक न तो बेजुबान गोवंश की पीड़ा कम होगी और न ही सड़कों पर होने वाले हादसों पर प्रभावी रोक लग सकेगी।
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